छत्तीसगढ़ः अब किसी को भी देशद्रोही कह सकते हैं

in_support_of_jnuएक के बाद एक नये पैंतरे के साथ गोयेबली अंदाज में दक्षिणपंथियों ने अपने दांव खेलने शुरू कर दिये हैं। दिल्ली और बिहार विधानसभा के बाद महाराष्ट और गुजरात में स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जो जमीन खोयी है, उसकी भरपायी उत्तरप्रदेश में करना चाहती है। धर्म के नाम पर गोलबंदी की शुरूआत हो चुकी है। सहिष्णुता और असहिष्णुता को लेकर देश भर में बवाल खड़ा किया गया। राजद्रोह और देशद्रोह बनाम देशभक्ति का नया कार्ड चल पड़ा है।

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय परिसर में कथित रूप से लगाये गये नारों से देश के सोशियल मीडिया में एक झंझावात सा उठ खड़ा हुआ है। दिल्ली अभिव्यक्ति की आजादी की मांग की राजधानी बन गयी है। यह सवाल भी उठाये जा रहे हैं कि क्या सरकार से सवाल किया जा सकता है। क्या किसी के अधिकार की रक्षा करने वाला अपराधी है।

ऐसे ही सवाल छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी में उठते रहे हैं जहां ऐसे सवालों के प्रति राज्य सरकार कतई सहिष्णु नहीं है। वहां राजनैतिक एक्टिविस्टों, स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को पुलिस पूछताछ के बहाने जब चाहे हिरासत में ले लती है और कहीं कोई सुनवायी भी नहीं है। पत्रकार संतोष यादव पांच महीनों से हिरासत में हैं। इससे पूर्व भी पुलिस उनको परेशान करती रही है। यादव इस क्षेत्र के आदिवासियों की दुर्दशा के बारे में रिपोर्टिंग किया करते थे और कइयों को उन्होंने कानूनी सहायता भी दिलवायी थी। हजारों आदिवासियों पर नक्सली होने का आरोप लगाया जाता रहा है।
मालिनी सुब्रमण्यम बस्तर में रहने वाली राष्ट्रीय स्तर की पत्रकार हैं और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की रिपोर्टिंग करती हैं। उनके मकान मालिक ने पुलिस के दबाव में आकर मालिनी को मकान खाली करने का नोटिस दे दिया। यादव की वकील ईशा खंडेलवाल और उनकी साथी शालिनी गेरा आदिवासियों को मुफ्त में कानूनी सहायता मुहैया कराती हैं। इन वकीलों को भी उनके मकान मालिकों ने पुलिस के दबाव में आकर घर खाली करने को कहा।

Bastarसामाजिक एकता मंच माओवादी विरोधी समूह है, जिसके राज्य पुलिस से संबंध हैं। मालिनी सुब्रमण्यम ने इस मंच के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी थी। इस मंच ने मालिनी के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था और मालिनी को नक्सलियों का समर्थक घोषित किया था।

संतोष यादव को छत्तीसगढ़ पब्लिक सिक्यूरिटी एक्ट और गैर-कानूनी गतिविधियां निषेधात्मक क़ानून (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया। मालिनी सुब्रमण्यम ने संतोष यादव की गिरफ्तारी पर भी रिपोर्टिंग की है। ईशा खंडेलवाल ने मालिनी की भी वकालत की थी। अब सरकार ने दोनों वकीलों और मालिनी सुब्रमण्यम के बस्तर प्रवेश पर रोक लगादी है और संतोष अभी भी जेल में है।

आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी के साथ हिरासत में बलात्कार हुआ था। हमलावरों ने 20 फरवरी को उन पर एक खतरनाक काला पदार्थ फेंका और उन्हें चेतवानी दी कि अगर उन्होंने बस्तर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखा तो उनकी बेटी पर भी हमला करेंगे। सोनी सोरी, हदामा कश्यप के परिवार की मदद कर रही थीं। उनके परिवार वालों का आरोप है कि माओवादी बता कर तीन फरवरी को पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में उन्हें मार दिया। सोरी इस मामले की आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज कराने में परिवार की मदद कर रही थीं।

पत्रकार बेला भाटिया ने नवंबर से फरवरी तक तीन घटनाओं में सुरक्षा बलों के द्वारा ग्रामीण आदिवासी महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप की रिपोर्ट की तो उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा है। इन सभी मामलों में पुलिस ने शुरुआती तौर पर एफ़आईआर दर्ज करने से इनकार किया लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव के चलते उन्हें शिकायत दर्ज करनी पड़ी। बेला को भी उत्पीड़न झेलना पड़ा। छत्तीसगढ़ पुलिस पत्रकारों को माओवादी समर्थक बताती है और दिल्ली की घटनाओं के बाद तो देशद्रोही बताने का भी विकल्प है। बीते सप्ताह बस्तर में एक ब्रिटिश चैनल के पत्रकार को धमकियों के चलते एसाइनमेंट के बीच से ही लौटना पड़ा।

बस्तर में दिल्ली की ही तरह किसी को देशद्रोही ठहराने का तरीका सरकार के लिए नया हथियार साबित हो रहा है। जब एक बार आप देशद्रोही घोषित कर दिये गये, तो फिर आपके संविधान प्रदत्त अधिकार छिन जाते हैं। आप सरकार की आलोचना नहीं कर सकते, आप हिंसा से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते हैं, अपशब्दों के खिलाफ न्याय नहीं मांग सकते।