पेड़ों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

ये पेड़ कहां गये?

ये पेड़ कहां गये?

बिहार, रोहतास। आम तौर पर पर्यावरण को हरा-भरा रखने के साथ ही वातावरण को स्वच्छ बनाये रखने के लिए सरकार द्वारा पेड़-पौधे लगाये जाते हैं. वहीं नहरों की कटाई रोकने के लिए भी वृक्षारोपण किया जाता है, जिसके लिए वन विभाग बाकायदा वैसी नहरों को चिन्हित कर व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण करती है। लेकिन सरकार व स्थानीय प्रशासन की लापरवाही व अनदेखी से आये दिन लकड़ियों के तस्कर अपनी कारगुज़ारियों से न सिर्फ करोड़ों के हरे पेड़ काट लेते हैं बल्कि सरकारी राजस्व को क्षति पहुंचाने के साथ ही नहरों को असुरक्षित करने और कीमती लकड़ियों की कालाबाजारी भी करते हैं। इस पर प्रशासन की खामोशी पूरे मामले को और पेचीदा बना देती है।

हैरत की बात है कि पेड़ों की देखभाल करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही से संबंधित दोनों महकमे, वन विभाग और सिंचाई विभाग, एक-दूसरे पर दोषारोपण कर जिम्मेदारी थोपने में संलग्न रहते हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग से पृथ्वी को बचाने के लिए वैसे तो देश भर में पौधारोपण व हरे पेड़ों को बचाने के लिए सरकार जोर-शोर से प्रयासरत है और इस पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बरबाद किये जा रहे हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर इसकी समुचित देखभाल और सुरक्षा की व्यवस्था दुरुस्त न होने से देश भर में पेड़ों के तस्कर न सिर्फ करोड़ों रुपये के राजस्व की हानि पहुंचाते हैं बल्कि पर्यावरण को स्वच्छ रखने के कई प्रयासों को धक्का पहुंचा रहे हैं।

इस स्थिति में सवाल उठता है कि पेड़ों की देखभाल व सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? वैसे तो हरे पेड़-पौधों को काटने का गिरोह पूरे देश और बिहार के सभी जिलों में सक्रिय है। ऐसा एक मामला रोहतास जिले में भी सामने आया है। वहां पिछले कई वर्षों में सुनियोजित तरीके से वन तस्कर न सिर्फ करोड़ों रुपये के कीमती पेड़ों को काट दिया गया बल्कि नहरों पर कटाव का एक बड़ा खतरा भी उत्पन्न हो गया है। गौरतलब है कि करीब दो दशक पूर्व वित्तीय वर्ष 1993-94 में सोन उच्चस्तरीय नहर प्रमंडल अंतर्गत कोनकी गांव एवं दरिगांव नहर तट पर रैखिक वनरोपण कार्यक्रम में जवाहर रोजगार योजना के तहत वृहद पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया। उस समय वन विभाग ने कुल 42880 शीशम व अन्य इसी तरह की प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाये थे। इनकी देखभाल के लिए वन विभागीय कर्मी के रूप में लाल बिहारी राम वनपाल और गणेश पांडेय को वनरक्षी के रूप में तैनात किया गया। वन विभाग का आंकड़ा कहता है कि मौजूदा समय में महज 5000 के आसपास ही पेड़ बच पाये हैं। जबकि सही संख्या क्या है यह नहरों की स्थिति देखकर ही पता चल जाता है कि वहां हकीकत में अब पेड़ों की संख्या हजार भी नहीं है।

हरे पेड़ों को काटने और तस्करी करने में एक पूरा गिरोह पिछले कई वर्षों से लगा हुआ है। एक समय इन पेड़ों से पूरा वातावरण हरा-भरा हो गया था। पिछले सात वर्षों से हरे पेड़ों की अनवरत कटाई होने से नहर टूटने की आशंका काफी बढ़ गयी है। जिससे नहर के दक्षिणी हिस्से के जलमग्न होने की आशंका भी बढ़ गयी है। इस पूरे मामले को अंजाम तक पहुंचाने वाले मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष व आरटीआई कार्यकर्ता शीतला प्रसाद तिवारी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से हरे पेड़ों की अवैध कटाई पर न तो वन विभाग का ध्यान था और न सिंचाई विभाग का जबकि इस संबंध में दोनों विभागों के कई वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गयी।

पेड़ों की मौजूदा संख्या और सुरक्षा समेत तमाम जानकारी सूचना के अधिकार से ही प्राप्त हुआ। जबकि 2012 में ही जन शिकायत प्रकोष्ठ में हरे पेड़ों को काटने का मामला पहुंचा तो तत्कालीन डीएफओ एस चंद्रशेखर ने इस पर त्वरित करते हुए छापेमारी कर 18 इंच-24 इंच गोलाई के 11 शीशम के पेड़ बरामद किये थे। तब सक्षम न्यायालय में वन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज भी किया गया था लेकिन बाद में कार्रवाई के नाम पर कोई खास सफलता विभाग को नहीं मिली। जहां कार्रवाई की प्रक्रिया आज भी महज़ फाइलों में सिमट कर रह गयी है। जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। जिम्मेदारी लेने से बच रहे दोनों विभाग नहरों के किनारे लगे पेड़ों को बचाने और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी है, यह भी एक अहम सवाल बना हुआ है।

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचना से यह खुलासा हुआ कि नहरों के किनारे पर लगाये गये पेड़ भगवान भरोसे ही हैं। कारण कि पिछले कुछ वर्षों से पेड़ों की सही संख्या और इनकी देखभाल की जिम्मेदारी के बारे में पूछा गया तो चकित करने वाली जानकारी मिली। दोनों विभाग एक-दूसरे पर पेड़ों की सुरक्षा की बात थोपते हैं। नियम कहता है कि वृक्ष रोपने से लेकर अगले तीन वर्षों तक वन विभाग को इसकी देख-रेख करनी होती है। इसके बाद जहां पेड़ लगाये जाते हैं, देख-रेख उनकी जिम्मेदारी हो जाती है। लेकिन यहां दोनों विभाग एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में जुटे हैं। अब जिम्मेदारी चाहे जिसकी भी हो लेकिन इस बीच करीब 35000 पेड़ तस्कर चुरा ले गये।

विभागीय सूत्र बताते हैं कि इन पेड़ों की बाजार कीमत 25 करोड़ से अधिक है। तो आखिर करोड़ों के पेड़ों की चोरी में कहीं यहां की स्थानीय पुलिस भी संलिप्त तो नहीं। वैसे भी इस नहर से जुड़े बड्डी थाना महज दो किलोमीटर पर स्थित है जहां थाने में अक्सर जंगल की लकड़ियां दिखायी देती है।