गांवों में जुगाड़ टेक्नालॉजी

raghav_mahto_fm14 जुलाई। मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी अभियान है ‘डिजीटल इंडिया’ जिसके तहत भारत के ढाई लाख गांवों को इंटरनेट से जोड़ना है और इसका उद्देश्य है सरकारी योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाना। लेकिन गांवों के लोग जुगाड़ से अपना काम कैसे चला रहे हैं यह जानना रोचक है।

भारत के दूर दराज इलाकों में सबसे बड़ी समस्या है मोबाइल सिग्नल और इंटरनेट स्पीड। अव्वल तो हर जगह मोबाइल टॉवर हैं नहीं और टॉवर हैं भी तो स्पीड का कोई भरोसा नहीं। ऐसे में गांवों के लोग अजीब अजीब से जुगाड़ों के जरिये अपनी मुश्किलें आसान करते हैं।

गांवों के उत्साही लोग अपने मॉडम को एल्युमीनियम फॉयल में लपेट देते हैं और सिस्टम से कनेक्ट कर सर्च चालू कर देते हैं। डिवाइस जैसे ही इंटरनेट पकड़ता है, स्पीड पहले से बेहतर मिलती है। जहां टूजी सिग्नल भी उपलब्ध नहीं वहां फॉयल लगाकर सर्फिंग लायक जुगाड़ हो ही जाता है। एक तरह से ये मुफ्त का 3-जी है।

रेडियो रिपेयरिंग की दुकान चलाने वाले राघव महतो ने साल 2003 में एक ऐसा जुगाड़ किया कि भारतभर में उसकी चर्चा हो गयी। पेशे से मकैनिक राघव ने बैटरी से चलने वाले एक टेप रिकॉर्डर से कुछ तार और एक कॉर्डलैस माइक्रोफोन जोड़कर रेडियो प्रसारण कर दिखाया। ‘‘राघव एफएम’’ के नाम से मशहूर हुए रेडियो प्रसारण को 15 किलोमीटर के दायरे में सुना जा सकता था।

इस रेडियो किट को बनाने की लागत थी 50 रुपये। रेडियो की बेहतर फ्रीक्वेंसी के लिए राघव ने अपने पड़ोस में बने अस्पताल की इमारत का इस्तेमाल किया। इस इमारत पर लगे बांस के एक डंडे पर बंधे एंटीना से राघव ने एफएम को घर-घर पहुंचाया और फरमाइशी गानों से लेकर, एचआईवी के प्रति जागरूकता, खोये बच्चों की जानकारी और मनोरंजन सबकुछ लोगों को परोसा गया।

पांच साल बाद कानूनी कारणों से ये रेडियो स्टेशन तो बंद हो गया, लेकिन राघव का ये जुगाड़ डिजिटल युग में बहुतों के काम आ रहा है। राघव ने इस तकनीक के आधार पर कई जगह कम्युनिटी रेडियो शुरू किये। राघव ने बिहार और राजस्थान में कई लोगों के साथ काम किया। उनका दावा है कि अब बेहद कम कीमत और सीमित साधनों से पूरा रेडियो स्टेशन खड़ा किया जा सकता है।

गांव में हर किसी को पता रहता है कि गांव की वो कौन सी जगह है जहां सिग्नल अच्छा रहता है। किसी खास व्यक्ति से बात करनी हो, कोई जरूरी मेल हो, किसी का रिजल्ट देखना हो तो हर कोई इन इलाकों की तरफ दौड़ता है।

ऊंचे बांस पर मॉडम और डोंगल लगा कर बेहतर सिग्नल प्राप्त किये जाते हैं। जितना ऊंचा बांस उतना बेहतर सिग्नल। लंबे तार इस्तेमाल कर लोग एक अदद बांस के जरिये देश-दुनिया से अपना कनेक्शन जोड़ते हैं।
छत्तीसगढ़ और उसके आसपास के कई इलाकों में मोबाइल फोन के जरिये स्थानीय खबरें रिपोर्ट करने वाला पोर्टल है सीजीनेट स्वर। खबरें जुटाने और प्रकाशित करने का तरीका बेहद आसान है। मोबाइल के जरिये खबर, तस्वीरें और आवाज रिकॉर्ड कर पोर्टल पर सीधे अपलोड की जा सकती हैं, लेकिन इस सबके के लिए जरूरी है इंटरनेट कनेक्शन, जो गांवों में अक्सर मौजूद नहीं होता। इस समस्या का हल निकालने के लिए सीजीनेट टीम ने एक ऐप बनाया।

सीजीनेट से जुड़े गांव-गांव के जन-पत्रकार फोन पर ही खबरें जुटाते और भेजते हैं। समस्या ये थी कि हर जगह इंटरनेट नहीं था और गांव से निकल कर लगातार सिग्नल पर नजर रखने में काफी समय बर्बाद होता था। एक ऐप के जरिये आवाजें, खबर और तस्वीरें फोन में एक जगह रिकॉर्ड की जाती है और सिग्नल वाले इलाके में पहुंचते ही वो पोर्टल पर आपने आप अपलोड हो जाती हैं।

‘डिजिटल इंडिया’ की पहुंच अभी तो शहरों में भी बहुत कमजोर है। कॉल ड्रॉप और इंटरनेट की कम स्पीड के कारण उपभोक्ता पहले ही परेशान है। इंटरनेट की स्पीड के मामले में हमारा देश दुनिया भर के देशों में 105वें स्थान पर है। ऐसे में गांवों तक सही तकनीक जाने कब पहुंचेगी। तब तक यदि जुगाड़ से ही कुछ राहत मिलती हो तो हमें गांवों से सीख लेना चाहिए।