बिहार चुनावों के परिणाम से तय होगी देश की राजनीति की दिशा

bihar_electionsआखिर बिहार का चुनाव मोदी के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? बिहार चुनाव मोदी के लिए ही नहीं बल्कि लालू और नीतीश के लिए भी अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। अगर बिहार के चुनाव में लालू और नीतीश के गठबंधन की हार होती है तो सामाजिक परिवर्तन के उनके आंदोलन को जबरदस्त झटका पहुंचेगा और इस प्रक्रिया में वह अपनी उपयोगिता खो देगा।

बिहार विधानसभा चुनाव में एक तरफ लालू यादव और नीतीश कुमार की पार्टी और साथ में कांग्रेस है, वहीं दूसरी ओर भाजपा और राम विलास पासवान तथा जीतन राम मांझी की पार्टियां हैं।

राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन के लिए बहुत कुछ दांव पर है और ये दोनों पक्षों की आगे की राजनीति तय करेगा।

बिहार भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। वहां गरीबी और पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण जाति आधारित राजनीति रही है। बिहार में बहुमत पिछड़ी जातियों का है लेकिन राज्य के संसाधन, राजनीति और अर्थव्यवस्था में उच्च जातियों का एकाधिकार रहा है। बिहार की सामंती व्यवस्था को राजनीतिक स्तर पर पहली बार लालू प्रसाद यादव ने चुनौती दी थी।

उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में सामाजिक परिवर्तन की एक नयी राजनीति की शुरुआत की और राज्य के बेजुबानों को जुबान दी। लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन में पिछड़ी जातियों को राजनीति में भागीदारी हासिल हुई।

इसी आंदोलन से निकलने वाले नीतीश कुमार न केवल अत्यंत गरीबों को ऊपर लाये बल्कि उन्होंने राज्य की खस्ताहाल संस्थाओं को बहाल किया और उन्हें स्थिरता प्रदान की। लालू और नीतीश इस समय साथ-साथ खड़े हैं।

दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार का चुनाव जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है। भारत के इतिहास में शायद दूसरा मौका है जब किसी प्रांतीय चुनाव में कोई प्रधानमंत्री इतनी अधिक चुनावी सभाएं कर रहा हो। मोदी की पूरी कैबिनेट, भाजपा के पचासों सांसद और आरएसएस के हजारों कार्यकर्ता बिहार के चुनावी मैदान में दिन रात सक्रिय हैं।

डर इस बात का है कि कहीं बिहार भाजपा के लिए दूसरी दिल्ली ना बन जाये। दिल्ली में भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। वहां भी मोदी की पूरी कैबिनेट, भाजपा के पचासों सांसद और आरएसएस के हजारों कार्यकर्ता बिहार के चुनावी मैदान में दिन रात सक्रिय थे। नतीजा सब जानते हैं।

मोदी और अमित शाह ने दिल्ली चुनाव को नाक का सवाल बना लिया था। अब इस शीर्ष टीम नेे बिहार के चुनाव को फिर एक बार इज्जत का सवाल बनाकर पूरी शक्ति लगा दी है। बिहार के लिए विशेष पेकेज से शुरूआत हुई थी। फिर देश भर में साम्प्रदायिक तनाव और घृणा का दौर भी आकस्मिक नहीं लगता। शायद यह बिहार में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए आवश्यक था।

मुम्बई में पर्यूषण पर्व पर मांस बिक्री पर रोक और शिवसेना का विरोध, फिर गौमांस को लेकर अफवाह के तहत हत्या, सुधीर कुलकर्णी के साथ बदसलूकी, फिर कश्मीर के निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल राशिद की पिटाई और दिल्ली प्रेस क्लब में बदसलूकी, इसके बाद जम्मू में जाहिद अहमद की हत्या और ऐसी ही कई घटनाओं का होना क्या मात्र संयोग है। इस पर केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा और साक्षी महाराज जैसे भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयानों पर मोदी की चुप्पी निश्चय ही संदेह तो पैदा करती है।

भाजपा की जीत से मोदी की ताकत काफी बढ़ जायेगी और उनके लिए उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा आसान हो जायेगी। व्यक्तिगत रूप से मोदी को पार्टी के भीतर मौजूद विरोधियों से खतरा समाप्त हो जायेगा। मोदी किसी हस्तक्षेप के बिना अपने एजेंडे पर अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकेंगे।

लेकिन अगर भाजपा बिहार में हारती है तो पार्टी के भीतर मोदी के खिलाफ विद्रोह शुरू हो सकता है। उनकी निजीकरण की प्रक्रिया से पार्टी के बहुत से नेता दुखी हैं। ख़ुद बिहार के कई नेता मोदी के खिलाफ बयान दे चुके हैं। उधर भाजपा शासित प्रदेशों के क्षत्रप भी मोदी से प्रसन्न नहीं लगते। खास तौर पर राजस्थान और मध्यप्रदेश में जहां मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही भाजपा भारी बहुमत से जीती थी।

पहले दो चरणों के मतदान के बाद भाजपा कैम्प में खलबली मची हुई है। कहने को अमित शाह आधी से अधिक सीटों पर जीतने का दावा कर रहे हैं लेकिन निष्पक्ष पर्यवेक्षकों की राय में भाजपा नीत गठबंधन को भारी नुकसान हुआ है।

बिहार चुनाव के परिणाम सिर्फ लालू और नीतीश के राजनीतिक भाग्य का ही फैसला नहीं करेंगे बल्कि यह परिणाम भारत के भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेंगे।