विकास के आंकड़ों पर क्यों विश्वास नहीं है कॉरपोरेट्स को

indian_economyअर्थव्यवस्था की गति को लेकर सरकार बहुत उत्साहित है। केन्द्रीय सरकार के आंकड़ों को जारी करने वाले विभाग सेन्ट्रल स्टेस्टिकल ऑफिस ने बताया है कि इस वर्ष देश की अनुमानित सकल उत्पाद दर 7.6 होगी। सरकार का मानना है कि आंकड़ों की दिशा अत्यंत उत्साहजनक है। यह भी मानना है कि पिछले डेढ़ वर्षों में जीडीपी में यह वृद्धि मोदी सरकार की नीतियों और आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप आयी है। सरकार इसे लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है। यह दीगर बात है कि देश के बड़े उद्योगपति, कॉरपोरेट घराने, वित्त विशेषज्ञ, शेयर बाजार किसी को भी सरकार की इस बात पर विश्वास नहीं है।

सच्चाई तो यह है कि देश की अर्थव्यवस्था में देश की जनता को ऐसा सुधार नजर ही नहीं आरहा है जिससे रोजमर्रा की जिन्दगी आसान हो। कीमतों पर नियंत्रण, घरेलू निवेश बढ़ना, नये कल-कारखाने खुलना, लोगों को नौकरियां मिलना, आम आदमी की आय बढ़ाना और इस सबसे जीवन स्तर में सुधार आना ही वो संकेत हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था की गति मापी जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि वर्तमान में यह सब किस दौर से गुजर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती देश के गरीब के चेहरे पर मुस्कान लाने की है। कृषि विकास की बातों को फलीभूत करना, किसानों की आत्महत्या रोकना, विदेशी मुद्रा अर्जन, एक्सपोर्ट को बढ़ावा और विदेशी निवेशकों का भारत के प्रति रुझान ही आर्थिक तरक्की का मुख्य आधार है, जबकि वर्तमान में स्थिति, इससे उलट ही दिख रही है।

दाल के भाव आसमान छू रहे हैं, गेहूं, चावल से लेकर सब्जी और फल, खाद्य तेल, मसाले, दुनिया में सबसे न्यूनतम दर पर पेट्रोल की उपलब्धता के बावजूद एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर कीमतें लगभग जस की तस रखना। रेल, हवाई और सड़क परिवहन में बढ़ोतरी का सभी का भार जनता पर ही तो है, जबकि लोगों की तनख्वाह इस अनुपात में दोगुनी होनी चाहिए। मजदूरी की दर में खास इजाफा भी नहीं हुआ।

आने वाले बजट से भी कोई उम्मीद लगाना बेमानी है। बजट से आम और खास सभी उम्मीदें करते हैं। युवा, गृहिणी, वरिष्ठ नागरिक, नौकरीपेशा, व्यवसायी, उद्यमी, सर्विस सेक्टर सभी तो उम्मीदें लगाए बैठे हैं। नये वित्तवर्ष के बजट को लेकर कयासों का दौर जारी है। इतना तो तय है कि बजट जन आकांक्षाओं से इतर होगा, यानी जेब और ढीली होगी। वित्तमंत्री खुद इस बात का संकेत दे चुके हैं, बजट लोक लुभावन नहीं होगा। इसलिए लोगों को अभी से चिंता सताने लगी है।

जहां तक महंगाई का सवाल है, कई तरह के टैक्सों के बाद लगभग सवा सौ सेवाओं को सर्विस टैक्स के दायरे में लाकर, कमाई पहले ही हल्की की जा रही है। बाजार सूने पड़े हैं। खरीदारी-बिकवाली दोनों की कमी है। सोने के दाम ऊपर नीचे हो रहे हैं। स्टील सेक्टर मंदी से जूझ रहा है। शेयर बाजार एक अजीब सी ऊहापोह में है। उद्योगों और कल कारखानों की स्थिति डांवाडोल है। बजट को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार सरकारी खर्चाे को बढ़ाने पर जोर दिया जा सकता है, क्योंकि वेतन आयोग की सिफारिशों, सैनिकों की बढ़ी पेंशन और कैपिटल एक्सपेंडीचर जैसे कामों के लिए धन की जरूरत तो पड़ेगी। लेकिन सवाल वही कि पैसा आयेगा कहां से?

बजट में निवेश बढ़ाये जाने पर जोर दिया जा सकता है। लेकिन मौजूदा हालात में कितना कारगर होगा, यह कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि पिछले बजट में 69500 करोड़ रुपये विनिवेश का लक्ष्य रखा गया था जबकि सरकार मुश्किल से 12700 करोड़ रुपये ही जुटा पायी है। इधर घाटे वाली सरकारी कंपनियों में विनिवेश तो पूरी तरह नाकाम रहा। आय बढ़ाने के लिहाज से पोस्ट ऑफिस को बैंक में तब्दील करने की योजना भी फलीभूत नहीं हो पायी, जबकि रिजर्व बैंक इसके लिए लाइसेंस भी दे चुका है।

बजट में सबसे बड़ी चुनौती कॉरपोरेट टैक्स घटाने और जीएसटी की तरफ बढ़ने के इंतजाम जरूरी हैं। कॉरपोरेट टैक्स में यदि 1 प्रतिशत की भी कमी हुई तो सरकारी खजाने में 6 से 7 हजार करोड़ रुपयों की आमद घटेगी। निश्चित रूप से यह बड़ी रकम है। इस बजट में मोदी सरकार द्वारा बहुप्रचारित काले धन को लेकर भी कठोर उपाय किये जा सकते हैं। संभव है कि तय सीमा से ज्यादा नकदी रखने पर पाबंदी लगे। पिछले बजट में कालाधन का खुलासा करने, खास स्कीम लाने का ऐलान किया गया था। स्कीम भी आयी लेकिन, अपेक्षानुसार कालाधन नहीं आया। महत्वाकांक्षी सोना मोद्रिकरण योजना का भी यही हाल रहा। योजना तो आयी लेकिन सोना नदारद रहा। यह सब पिछले बजट की आधी अधूरी घोषणाएं हैं।

मौजूदा वित्तवर्ष में सरकार विनिवेश लक्ष्य से काफी पीछे चल रही है। शेष दो महीनों में स्थिति में सुधार की गुंजाइश भी नहीं दिख रही है। ऐसे में निश्चित रूप से सारा दारोमदार आम आदमी के कंधों पर ही पड़ता दिखायी दे रहा है। हो सकता है, वित्तमंत्री ने पहले ही लोक लुभावन न होने वाला बजट कहकर, शायद यही संकेत दिया हो।

आज देश के उद्योगपति मान रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार निवेश को बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठा पायी है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारत में व्यापार उद्योग के लिए बेहतर माहौल का दावा करने के बावजूद विदेशी निवेशक अभी भी भारत में निवेश करने में हिचक रहे हैं। स्वयं रतन टाटा ने पिछले सप्ताह बैंगलुरु में कहा कि महज मोदी जी के वायदों के भरोसे देश में निवेश नहीं आयेगा। इसके लिए देश में उचित वातावरण बनाना होगा।

विदेशी निवेश में कमी के साथ ही देश में उत्पादन में कमी आयी है। भारतीय अर्थव्यवस्था को मानीटर करने वाली संस्था सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार 2016 की तीसरी तिमाही के लिए आये प्रस्ताव कुल एक लाख करोड़ रुपये के हैं जो पांच तिमाहियों में सबसे कम है। खनन, निर्माण आदि क्षैत्रों में जबरदस्त मंदी है। इन क्षैत्रों नये निवेश की तो बात ही नहीं है बल्कि औद्योगिक उत्पादन के क्षैत्र में भी कमी आयी है। मोदी की विदेश यात्राओं, उनके विकास के दावों और वायदों और सरकार द्वारा जारी आकर्षक आंकड़ों के बावजूद भी अगर देश की आर्थिक विकास की गति नहीं बढ़ रही है तो यह निश्चय ही चिंता का विषय है।