तीसरी कसम: तौबा नौटंकीवाली से

teesari_kasam4 ऑक्टोबर सायं 6.30 बजे जवाहर कला केन्द्र के रंगमंच पर फणीश्वर ‘रेणु’ की कहानी तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम के पुंज प्रकाश द्वारा किये हिन्दी नाट्य रूपान्तरण का मंचन किया गया जिसका निर्देशन किया राजेश नाथ राम ने।

फणीश्वर नाथ रेणु की इस चर्चित कहानी पर आधरित एक फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण गीतकार शैलेन्द्र ने वर्ष 1966 में किया था। इस बात पर  विश्वास करना मुश्किल है कि राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे स्टार कलाकारों के बेहतरीन अभिनय वाली यह क्लासिक फिल्म फ्लॉप हो गयी थी और इसके प्रोड्यूसर शैलेंद्र आर्थिक संकट मे फंस गये थे, लेकिन बाद में इस फिल्म ने राष्ट्रीय तथा फिल्म फेयर जैसे प्रतिष्टित पुरस्कार ही नहीं पाये, यह फिल्म भारतीय हिंदी सिने जगत कि श्वेत श्याम फिल्मों के दौर की क्लासिक फिल्म  बन गयी।

शैलेन्द्र की मौत का कारण भी इस फिल्म का फ्लॉप होना बताया गया। ‘‘हमसे पूछा रोते रोते इन पांव के छालों ने, बस्ती कितनी दूर बसा ली दिल में बसने वालों ने।’’
कहते है ‘‘न वो बनाने वाले रहे न देखने वाले’’।

भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर कही जाने वाली इस फिल्म के निर्माण हेतु अनुमति देते समय रेणु ने अपने कहानी में फिल्मकार कोई भी छूट नहीं दी। उन्होंने साफ कह दिया था कि वे किसी भी तरह का बदलाव के खिलाफ है। राज साहेब को भी रेणु के इस फैसले के आगे झुकना पड़ा था, तब इतनी खूबसूरत फिल्म बन सकी।

उस कालजयी फिल्म के बारे में जानना इस कहानी पर खेले गये नाटक की पृष्ठभूमि समझने के लिए जरूरी लगता है। निश्चय ही इस नाटक के निर्देशक राजेश नाथ राम के सामने कई चुनौतियां रही होंगी। आसान नहीं है रेणु की कहानी पर फिल्म बनाना या नाटक करना। निर्देशक ने मंच की सीमाओं को देखते हुए कुछ स्वतंत्रता का उपयोग किया है। यहां एक सूत्रधार का सहारा लेकर कहानी को आगे बढ़ाया गया है। हीरामन एक गाड़ीवान है। एक बार वो चोरी का माल फारबिसगंज पहुंचाते पकड़ा जाता है। हिरामन दो कसम खाता है। एक चोरबाजारी का माल नहीं लादेंगे और दूसरी बांस की लदनी नहीं करेंगे।

jairangam_2015_10_05_teesari_kasamवही हीरामन को एक नौटंकी में काम करनेवाली की हीराबाई की सवारी मिलती है। जिसे मथुरामोहन नौटंकी कंपनी के मेले में पहुंचाना रहता हैं। रास्ते में हीरामन और हीराबाई के बीच एक कोमल रिश्ता पनपता है। मेले में हीरामन के और भी साथी मिलते है- लालमोहर, धन्नीराम, पलटदास, लहसनवा। हीराबाई हीरामन से खुश होकर उसे नौटंकी कंपनी का पास देती है और अपने दोस्तों के साथ आकर नौटंकी देखने को कहती है। हीरामन मेले से कमाये पैसे हीराबाई के पास जमा किया करता था। कई दिनों तक ऐसे ही चलता रहता है। अचानक हीरामन को पता चलता है कि हीराबाई दूसरे मेले में जा रही है। हीरामन भागता हुआ स्टेशन जाता है। किसी तरह हीराबाई से मुलाकात हो जाती है। हीराबाई उसके जमा किये सारे पैसे दे देती है और कहती है ‘तुम्हारी महुआ घटवारीन को सौदागर ने खरीद लिया’।

हीरामन का मन टूट सा जाता है । वो तीसरी कसम खाता है। सूत्रधार मृदंगिया अपने अंतिम संवाद से इस नाटक का अन्त करता है ।

‘‘ जो ग़मे हबीब से दूर थे वो खुद अपनी आग में जल गये
जो ग़मे हबीब को पा गये वो ग़मों से हंसके निकल गये’’

मंच पर- आदिती सिंह, आदिल रशीद, राहुल कुमार, हीरालाल रॉय, राजनन्दन, अभिषेक आनन्द, अभिषेक चौहान, प्रदीप्त मिश्रा, रन्धीर कुमार ‘समीर’, मनोज मिश्रा, नितीश कुमार, मनीश शर्मा, कुमार उदय सिंह, हरेन्द्र कुमार, राजेश नाथ राम, लाल क्रिशन आनन्द, सुधांशु शेखर और विश्वा।