कलाम हमारी राजनीति की एक सुखद भूल थे

president_of_children_of_india———————————————-एनडीटीवी के दयाशंकर मिश्रा से साभार
किसी ने कहा वह जनता के राष्ट्रपति थे। किसी ने कहा वह बच्चों के राष्ट्रपति थे। सारी पार्टियों के नेताओं ने कहा, वह हमारे अजीज राष्ट्रपति थे। दोस्त थे, बेहद शानदार इंसान थे। कोई यहां तक कह गया कि वे तो हमारे बनाये राष्ट्रपति थे। सबने याद किया! सोशल मीडिया पर तो ट्रेंड का मेला लगा है। लेकिन कलाम चाहते क्या थे?

कोई बतायेगा कि वह करना क्या चाहते थे। उनके बाद उनके काम का क्या होगा? हम एक भावुक देश हैं और भावुकता पर ही मरते-मिटते हैं। हमने उन्हें तुरंत नेहरू और गांधी की बराबरी पर ला दिया, क्योंकि हम अच्छे लोगों को कैटेगरी विशेष में डाल देते हैं। ताकि कभी कोसने की जरूरत पड़े, तो तुरंत गूगल कर लिया जाये!

सवाल करना सिखाया
कलाम सर! आपने हमें राष्ट्रपति भवन की ऊंची दीवारों के भीतर झांकने की अनुमति दी। प्रोटोकॉल को मिसाइल पर रवाना कर दिया। देशभर के बच्चों को उस बुनियादी शिक्षा में ढालने की कोशिश की, जिसका पहला सबक सवाल करना था।

अपनी गरीबी को नहीं बेचा
कलाम बच्चों को सवाल करने की प्रेरणा देते और आगे बढ़ने की ऊर्जा। उन्होंने अपनी गरीबी और आगे बढ़ने को उस तरह से बेचने की कोशिश कभी नहीं की, जिस तरह से हमारे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे एक नेता ने की थी। वह यहीं नहीं रुके, प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गरीबी की दीवार पर खड़े होकर वह इमेज की मीनार को ग्लोबल बनाने में जुटे हैं। इसके उलट कलाम ने बस अपने मन के काम किये। वह राष्ट्रपति बनने से पहले भारत रत्न बन चुके थे। सारे सम्मानों से ऊपर और राजनीति से भी।

नया करने वालों को दूसरा मौका नहीं दिया
जो राजनेता आज उनके कसीदे पढ़ रहे हैं, ये वही हैं, जिन्होंने दलगत आधारों पर जीनियस और जनता के राष्ट्रपति के दूसरे टर्म का पुरजोर विरोध किया था। हम ऐसे लोगों को सिस्टम और शक्ति देने के खिलाफ रहते हैं, जो कुछ नया करना चाहते हैं, जो दलगत राजनीति से परे होते हैं, जो नवाचार और आविष्कार के सपनों के साथ उड़ते हैं। हमें तो लीक पर चलने वालों से प्यार है। हम तो बस अधिक से अधिक ‘‘हां’’ कहने वालों को सपोर्ट करने के लिए विख्यात देश हैं। इसलिए जब कलाम राष्ट्रपति बनने के लिए तैयार हुए, तो खतरा था कि घाघ राजनेता उन्हें अपने चक्रव्यूह में फंसा सकते हैं।

कुछ करने आये थे, किया
लेकिन, कलाम यहां भी कमाल के निकले। वह राजनीति में राष्ट्रपति भवन में वैसे नहीं आये थे, जैसे ज्ञानी जैल सिंह आये, जैसे प्रतिभा पाटील आयीं। वह न तो बुढ़ापा काटने आये थे और न ही परिवारवाद को संवारने।

राजनीति की जरूरत थे कलाम, लेकिन….
कलाम हमारी राजनीति की एक सुखद भूल थे। जिन्हें अन्य-अन्य कारणों से बनाया गया था, लेकिन वह तो बस बच्चों और विज्ञान के राष्ट्रपति बनकर रह गये। शायद इसलिए दूसरी बार उनके नाम पर विचार नहीं करके हमने पहली बार किसी महिला को राष्ट्रपति बनने का अवसर दिया, क्योंकि हमें महिला सशक्तिकरण के पोस्टर गिनीज बुक को भेजने थे।

देश के बच्चों में जिन्दा रहेंगे कलाम
हम श्रद्धांजलि देने में उस्ताद और मूल सबक को कब्र में दफनाने में माहिर लोग हैं। कलाम हम तुम्हारी बातों को मानूसन सत्र में ही बारिश में बहा देंगे। बस, खतरा उन बच्चों से है, जिनमें तुम आगे बढ़ने की ललक और सवाल करने का जज्बा भर गये हो, उसे मिटाना जरा मुश्किल काम है!