मेडल लौटाकर अपना विरोध प्रकट करने वालों का अपमान कर रहे हैं पर्रिकर साहब

—पूर्व सैनिकों ने ये मेडल अपने वीरता से हासिल किये हैं। किसी सरकार की मेहरबानी नहीं है। ये मेडल लौटाकर पूर्व सैनिक व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश दर्ज करा रहे हैं। राजनीति में बैठे सत्ताधरियों को हर विरोध का स्वर राजनीति लगता है।—

14 नवम्बर। देश में 24 लाख से अधिक पूर्व सैनिक और छह लाख से अधिक शहीदों की पत्नियां हैं। जिन सैनिकों ने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, आज देश के रक्षामंत्री उनकी वन रैंक वन पेंशन के पूर्ण लाभों की मांग को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। आरोप रक्षामंत्री लगा रहे हैं और चाहते हैं कि सैनिक साबित करें कि वे राजनीति नहीं कर रहे।

 

ex_servicemen_returning_medalsएक ओर पर्रिकर ने पूर्व सैनिकों के मेडल को राष्ट्र और सशस्त्र बलों का अपमान बताया तो दूसरी ओर सैनिकों की वाजिब मांग को राजनीति से प्रेरित बता कर उनका अपमान किया। पूर्व सैनिकों ने ये मेडल अपने वीरता से हासिल किये हैं। किसी सरकार की मेहरबानी नहीं है। ये मेडल लौटाकर पूर्व सैनिक व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश दर्ज करा रहे हैं जैसे लेखकों और साहित्यकारों ने अपने सम्मान लौटाये थे। राजनीति में बैठे सत्ताधरियों को हर विरोध का स्वर राजनीति लगता है।

पर्रिकर ने सोमवार को कहा था कि सारी मांगें पूरी नहीं की जा सकती। पूर्व सैनिक इसी बयान से नाराज हैं और उन्होंने अपना आंदोलन तेज कर दिया है। सैनिकों ने कहा था कि उनकी केवल ‘वन रैंक-वन पेंशन’ की एक ही मांग है। मंगलवार से अपने मेडल वापस करना शुरू कर अपना आंदोलन तेज कर दिया है। इस पर पर्रिकर ने कहा कि, ‘‘यदि किसी को कोई शिकायत है तो कमीशन में दर्ज करायें। उन्हें मेडल लौटाने की जरूरत नहीं है। उनकी मांगों का एक बड़ा हिस्सा मान लिया गया है। जो मांग पिछले 50 साल से सुनी नहीं, जा रही थी उसे हमने पूरा कर दिया।’’ पर्रिकर ने कहा कि, ‘‘उनको गुमराह किया गया है।’’

सैनिकों की मांग है वन रैंक वन पेंशन। विभिन्न समय में रिटायर होने वाले सैनिकों को अपने अपने समय में मिलने वाले वेतन के अनुसार पैंशन मिलती रही है। लेकिन सैनिकों की मांग है कि किसी जूनियर को उसके सीनियर से अधिक पेंशन नहीं मिलनी चाहिए।

एक ओर सरकार इन्हीं सैनिकों और शहीदों के बल पर 1965 के युद्ध में पाकिस्तान पर मिली जीत का जश्न मना रही है और दूसरी ओर इन्हें अपनी वाजिब मांगों के लिए आंदोलन की राह पकड़नी पड़ रही है। एक ओर देश के धन को लूटने वाले राजनेताओं और नौकरशाहों के वेतन और पेंशन में बिना किसी ना नुकुर के मनचाही वृद्धि होती रही है तो दूसरी ओर देश की रक्षा करने वालों की छोटी सी मांग को पूरा करने में सरकारी तंत्र को गुरेज है।

जिस देश में लाखों करोड़ रुपया सैनिकेां के कफन, 2जी, कोलगेट, सिंचाई योजनाओं, हथियार खरीद, चारा, व्यापम में चुरा लिया जाता है, सरकार सैनिकों के लिए आठ दस हजार करोड़ रुपया देने में हिचकिचा रही है।

जहां तक राजनीति करने का सवाल है, अव्वल तो पूर्व सैनिकों की मांग को राजनीति कहना उचित नहीं है। और गर राजनीति है भी तो क्या राजनीति करने का हक सिर्फ राजनेताओं, उनकी औलादों और उनके चमचों को ही है। जब अभिनय क्षेत्र से हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी, उद्योगपति नवीन जिन्दल, कर्नल किरोड़ी बैंसला, डॉ किरोड़ी मीणा, पूर्व सैनिक जनरल वी के सिंह, जसवंत सिंह, पत्रकार एम जे अकबर और इंजीनियर मनोहर पर्रिकर सभी को राजनीति करने का हक है तो अपनी वाजिब मांगों के लिए आंदोलन करने के लिए पूर्व सैनिकों को राजनीति करनी भी पड़े तो पर्रिकर साहब को ऐतराज क्यों हैं?