दिल्ली और बिहार के बाद भाजपा फिर हारी

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गुजरात में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस को अप्रत्याषित सफलता मिली है। इन चुनावों के नतीजों से कांग्रेस उत्साहित है। कहने को तो ये निगमों, ब्लॉकों का चुनाव है लेकिन इसे 2017 के विधानसभा चुनावों का सेमी फाइनल कहा जारहा है। यह इसलिए भी जरूरी है कि इसी तरह बीजेपी ने भी बंगलौर कॉरपोरेशन में जीत और केरल में एक जगह जीतने का भी जश्न मनाया था। अब कांग्रेस भी गुजरात का जश्न मना रही है।

गुजरात के इस स्थानीय निकाय चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस ने काफी अच्छा किया है। 31 जिला पंचायत में से 23 पर कांग्रेस जीती है तो बीजेपी 8 पर जबकि जिला पंचायत की 988 सीटों में से 472 पर कांग्रेस और 292 पर बीजेपी है। वहीं 230 तालुक पंचायत में 151 पर कांग्रेस और 77 पर बीजेपी का कब्जा है।

शहरी क्षेत्र पर बीजेपी ने अपना दबदबा कायम रखा है। बीजेपी अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, जामनगर, राजकोट और भावनगर कारपोरेशन पर कब्जा जमाये हुए है जबकि 55 नगर पालिकाओं में से 41 पर बीजेपी और 12 पर कांग्रेस पार्टी जीती है।

इन स्थानीय चुनावों के नतीजों को विधान सभा में बदल कर देखें तो 105 सीटों पर कांग्रेस आगे है वहीं 77 पर बीजेपी। गुजरात के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता की मानें तो बीजेपी की ये हार मोदी के गुजरात मॉडल की भी हार है। इस मॉडल से गांव के लोगों को कोई फायदा नहीं पहुंचा है। यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को सफलता मिली है। किसानों में बीजेपी सरकार के लिए गुस्सा है, लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल है कि इतने बड़े पटेल आंदोलन के वाबजूद राजकोट कारपोरेशन कांग्रेस क्यों नहीं जीत पायी।

इस पर कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि पटेलों ने अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट किया फिर चाहे वे कांग्रेस से हों या फिर बीजेपी से। दूसरे, लाखों पटेलों के नाम वोटर लिस्ट से गायब थे। कांग्रेस इस बात से खुश है कि ग्रामीण इलाकों की सीटें उसने काफी अंतर से जीती हैं। लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जीतने के बाद दिल्ली, बिहार और फिर गुजरात के स्थानीय चुनावों में भाजपा की यह तीसरी बड़ी हार है।