2015 का वर्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भारी रहा

no_freedom_of_expression_साल 2015 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बुरा साल साबित हुआ, जिस दौरान आठ पत्रकारों और दो बुद्धिजीवियों की हत्याएं हुईं। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में स्थानीय पत्रकारों को सर्वाधिक सरकारी नाराजगी और सेंसरशिप झेलनी पड़ी।

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जगिंदर सिंह नामक एक पत्रकार की उस समय जलकर मौत हो गयी, जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने उनके घर पहुची थी। जगिंदर सिंह राज्य के एक मंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाया करते थे। जगिंदर सिंह की तरह पत्रकार संदीप कोठारी, अक्षय सिंह, राजा चतुर्वेदी और हैदर खान भी प्रशासन, माफिया और घोटालों की खबरों को बाहर करने में लगे थे। इन सभी पत्रकारों की मौत अब तक पहेली बनी हुई है।

पिछले साल अगस्त के अंत में पटेल समुदाय के आरक्षण की मांग पर हिंसा में आठ नागरिक मारे गये थे। पाटीदारों के आंदोलन का नेतृत्व युवा नेता हार्दिक पटेल कर रहे थे। वह पुलिस से बचते हुए, एक ख़ुफिया जगह पर पत्रकारों से मुलाकात कर रहे थे। माहौल में तनाव साफ महसूस हो रहा था।

इतनी बड़ी घटना का स्थानीय मीडिया में कोई जिकरा नहीं हुआ। दरअसल स्थानीय चैनलों के संपादक और मालिकों ने हिंसा की रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी थी। ऐसा उन्होंने राज्य सरकार के दबाव में आकर किया है। आंदोलन और हिंसा के दौरान राज्य सरकार ने इंटरनेट और वाईफाई कनेक्शन काट दिये थे। समर्थकों के अनुसार राज्य सरकार नहीं चाहती थी कि आंदोलन की खबरें राज्य से बाहर जायें।

तमिलनाडु में भी मुख्यमंत्री जयललिता के खौफ के कारण स्थानीय पत्रकारों स्थानीय मीडिया में कई सरकार विरोधी मामलों को रिपोर्ट नहीं किया। कारण 200 पत्रकारों और पत्रिकाओं के खिलाफ अब तक मानहानि के केस दर्ज हो चुके हैं। दरअसल राज्य मानहानि मुकदमों की राजधानी बनकर रह गया है।

मीडिया पर नज़र रखने वाली ऑनलाइन पत्रिका ‘द हूट’ के अनुसार 2015 में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों के खिलाफ राज्य सरकारों ने मानहानि के 48 मुकदमे दर्ज किये। उन पर हमलों की 30 घटनाएं घटीं और उनके खिलाफ़ राजद्रोह के 14 मुकदमे लगाये गये। पत्रिका का दावा था कि 2015 में सर्वाधिक सरकारी नाराजगी मीडिया वालों को उठानी पड़ी।

अगर राज्य सरकारों पर अपने खिलाफ उठने वाली आलोचना की आवाजें खामोश करने के इल्जाम लगे तो केंद्र सरकार पर भी सेंसरशिप के आरोप लगाये गये। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सामूहिक बलात्कार और हत्या की शिकार निर्भया पर बनी डॉक्यूमेंट्री न दिखाये जाने का आदेश सभी चैनलों को दिया, जिसका पालन हुआ और बीबीसी के खिलाफ एक लीगल नोटिस भेजा गया।

मंत्रालय ने मुंबई में 1993 के सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन को फांसी दिये जाने पर विशेष प्रोग्राम करने वाले तीन न्यूज चैनलों को कारण बताओ नोटिस भेजा, जिसकी काफी निंदा की गयी।

2015 में लगभग 20 फिल्मों को सेंसर बोर्ड की कैंची का सामना करना पड़ा। मीडिया का मानना है कि सरकार के भय के चलते कलाकारों ने भी सेंसर बोर्ड के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की।

वरिष्ठ पत्रकार, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को डर है कि 2016 इससे भी बुरा साबित हो सकता है।