सरकार ने मजबूर किया फर्जीवाड़े के लिए

farzi_marksheetराजस्थान सरकार ने अपने एक अध्यादेश के द्वारा 2015 के पंचायती राज चुनावों हेतु शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान रखा था। इसके तहत सरपंचों के लिए 8वीं पास और जिला परिषद सदस्यों के लिए 10वीं की मार्कशीट जरूरी कर दी थी।

राजस्थान में 746 सरपंचों के खिलाफ फर्जी डिग्री और मार्कशीट लगाने के आरोप हैं। दौसा के हिंगोता गांव में हाल ही में चुनी गयी सरपंच ममता कुमारी पर फर्जी मार्कशीट और ट्रांसफर सर्टिफिकेट लगाकर चुनाव लड़ने का आरोप है। सिर्फ ममता ही नहीं, कई और सरपंच इस आरोप से घिरे हैं। ममता फिलहाल फरार है।

दरअसल राजस्थान में सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए 8वीं पास होने का जो कानून पिछले साल बना है, उसकी वजह से राज्य के ग्रामीण हिस्सों के 80 फीसदी लोग चुनाव लड़ने की योग्यता खो बैठे हैं। अब ये लोग फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे काम कर रहे हैं।

राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया का कहना है कि, ‘‘हजारों लोग चुने गये हैं वहां कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने गलत मार्कशीट देकर चुनाव लड़ा और जीता भी। अगर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है तो कार्रवाही होगी।’’ उन्होंने माना कि सारे मिलाकर करीब 600-700 ऐसे मामले हैं।

फिलहाल सरकार के पास नौ हजार से ज्यादा चुने गये सरपंचों में से 746 के खिलाफ शिकायतें मिली हैं, इनमें से 479 के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज हुई है। राज्य के टोंक जिले में पुलिस का एक पंचायत चुनाव प्रकरण सेल भी बना दिया गया है, जो इन मामलों की जांच कर रहा है। सेल ने हाल ही में एक महिला सरपंच शिमला देवी मीणा को गिरफ्तार भी किया है। वो टोंक के बाडोली गांव की सरपंच बनी थी। उन्होंने कोटा के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल हर्बर्ट स्कूल का सर्टिफिकेट लगाया था।

बाड़मेर का एक स्कूल तो ऐसा है, जिसने इन सरपंचों की जमकर मदद की। कोटीदियों की धानी के इस सरकारी माध्यमिक स्कूल से 100 से ज्यादा फर्जी सर्टिफिकेट जारी किये गये। इनमें से 35 चुनाव जीत भी चुके हैं। फिलहाल पुलिस स्कूल के दस्तावेजों की जांच कर रही है।

जाहिर है, सरकार ने सोचा कि अनपढ़ लोग लोकतंत्र में सत्ता से दूर रहें तो बेहतर। लेकिन अनपढ़ लोगों ने पढ़े-लिखे लोगों के साथ मिलकर रास्ता निकाल लिया। आखिर ये लोग न होते तो उन्हें सर्टिफिकेट कहां से मिलते।

राजस्थान सरकार ने ऐसा कानून बनाकर गांव वालों को भी फर्जीवाड़ा सिखा दिया। संसद और विधानसभाओं में तो अंगूठाछाप बैठ सकते हैं लेकिन पंचायतों में पढ़े लिखे चाहिए?