जो जीतने पर अपनी वाहवाही कर रहे थे, वो हार मिलने पर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं

बिहार की हार के कारणों की विवेचना के संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के हाईकमान की बैठक में यह तय पाया गया कि हार के लिए सामूहिक जिम्मेदारी है। यानि कि हार के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है। पिछले साल ही आयी एक फिल्म याद आगयी। नाम है, ‘नो बडी किल्ड जेसिका’। जेसिका को किसी ने नहीं मारा। सच्चाई तो यह थी कि जेसिका की गोली मार कर हत्या की गयी थी। कोई तो था जिसने जेसिका को मारा। यहां भी सच्चाई यह है कि भाजपा की बड़ी हार हुई है। और कहा यह गया कि कोई भी जिम्मेदार नहीं है।

लगता है दिल्ली की शर्मनाक हार के बाद भी भाजपा और संघ परिवार ने कोई पाठ नहीं सीखा है। अभी भी हिन्दू राष्ट्र का सपना पाले बैठे हैं। उन्हें जमीनी हकीकत से गुरेज है। वे देखना और समझना ही नहीं चाहते कि जिस देश  के नागरिक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व चाहते हैं वहां कुछ लोगों को बरगलाकर कुछ समय तक के लिए सत्ता प्राप्त की जा सकती है लेकिन सदा के लिए सबको बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। बकौल सामना ‘‘राजनीति में, धूर्तता हमेशा काम नहीं आती।’’

joshi_advani_party_loosing_groundऐसा नहीं कि भाजपा के विरोधी ही यह बात कह रहे हैं बल्कि इनके वरिष्ठ नेता – लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा और शांता कुमार भी यही बात कह रहे हैं। इन नेताओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के खिलाफ असंतोष है। इनका कहना है कि पिछले एक साल में पार्टी शक्तिहीन हुई है और उसे कुछ मुट्ठी भर लोगों के अनुसार चलने पर मजबूर किया जा रहा है।

भाजपा में निर्विवाद नेता के तौर पर उभरने और मई में सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी को पहले बड़े असंतोष का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें इन दिग्गजों ने  कड़े शब्दों में एक बयान जारी कर बिहार की हार की संपूर्ण समीक्षा की मांग उठायी। बयान में कहा गया कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार से कोई सबक नहीं सीखा गया।

उन्होंने कहा कि हार के लिए सबको जिम्मेदार बताना खुद को बचाना है। इन नेताओं ने कहा कि हार की वजहों की पूरी समीक्षा हो और इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। यह दिखाता है कि जो लोग जीतने पर अपनी वाहवाही कर रहे होते, वो करारी हार मिलने पर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। बीजेपी के इन वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक बिहार में हार की मुख्य वजह पिछले एक साल में पार्टी का प्रभाव घटना है। उन्होंने कहा कि हार के कारणों की विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए।

बिहार के चुनाव परिणाम को कई लोग नरेंद्र मोदी सरकार के 18 महीने के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया मान रहे हैं। लेकिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हार के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। राजनाथ ने साथ ही यह भी कहा कि हम जनता का मूड नहीं समझ पाये, सामाजिक गणित हमारे खिलाफ था, जिसके कारण हार हुई।

dr_bhola_singh_mpइस बीच, भाजपा ने सांसद भोला सिंह जिन्होंने सीधे मोदी और शाह पर निशाना साधा है। भोला सिंह के अलावा बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह तथा हुकुमदेव नारायण यादव भी पार्टी की रणनीति की आलोचना कर चुके हैं। राज्य के बेगूसराय क्षेत्र से सांसद भोला सिंह ने मंगलवार को कहा कि बिहार की हार के लिए पार्टी नेतृत्व जिम्मेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि इस चुनाव में बीजेपी हारी नहीं है, बल्कि उसने आत्महत्या कर ली है।

अपने बयान में परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए भोला ने कहा, ‘‘हार की जिम्मेदारी सेनापति की होती है। बिहार में बीजेपी का कोई स्थापित नेतृत्व नहीं है। केन्द्र ने भी बिहार को यही संदेश दिया है।’’ भोला ने कहा, ‘‘रोजी-रोटी के बदले गाय और पाकिस्तान को चुनावी मुद्दा बनाया गया। मुझे पार्टी की नाव डूबने का दुख नहीं, लेकिन जहां नाव डूबी, वहां घुटने भर पानी था।’’ उन्होंने कहा, ’’राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिये गये बयान का भी बिहार की जनता पर उल्टा असर पड़ा, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।’’

jeetan_ram_manjhiभाजपा की सहयोगी पार्टी ने भी आरोप लगाया कि मोहन भागवत का आरक्षण मुद्दे पर बयान गलत समय पर आया। हम सेक्युलर ने 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे और उम्मीद की जा रही थी कि वह दलित और महादलित मतदाताओं को एनडीए के पक्ष में कर पायेगी। पार्टी प्रमुख जीतनराम मांझी इमामगंज विधानसभा क्षेत्र से तो जीत तो गये, लेकिन वह अपनी पुरानी सीट मखदूमपुर पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पाये।

मांझी ने कहा कि महागठबंधन के हाथों हार का कारण गोमांस और पाकिस्तान में पटाखा फूटने वाली टिप्पणी भी रही। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियों से मुसलमानों के बीच भय का माहौल बना और वे महागठबंधन के पक्ष में एकजुट हो गये। मांझी ने कहा कि (बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की) पाकिस्तान में पटाखे फूटने की टिप्पणी को मुस्लिम समुदाय ने जानबूझकर उन्हें चिढ़ाने के लिए की गयी टिप्पणी माना।

बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को मिली करारी हार को वैश्विक मीडिया ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘सबसे अहम घरेलू झटका’ बताया है। इसके साथ ही इनमें कहा गया है कि यह हार दिखाती है कि वोट हासिल करने की उनकी क्षमता अब कम होती जा रही है।

ब्रिटिश अखबार ‘दि गार्जियन’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘‘बिहार चुनाव जीतने में बीजेपी की नाकामी को इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि वोटरों पर मोदी की अपील अब कम होनी शुरू हो गई है।’’ अखबार ने कहा, ‘‘भारत की सत्ताधारी पार्टी ने एक प्रांतीय चुनाव में हार मान ली है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र की वोट हासिल करने की क्षमता और उनकी राजनीतिक रणनीति की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था।’’ अखबार ने कहा, ‘‘पिछले साल के चुनाव के दौरान मोदी ने अर्थव्यवस्था को नयी उंचाइयों तक ले जाने के जो भी वादे किये थे वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं।’’

बीबीसी ने लिखा, ‘‘मोदी को पिछले साल के राष्ट्रीय चुनावों में एक शानदार जीत मिली थी, लेकिन यह चुनाव उनके आर्थिक कार्यक्रमों पर एक रायशुमारी के तौर पर देखा जा रहा था। यह हार एक बड़ा झटका है।’’

वहीं पाकिस्तान के बड़े अखबार ‘डॉन’ ने कहा कि खानपान की आदतों पर भारत की पारंपरिक सहनशीलता की कीमत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गाय पर राजनीति के खिलाफ बिहार चुनाव के नतीजे आये हैं। इसने उनके ‘संकीर्ण राष्ट्रवाद’ के खिलाफ विपक्षी एकता के एजेंडा को तय कर दिया है।

‘दि न्यूज’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बिहार में बीजेपी की हार प्रधानमंत्री के लिए बड़ा झटका है जिन्होंने अपने प्रचार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

newyork_timesअमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने मंगलवार को अपने संपादकीय में कहा कि बिहार चुनाव के नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नफरत फैलाने पर लगाम लगाने का संदेश दिया है। अखबार ने लिखा है कि भारत में बीते साल आम चुनाव के दौरान मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का वादा किया था। जनसंख्या के मामले में भारत के तीसरे सबसे बड़े राज्य बिहार के वोटरों ने विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को खारिज कर दिया।

अखबार का कहना है कि बतौर प्रधानमंत्री, मोदी ने अभी तक कोई बड़ा आर्थिक कदम नहीं उठाया है। लेकिन, ‘‘इस बीच उनकी सरकार और पार्टी के सदस्यों ने सांप्रदायिक तनाव भड़काकर उनके (मोदी) सभी को साथ लेकर चलने के वादे को अलग-थलग जरूर कर दिया।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘राजनीति को धार्मिक नफरत के जहर से भरने का नतीजा देश की आर्थिक क्षमताओं को गंवाने की शक्ल में ही सामने आयेगा। वह भी, एक ऐसे समय में जब दक्षिण एशिया और विश्व में भारत को अधिक बड़ी और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।’’

न्यूयॉर्क टाइम्स ने गोमांस मुद्दे पर कुछ मुसलमानों की हत्या का जिक्र करते हुए लिखा कि मोदी ने मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की गुहार के बावजूद इन हत्याओं की सख्ती से निंदा नहीं की। उन्होंने भाजपा मंत्रियों और नेताओं की नफरत भरी और असंवेदनशील बातें सहीं। अखबार ने लिखा है कि कई राजनैतिक विश्लेषक इस हार को ‘मोदी को नकारना’ बता रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव प्रचार मोदी पर केंद्रित था। स्थानीय नेताओं की तस्वीरें विज्ञापनों से गायब थीं।

संपादकीय में कहा गया है कि खुद मोदी ने सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश की। आरक्षण के मुद्दे पर कहा कि अभी यह जिन्हें मिल रहा है, उनसे इसका कुछ हिस्सा लेकर एक ‘समुदाय विशेष’ को दे दिया जाएगा। इशारा मुसलमानों की तरफ था। अखबार ने लिखा है कि बिहार के मतदाताओं ने भाजपा की बांटने वाली इन बातों को समझ लिया। ये मतदाता और पूरे भारत वासी ऐसा नेता चाहते हैं जो उनका जीवन स्तर सुधारें।

एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि बिहार में भाजपानीत राजग की हार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत हार है। ओवैसी ने कहा, ‘इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह मोदी की व्यक्तिगत हार है। क्योंकि, स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहले कभी हमने वर्तमान प्रधानमंत्री को चुनावों में इस कदर शामिल होते और 35 से ज्यादा जनसभाएं संबोधित करते हुए नहीं देखा।’

बिहार चुनाव में मिली करारी हार से उबरने की कोशिश कर रही भाजपा पर उसके सहयोगी दल शिवसेना ने एक और वार करते हुए कहा है कि राजनीति में ‘धूर्तता’ हमेशा काम नहीं आती और अगर वादे पूरे नहीं किये जाते तो आम आदमी तो जवाब देगा ही।

samna_rebutशिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में छपे संपादकीय में कहा गया, कई बार एक लहर आती है और चली जाती है। एक बार यह चली जाती है तो फिर लहर का निशान भी नहीं दिखता। यह सच है कि भाजपा को लोकसभा चुनाव में भारी जीत मिली, लेकिन उस जीत का श्रेय कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कमजोर और अप्रभावी नेतृत्व को जाता है।

शिवसेना ने कहा, (राजनीतिक) अखाड़े में कोई मजबूत ‘पहलवान’ नहीं था इसलिए वह (भाजपा) ‘बाहुबली’ के रूप में उभरकर आयी। शिवसेना ने दूसरों को अहं भावना छोड़ने की सलाह देने वाले भाजपा के नेताओं का मजाक भी बनाया। संपादकीय में यह भी कहा गया कि ‘‘राजनीति में, धूर्तता हमेशा काम नहीं आती।’’