क्या संगीत कला केन्द्र बिकाऊ जिन्स है?

sangeet_kala_kendraभीलवाड़ा का संगीत कला केन्द्र पिछले कुछ वर्षों से विवाद और संशय का केन्द्र बना हुआ है। यह विवाद संस्था के संगीत पक्ष से सम्बन्धित नहीं है बल्कि इस संस्था के नाम पर करीब पचास करोड़ रुपये का एक बड़ा भूखण्ड ही सारे झगड़े की जड़ है। इस भूखण्ड पर शहर के कई बड़े उद्योगपतियों, जमीन कारोबारियों की नजर है।

पद्मश्री देवी लाल सामर ने लोककलाओं और शास्त्रीय गायन वादन और नृत्य की परम्पराओं को जारी रखने के उद्देष्य से उदयपुर में भारतीय लोक कला मण्डल और भीलवाड़ा में संगीत कला केन्द्र की स्थापना सन 1954 में की। लोककला में संगीत कला केन्द्र ने मुख्य रूप से गैर नृत्य परम्परा को लगभग 45 वर्षों तक अनवरत रूप से जारी रखा, वहीं राजस्थान सरकार के द्वारा आयोजित विभागीय परीक्षाओं के माध्यम से संगीत की शिक्षा दी जाती रही। संगीत कला केन्द्र की मूल संस्था, भीलवाड़ा संगीत समिति का सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकरण 1964 में हुआ। वर्ष 1984 में संगीत कला केन्द्र को राज्य सरकार द्वारा एक भूखण्ड आवंटित हुआ जिसकी लीज डीड 1998 में हस्ताक्षरित हुई।

राज्य सरकार द्वारा अनुदानित संस्था के रूप में वर्ष 2010 तक संगीत का अध्ययन अध्यापन जारी रहा। वर्ष 2010 में राज्य सरकार द्वारा अनुदानित संस्थाओं के शिक्षकों को राजकीय सेवाओं में ले लिया गया और संस्थाओं का अनुदान बंद कर दिया गया। जिसके फलस्वरूप संगीत कला केन्द्र को भारी परेशानी उठानी पड़ी। संगीत कला केन्द्र की गतिविधियों पर बहुत विपरीत प्रभाव हुआ और सरकारी अनुदान के अभाव में संस्था गहरे आर्थिक संकट में पड़ गयी।

दरअसल संगीत कला केन्द्र की कानूनी स्थिति बड़ी अजीब है। सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत संस्था भीलवाड़ा संगीत समिति है और संगीत कला केन्द्र इसकी एक इकाई है जो शिक्षा विभाग में एक शिक्षण संस्था की तरह पंजीकृत है। करीब साढ़े चार-पांच हजार वर्गगज का भूखण्ड संगीत कला केन्द्र को राज्य सरकार द्वारा 1984 में आवंटित हुआ था। भीलवाड़ा की नेहरु रोड पर स्थित यह भूखण्ड व्यावसायिक महत्व का है। इसी सड़क पर महत्वपूर्ण कृषि उपज मण्डी, बीएसएनएल कार्यालय, बस स्टेण्ड, शिक्षण संस्थाएं, रामस्नेही अस्पताल आदि संस्थान है। यही भूखण्ड भीलवाड़ा के रीयल एस्टेट के कारोबारियों की नजर में चढ़ा हुआ है।

संस्था के संस्थापकों में से एक निहाल चन्द अजमेरा ने अपने जीवन के करीब पांच दशक संगीत और कलाओं के लिए लगा दिये। लेकिन सम्भवतया संस्था पर आये आर्थिक संकट के कारण उन्हें इस दायित्व से मुक्ति लेनी पड़ी।

संस्था की तत्कालीन कार्यकारिणी में अध्यक्ष- सागर मल टोंग्या, उपाध्यक्ष- सुमित्रा कांटिया, मंत्री- प्रद्युम्न कुमार अजमेरा, कोषाध्यक्ष- ज्ञानमल पाटोदी, सदस्य- निहाल चन्द अजमेरा, श्रीमती पाटोदी, काशीलाल शर्मा, अभय कुमार अजमेरा, एम. एल. मेहता, डी. सी. रारा, शैलेन्द्र बोरदिया, अजित कुमार सुराणा, प्रेम चन्द भैंसा, दानदाता-महेन्द्र कुमार अजमेरा, पदेन सदस्य-शम्भू प्रसाद पंवार, विभागीय प्रतिनिधि, स्टाफ प्रतिनिधि, छात्र प्रतिनिधि थे। लेकिन सम्भवतया इनमें से कोई भी इस स्थिति में नहीं था कि संगीत कला केन्द्र जैसी विशाल और महत्वपूर्ण संस्था का आर्थिक भार उठाता।

आम तौर ऐसी संस्थाओं में सदस्य और पदाधिकारी वही लोग बने रहते हैं जो संस्थापक होते हैं या उनके नजदीकी विश्वासपात्र लोग होते हैं। कार्यकारिणी में मामूली फेरबदल होते रहते हैं लेकिन घूम फिर कर वही लोग काबिज रहते हैं। लेकिन जब संस्था की सम्पत्तियां बेशकीमती हो जाती हैं तो बाहरी लोगों की रुचि भी इन संस्थाओं में बढ़ जाती है।

यही सम्भवतया भीलवाड़ा की इस प्रीमियम संस्था भीलवाड़ा संगीत समिति के साथ हुआ। कुछ वर्ष पूर्व एकाएक संस्था की सदस्य सूची और कार्यकारिणी में आमूलचूल परिवर्तन आया। पिछली कार्यकारिणी ने अपना कार्यभार नये सदस्यों के साथ नयी कार्यकारिणी को सौंप दिया। जैसे कोई प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के शेयरहोल्डर और डाइरेक्टर अपने शेयर नये शेयरहोल्डर और डाइरेक्टर को बेच कर कम्पनी सौंप देते हैं वैसे ही इस संस्था का हस्तांतरण हो गया। नयी कार्यकारिणी में अध्यक्ष- सुरेन्द्र सिंह सुराणा, उपाध्यक्ष- केदार मल तोशनीवाल, मंत्री- अनिला सुराणा, सदस्य- सुनीता विजयवर्गीय, अमित सुराणा, बाबू लाल सिंघवी, शीतल सुराणा, रघुवीर जैन, खुशबू चौहान, सुमित सुराणा, मृदुला शर्मा, निधि खमेसरा, कालूराम भांभी आदि आ गये। उल्लेखनीय है कि सुरेन्द्र सिंह सुराणा शहर के जाने माने रीयल एस्टेट के कारोबारी और बिल्डर हैं।

नये प्रबंधन ने वर्ष 2012 में संस्था ने जयपुर घराने के कलाकारों को आमंत्रित किया और गायन, वादन और नृत्य की शिक्षा देना प्रारम्भ किया और लखनऊ के भातखण्डे संगीत विद्यापीठ से डिप्लोमा कोर्स करवाने की शुरूआत की। सन 2015 में संस्था को इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागड़ से मान्यता प्राप्त हो गयी। इसके साथ ही उक्त विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित डिप्लोमा परीक्षाओं से विद्यार्थियों को लाभान्वित होने के अवसर मिलना निश्चित हो गया। आज करीब 150 छात्र छात्राएं परम्परागत कत्थक और शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसके साथ ही प्रति वर्ष शालाओं की छुट्टियों में सैंकड़ों छात्र छात्राओं के लिए अभिरुचि शिविर लगाये जाते हैं। पारम्परिक कलाओं के प्रोत्साहन हेतु कलाकारों और उनकी कृतियों से आमजन को परिचित कराया जाता है।

वर्ष 2013, 14 और 15 में संगीत भारती बीकानेर द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिता में कत्थक नृत्य के तीनों आयु वर्ग में संस्था के छात्र छात्राओं ने प्रथम, द्वितीय और तृतीय सभी स्थान प्राप्त कर संस्था के साथ भीलवाड़ा का गौरव भी बढ़ाया।

इस दौरान समिति के अध्यक्ष सुराणा पर कई दबाव आये कि वे संस्था को छोड़ दें। तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मंत्रियों और सरकारी अफसरों के दबाव भी आये और राजस्थान उच्च न्यायालय तक जाने से ही संस्था को बचाया जासका।

लेकिन अब फिर ऐसे दबाव आने लगे हैं जिनके कारण संस्था का एक बार फिर वैसा ही हस्तातरण होने की सम्भावना है जैसा पिछली बार हुआ था। भीलवाड़ा संगीत समिति में नये सदस्य आ गये हैं और यही संकेत है कि संस्था में बड़ा फेरबदल होने वाला है। नये सदस्यों में भीलवाड़ा के कुछ बड़े कारोबारी और उद्योगपतियों के नाम शामिल हैं। इनमें प्रमुख हैं महेन्द्र नाहर और नीरज मानसिंहका। सम्भावना व्यक्त की जारही है कि वर्तमान अध्यक्ष सुराणा अपनी पूरी कार्यकारिणी समेत इस्तीफा देकर नयी कार्यकारिणी को सौंपेंगे। यह भी अफवाह है कि इसके पीछे किसी जैन संत का दबाव भी है।
खैर, अगले सप्ताह में यह सामने आ जायेगा कि इस अफवाह में कितनी सच्चाई है। लेकिन यह तय है कि ऐसे हस्तांतरणों के पीछे बड़ी पूंजी का खेल जरूर है।