‘वेटिंग फोर गोडो’: बेकेट खेलने का साहस

GODOस्थान रवींद्र मंच, जयपुर 14 दिसम्बर। पिछली सदी के पांचवे और छठे दशक में यथार्थ और फिक्शन पर आधारित नाटकों की प्रतिक्रियास्वरूप यारोप में कुछ नये किस्म के नाटकों की शुरुआत हुई। जब मानवअस्तित्व का कोई अर्थ या उद्देश्य नहीं रहता, संकट में आ जाता है तो सारे संवाद टूट जाते हैं। जब तर्क बेमानी हो जाते हैं तो कुतर्क जगह ले लेता है। संवाद भी बेमानी हो जाते हैं और एक सन्नाटा सा छा जाता है।

सेमुअल बेकेट, हेरोल्ड पिंटर, ज्यां जेनेट, टोप स्टोपार्ड, फर्नाण्डो अराबेल, एडवर्ड एलबी और इधर बादल सरकार जैसे नाटककारों ने इस नयी विधा में नाटक लिखे। 1960 में एक आलोचक मार्टिन एसलिन ने अपने लेख ‘थियेटर ऑफ एब्सर्ड’ इस नयी विधा के नाटकों को एब्सर्ड नाम दिया। बेमतलब की दुनियावी घटनाओं के प्रति किसी भी व्यक्ति की जो प्रतिक्रिया होती है वह मानों वह एक कठपुतली है जिसका नियंत्रण किसी अदृष्य शक्ति के पास है।

मूल फ्रांसीसी नाटक ‘एन अटेण्डेंट गोडो’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘वेटिंग फॉर गोडो’ को एक दुखांत हास्य नाटक कहा गया। इस नाटक में दो व्यक्ति व्लादिमीर और एस्ट्रागन एक तीसरे व्यक्ति ‘गोडो’ की प्रतीक्षा करते हैं जिसे शायद आना ही नहीं है। इस प्रतीक्षा में इन दोनों के बीच संवाद होते हैं और कोई घटना घटित नहीं होती।

यह नाटक फ्रेंच भाषा में 9 अक्टूबर 1948 से 29 जनवरी 1949 के बीच लिखा गया। इसका स्टेज प्रीमियर 5 जनवरी 1953 को पेरिस के ‘डि बाबिलॉन’ नामक थियेटर में हुआ।

‘वेटिंग फॉर गोडो’ बेकेट के महत्वपूर्ण नाटकों में से है। इस नाटक से ही बेकेट को नोबेल पुरुस्कार मिला था। ‘वेटिंगफॉर गोडो’ एक बेतुका किंतु बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली नाटक माना जाता है। इस नाटक के प्रीमियर से अब तक गोडोट की अनुपस्थिति अन्य पहलुओं को लेकर अनेक व्याख्याएं की जा चुकी हैं।

सोमवार को मंचन किये गये इस नाटक का निर्देशन संकेत जैन ने किया है। यह नाटक द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लिखा गया था। उस महायुद्ध के बाद की नीरसता को रेखांकित करता है यह नाटक। नाटक एब्सर्ड शैली में होने की वजह से दो किरदारों के बीच मात्र संवादों से ही अपने मंतव्य को स्पष्ट करता है, घटनाप्रधान नहीं होने की वजह से यह दर्शकों को आसानी से नहीं जोड़ पाता है। घटनाविहीन बेकेट नाटक को मंचित करने के लिए निर्देशक में साहस और दर्शकों में धैर्य की अपेक्षा की जाती है।