चैन्नई बाढ़ः झीलों पर अतिक्रमण

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–रवीश कुमार की कलम से: साभार एनडीटीवी–

चीजें वैसी ही चलती रहेंगी लेकिन हमारी ख़ूबी ये है कि हम एक दिन के लिए तो जागते हैं। जब जागते हैं तब दिन भर के लिए जागते हैं। उसके बाद चीजें फिर से वैसी ही चलने लगती हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में 1997-98 के आंकड़े के हिसाब से 355 तालाब थे और 44 झीलें थीं।

इंटैक नाम की संस्था ने जब झीलों को लेकर सर्वे किया तो पता चला कि पंद्रह साल में आधी से ज्यादा झीलें गायब हो चुकी हैं। इन सब पर बिल्डरों ने सरकार की अनुमति से मकान बना लिये हैं। मकानों की कीमत बढ़ती गयी तो लोगों ने तालाब तक भर डाले। हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि दो साल पहले चेन्नई की तरह दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी मानसून की बरसात में डूब चुका था।

यात्रियों को घुटने भर पानी में चलना पड़ा था। जिस दिन ये कांड हुआ उस दिन दिल्ली में 36.6 मिमि बारिश हुई थी लेकिन हवाई अड्डे के पास 117.8 मिमि बारिश हो गयी थी। वो भी साढ़े चार घंटे में। अधिकारियों की तरफ से अजीब तर्क दिये गये कि बारिश जरूरत से ज्यादा हो गयी और आस पास के इलाकों में पानी की निकासी की खराब व्यवस्था के कारण हवाई अड्डे में पानी भर गया।

जैसे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने से पहले लोगों को ध्यान ही नहीं आया कि यहां बारिश भी हो सकती है। कई बार हम सौ साल के रिकार्ड के आधार पर कहने लगते हैं कि इतनी बारिश साठ साल बाद हुई या सौ साल बाद हुई। करोड़ों साल की उम्र है धरती की। क्या हम सौ साल के आंकड़े के हिसाब से दावा कर सकते हैं। जाहिर है एयरपोर्ट बनाते समय इन सब बातों का ध्यान रखा जाना कितना जरूरी है।

जिस जगह पर आज 9000 करोड़ के बजट वाला दिल्ली का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है वहां कभी दस बड़े तालाब हुआ करते थे। जो शायद इतनी बारिश के पानी को सोख लेते होंगे। अब तालाब भर कर हवाई अड्डा बन जाये तो पानी नीचे कैसे जायेगा।

दरअसल नदी तालाबों की जगह पर निर्माण कार्य करेंगे तो ऐसे ही परिणाम आयेंगे। जब हवाई अड्डा डूब जाये तो समझिये कि विकास के नाम पर हमने जो किया है उसकी सजा भुगतने का वक्त आ गया है। बल्कि हम किश्तों में भुगत रहे हैं। कोसी नदी की बाढ़ में भुगत रहे हैं, केदारनाथ की त्रासदी की सज़ा भुगत चुके हैं, झेलम नदी की सजा भुगत चुके हैं।

जानकारों बताते हैं कि चैन्नई एयरपोर्ट अडियार नदी के फ्लड बेसिन पर बना है। जब भी नदी में बाढ़ आयेगी तो एयरपोर्ट को नुकसान उठाना ही पड़ेगा क्योंकि बाढ़ के दिनों में नदी का पानी जहां तक जाता ह वहां तक एयरपोर्ट बना हुआ।
आप नदी के किनारे कुछ भी बना लीजिए, वो कितनी भी सूख जाएं लेकिन एक न एक दिन लौट कर आती ही हैं। यमुना नदी का पानी दिल्ली में भर जाता है और मिठी नदी का पानी भी मुंबई को डुबो देता है। चैन्नई देश का चौथा बड़ा एयरपोर्ट है। हर दिन यहां पंद्रह लाख यात्री आते हैं। नदी के ऊपर रनवे होने का गौरव चेन्नई को ही प्राप्त है और अब नदी को भी एयरपोर्ट को डुबो देने का गौरव प्राप्त हो चुका है।

आपको 2008 में बिहार में कोसी नदी में बाढ़ आयी थी। राष्ट्रीय मीडिया को जब तक खबर लगती तब तक कोसी बीस लाख लोगों को विस्थापित कर चुकी थी। तीन लाख घरों को तबाह कर दिया था।
कारण सिम्पल है। कोसी नदी के दोनों तरफ बांध बना दिया गया। नदी का गाद जमा होते होते नदी बांध के ऊंचाई से ऊपर बहने लगी। बारिश के कारण पानी इतना जमा हो गया कि कई जगहों पर पानी की रफ्तार से बांध में दरार आ गयी। सबको पता था कि कोसी नेपाल से भारी मात्रा में गाद लेकर आती है।

सबको यह भी पता था कि बारिश के समय कोसी आस पास के इलाकों में फैल जाती है और तबाही भी मचाती है। लेकिन बांध बनते ही इसके फैलाव वाली जगह में लोग घर बनाने लगे। पहले इस इलाके के बच्चे बच्चे को तैरना आता था। लोगों के पास नावें होती थीं क्योंकि कोसी की बाढ़ का पता था। मगर बांध पर इतना भरोसा हो गया कि तैरने वाला समाज तैरना भूल गया। कोसी की गाद निकालना किसी के बस की बात नहीं।

तबाही ऊपर से नहीं आती है। हम तबाही का कारण खुद से जुटा कर रखते हैं। हमारा सारा फोकस राहत और बचाव कार्य के बहादुरी के किस्सों पर ही टिक जाता है और उसी की वाहवाही के बाद हम सामान्य हो जाते हैं। सरकार को भी बचकर निकल जाने का मौका मिल जाता है। चेन्नई की बाढ़ के बाद भी हम यमुना नदी के किनारे बसे मकानों को देखने नहीं जायेंगे। आप निजामुद्दीन पुल या एक्सप्रेस वे देखियेगा तो पता चलेगा कि यमुना के बहाव क्षेत्र में कितने मंदिर और मकान बन चुके हैं। पर क्या आपको लगता है कि यह बात आप तभी जानेंगे जब मीडिया बतायेगा।

अंग्रेजों के समय तक मद्रास प्रेसिडेंसी में 53,000 तालाब थे। वहां सन 1885 में सिर्फ 14 ज़िलों में कोई 43,000 तालाबों पर काम चल रहा था। ये जानकारी अनुपम मिश्र की किताब से है जो उन्होंने 1993 में लिखी थी। मद्रास प्रेसिडेंसी ब्रिटिश हुकूमत की प्रशासनिक ईकाई थी। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, केरल और कर्नाटक का कुछ हिस्सा मद्रास प्रेसिडेंसी में आते थे। बिल्डरों ने इन तालाबों को भर कर प्लाट काट कर लोगों को बेच दिया। लोगों ने सपना समझ कर मकान खरीदा, मकान मौत का सामान बन गया। आम तौर पर किसी भी नदी की उम्र लाखों करोड़ों साल होती है। हम बीस तीस साल के अनुभव के देखकर उसके फैलाव की जमीन को भर देते हैं।

जब बारिश हो जाती है तो हल्ला करने लगते हैं कि सौ साल में ऐसी बारिश नहीं हुई। पर क्या आप और हम या कोई भी दावा कर सकता है कि ऐसी बारिश हजार साल में बीस बार नहीं हुई होगी। जब होती होगी तब यह अडयार नदी कहां कहां फैलती होगी। क्या अडयार नदी के लिए फैलने की ऐसी जगह बची होगी।

अगर तालाब, नदी के किनारे की दलदल जमीन बची होती तो बारिश के पानी को सोखने का रास्ता मिलता, बहने का रास्ता मिलता। रिजर्वोयर में सुरक्षा से अधिक पानी होने की वजह से बाद में 25000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। ये पानी अडियार नदी में आने से उसका जलस्तर और बढ़ गया है।