वो अंतिम मोड़ था इस ज़िन्दगी का

sc_05102015
पता मुझको मिला बस दुश्मनी का,
बढ़ाया हाथ जब-जब दोस्ती का।
भला मुझमें कोई कैसे ठहरता ,
नहीं था मैं ही शायद घर किसी का।

पतंगों की फ़कत लाशें मिली थी,
जहां मेला लगा था रोशनी का।

पता क्या था जुबां उर्दू थी उसकी,
मुकम्मल शेर था मैं फ़ारसी का।

बड़ा बेआबरू होकर मैं निकला,
भरोसा कर लिया था आदमी का।

मैं खुद को देर तक पढ़ता रहा था,
जो उसका खत मिला राजी -ख़ुशी का।

गले उसने लगाया था मुझे जब,
वो अंतिम मोड़ था इस ज़िन्दगी का।।