मृत्यु के पश्चात: ‘अपने भी अजनबी’

apne_apne_ajnabiअब न तो अज्ञेय रहे और नाही उनका साहित्य पढ़ने वालों का महान वर्ग मौजूद है लेकिन नयी पीढ़ी के पाठकों को समय समय पर यह बताते रहना जरूरी है कि गुजरे हुए कल का साहित्य आज भी कितना समसामयिक है और उनका साहित्य में क्या महत्व है। हिंदी साहित्य में यूं तो अनेक उपन्यास अनेक कथाकारों द्वारा लिखे गये हैं, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे हैं जो कालजयी बन गये हैं। कथा-सम्राट प्रेमचंद का ‘गोदान’, अमृत लाल नागर का ‘बूंद और समुद्र’ तथा ‘मानस का हंस’ और भगवतीचरण वर्मा का ‘चित्रलेखा’ ऐसे ही कालजयी उपन्यास हैं। प्रख्यात कवि और तार सप्तक की परंपरा से प्रयोगवाद का आरम्भ करने वाले सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी के ऐसे रचनाकार हैं, जिनके उपन्यास ‘नदी के द्वीप’, ‘अपने-अपने अजनबी’ और ‘शेखरः एक जीवनी’ की गणना कालजयी उपन्यासों में होती है।

इस कॉलम में समय समय पर हम ऐसे ही कालजयी साहित्य की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही समयसामयिक साहित्य का परिचय भी कराते रहेंगे। इस बार यहां अज्ञेय के उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ चर्चा की जारही है। चर्चा कर रहे है, डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’।

‘अज्ञेय’ को प्रतिभा सम्पन्न कवि, शैलीकार और कथा-साहित्य को एक महत्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म 7 मार्च, 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक स्थान में हुआ। कथाकार अज्ञेय का बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय ‘अज्ञेय’ क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े और 1930 में पकड़ लिये गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नयी कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं का अज्ञेय ने अनुवाद किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी रहे हैं।

अज्ञेय द्वारा रचित उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ वस्तुतः मृत्यु के दर्शन पर आधारित ऐसा उपन्यास है, जिसमें मानव-जीवन के कटु यथार्थ को कथाकार ‘अज्ञेय’ ने अत्यंत सहज और मनोरंजक रूप से अभिव्यक्त किया है। अपने-अपने अजनबी में मृत्यु के पश्चात मानव के चिंतन और व्यवहार का चित्रण हुआ है। मृत्यु से साक्षात्कार जैसी बेहद जटिल और उलझी हुई समस्या को विषय बनाकर, मानव के जीवन और उसकी नियति का इतने कम शब्दों में अत्यंत मार्मिक और भव्य विवेचन इस उपन्यास की गरिमा का मूल है। मृत्यु को सामने पाकर जैसे व्यक्ति के प्रियजन भी अनायास ही अजनबी हो जाते हैं और अजनबी लोग जैसे बेहद पहचाने हुए से लगने लगते हैं। इस चरम स्थिति में, मानव का सच्चा और सहज चरित्र उभरकर हमारे सामने आता है। व्यक्ति का प्रत्यय, उसका अदम्य साहस और उसका अलौकिक प्रेम भी, वैसे ही और उतने ही अप्रत्याशित ढंग से क्रियाशील हो उठते हैं, जैसे उसकी निम्नतर प्रवृत्तियां क्रियाशील होती हैं।

महान साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का यह महत्वपूर्ण उपन्यास वस्तुतः भारतीय संस्कृति और दर्शन के साथ-साथ मनोविज्ञान को भी आधार बनाकर रचा गया है, जिसमें ‘अज्ञेय’ ने अपने एकाकी जीवन के अनुभवों को भी कहीं-न-कहीं अत्यंत सार्थक अभिव्यक्ति दी है। समीक्षकों ने स्वीकार किया है कि विलक्षण प्रतिभा के धनी रचनाकार अज्ञेय अपने जीवन को अपने-अपने अजनबी उपन्यास के माध्यम से अभिव्यक्ति देने में सफल हुए हैं। हिंदी कथा साहित्य में ‘अज्ञेय’ का यह उपन्यास एक ऐसी सदाबहार फिल्म की तरह माना जाता है, जिसे कितनी ही बार देखने पर भी उसका आनंद वैसा ही बना रहता है। इस उपन्यास की भाषा भी उनके अन्य उपन्यासों की तरह क्लिष्ट है, लेकिन दुरूह नहीं है। मृत्यु के दर्शन को जानने और समझने की ललक रखने वाले जिज्ञासु पाठकों को कथाकार अज्ञेय का यह कालजयी उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए।

-दैनिक ट्रिब्यून से साभार