सैलाब भी उठने थे,तूफ़ान भी आना था

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कुछ कसमें निभानी थीं,कुछ फ़र्ज़ निभाना था,
दस्तूर निभाने को ,सर अपना झुकाना था.

सजदा था मुकद्दर में ,सर को तो झुकाना था,
सर उनका बचाने को,सर अपना कटाना था.

दरिया के किनारे ही घर हमको बनाना था,
सैलाब भी उठने थे,तूफ़ान भी आना था.

मजबूरी में चिड़िया ने,बच्चों से कहा अपने,
जब चौंच में थे दाने,तब ऊँचा घराना था.

उन इश्क के लम्हों में,जब पास में तुम आए,
नज़रें भी दिवानी थीं,ये दिल भी दिवाना था.

तब खुद से थे बेगाने,अब खुद में हैं तन्हा हम,
इक ये भी ज़माना है,इक वो भी ज़माना था.

नज़दीक के लम्हों को,पहचान नहीं पाए,
जब साथ हमें रह कर ,कुछ वक़्त बिताना था .