बिहार की हार की जिम्मेदारी भी मोदी की ही है

–यदि लोकसभा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कुछ हद तक जम्मू कश्मीर की जीत का सेहरा मोदी के सिर बंधा था तो दिल्ली और बिहार की हार की जिम्मेदारी भी मोदी की ही है। यह उन्हें स्वीकार करना ही होगा।–

8 नवम्बर। बिहार के चुनाव ने इस बार सबको फेल कर दिया है। ऐसे पत्रकारों को भी जो दिल से मोदी की जीत चाहते थे और उन्हें भी जिन्हें परिणाम के एक दिन पहले लगने लगा था कि मोदी का जो हल्ला था बस हल्ला ही था। सब मान कर चल रहे थे कि कांटे की टक्कर है। कुछ इसमें त्रिशंकु विधानसभा की सम्भावनाएं देख रहे थे। दूसरे चरण के मतदान के बाद लग रहा था कि महागठबंधन जीत रहा है। तीसरे चरण के साथ ही भाजपा की जीत के दावे किये जाने लगे। बिहार के मतदाता ने सबके पसीने छुड़ा दिये। दरअसल यह चुनाव राजनैतिक दलों ने कम पत्रकारों और विश्लेषकों ने ज्यादह लड़ा।
चाणक्य के एग्जिट पोल के अनुसार बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 155 सीटें मिलनी थी। यहां तो मामला उलटता दिख रहा है। इसी चाणक्य ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय भाजपा को 22 सीटें दी थी, मिली सिर्फ तीन सीटें। महाराष्ट्र में 151 सीटें दी थी, आयी 123। झारखंड विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 61 सीटें दी थीं, मिली 37। बिहार में भाजपा की नहीं बल्कि चुनावी नजूमियों की हार साबित हुई।

भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनावों में जो भारी जीत मिली थी उसे भाजपा के प्रवक्ताओं और संघ के कार्यकर्ताओं ने नरेन्द्र मोदी की जीत की संज्ञा दी थी। उन्होंने मान लिया था कि यह मोदी की आंधी थी। भाजपा के लिए 2002 के गुजरात के नायक को देश का नायक मान लेने की मजबूरी रही है। 2002 की घटनाओं के संदर्भ में संघ परिवार ने मोदी को हीरो बना दिया था। उस हादसे के अलावा मोदी के सीवी में कोई ऐसी विशेषता नहीं थी कि वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की पंक्ति लांघ कर देश के प्रधानमंत्री बनाये जाते। उन्हें गुजरात के विकास पुरुष की तरह स्थापित करने में किन एजेंसियों का हाथ है, सब जानते हैं। गुजरात के विकास की हकीकत की कहानियां जल्दी ही पाठकों को पढ़ने के लिए मिलेंगी। अभी तो बात दिल्ली और बिहार के संदर्भ में करेंगे।

पहले तो मई 2014 का एक छोटा सा आकलन कर लिया जाये। कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रजातांत्रिक गठबंधन के दूसरे कार्यकाल ने देश की मध्यममार्गी राजनीति को दूषित किया। हर तरीके के भ्रष्टाचार की कहानियां सामने आयी। टूजी से लगाकर कोलगेट तक हजारों करोड़ रुपयों के भ्रष्टाचार के समाचारों ने देश को हिला दिया। इसके साथ ही बढ़ती हुई महंगायी ने आम जनता की कमर तोड़ दी। भाजपा के चुनाव मैनेजरों ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया।

संप्रग के अकूत भ्रष्टाचार के कारण महंगायी बढ़ी, यह जनता के मन में बैठ गया। लोगों के दिलों-दिमाग में कांग्रेस पर गुस्सा छाया हुआ था। देश की जनता में संप्रग और खास तौर पर कांग्रेस के कुशासन के प्रति नाराजगी ने उसे दूसरा विकल्प खोजने के लिए मजबूर कर दिया। भाजपा के अलावा और कोई विकल्प जनता के पास था नहीं। भ्रष्टाचार और कुशासन से त्रस्त जनता ने राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा को चुना। इसी क्रम में लोकसभा चुनावों में मोदी की आंधी चलायी गयी और भाजपा के चुनाव मैनेजरों ने मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित कर दिया।

मई 2014 के बाद से मोदी और भाजपा का ग्राफ गिरता जा रहा है। भाजपा और संघ परिवार के नेताओं ने जिस तरीके से गैरजिम्मेदाराना बयान दिये और भाजपा के प्रवक्ताओं ने मीडिया में ऐसे बयानों सही ठहराने की कोशीश की, यह भाजपा के चुनावी भविष्य के लिए सही साबित नहीं हुआ। भाजपा नेताओं ने एक सोची समझी रणनीति के तहत साम्प्रदायिक सदभाव के माहौल में जहर घोलकर धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने का प्रयत्न किया वो देश की जनता को अच्छा नहीं लगा। ध्रुवीकरण के षड़यंत्र को विकास की शक्ल देने की कोशीश की गयी। इसके साथ ही, ऐसे जहरीले बयानों पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी ने यह भरोसा दिला दिया कि वे इन बयानों से सहमत हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त जैसी धारणा थी वैसी ही धारणा अभी बिहार को लेकर बनायी गयी। जैसे अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में खत्म हुआ माना गया, वैसे ही प्रचार किया गया कि लालू यादव की संगत से नीतिश कुमार भी समाप्त हो जायेंगे। जैसे दिल्ली के वक्त जैसा हुआ वैसा ही बिहार में हो रहा है। दिल्ली में भी भाजपा ने अपने पूरे साधन झोंक दिये थे। सारी मोदी केबिनेट, सारे देश के भाजपाई नेता, सभी भाजपाई मुख्यमंत्री, सारे संघी सभी तो लगे थे दिल्ली में राजनीति के नौसिखिया केजरीवाल को हराने में। केजरीवाल के सामने किरण बेदी को खड़ा किया गया। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की जनता ने मोदी पार्टी को धूल चटा दी।

बिहार में कमोबेश यही हुआ। यहां भी भाजपा ने अपने घोड़े खोल दिये। सारा बिहार मानों अश्वमेध के भाजपायी घोड़ों से पट गया लेकिन यहां के मतदाता को नहीं पटा पाये। बिहार में भाजपा मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा सामने लाने की रिस्क नहीं उठायी। दिल्ली में नतीजा देख चुके थे। यहां नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नाम पर चुनाव लड़ा गया फिर भी हार का मुंह देखना पड़ा।

क्या नरेन्द्र मोदी का बड़बोलापन, या संघ परिवार की जहरीली बयानबाजी, या मोहन भागवत का आरक्षण सम्बंधी बयान भाजपा की हार के कारण बना या फिर यह चुनाव केन्द्र में मोदी की सरकार के कामकाज का जनमत संग्रह हुआ है यह आकलन अभी बाकी है।

 

यदि लोकसभा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कुछ हद तक जम्मू कश्मीर की जीत का सेहरा मोदी के सिर बंधा था तो दिल्ली और बिहार की हार की जिम्मेदारी भी मोदी की ही है। यह उन्हें स्वीकार करना ही होगा।