जेएनयू का छात्र किसी अंधभक्ति का शिकार नहीं हो सकता!

kanhaiyaजवाहर लाल नेहरु छात्र संघ (जेएनयूएसयू) अध्यक्ष और हाल ही में राजद्रोह के आरोप के बाद जेल से बाहर आये कन्हैया कुमार को देश के मीडिया का एक तबका देशद्रोही करार कर रहा है तो दूसरी ओर एक हिस्सा उसे देश का महान नेता बनाने पर तुला है। यहां तक कि उसे मोदी का करारा जवाब तक बताया जा रहा है। उसे कोई भी जेएनयू के एक प्रबुद्ध, तर्कशील और मेधावी छात्रनेता के रूप में देखना ही नहीं चाहता।

छह माह की अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर आये कन्हैया ने जेएनयू में प्रेस कांफ्रेस कर पूरे विवाद पर अपने विचार व्यक्त किये। कन्हैया ने पहले उसका साथ देने वालों और समर्थन करने वालों को धन्यवाद दिया। इसके बाद केंद्र सरकार और प्रधनमंत्री मोदी पर जमकर हमला बोला। उसने कहा कि देशभक्ति पर किसी का पेटेंट नहीं है। कन्हैया ने कहा कि अफजल गुरू को देश का नागरिक था लेकिन वह उनके लिए आदर्श नहीं है। उनके लिए आदर्श रोहित वेमुला है। तिहाड़ से रिहाई के बाद जेएनयू पहुंचे कन्हैया ने प्रधानमंत्री समेत मीडिया और अपने विरोधियों पर तीखा हमला बोला। कन्हैया ने अपने विरोध में खबर चलाने वाली टीवी मीडिया, बीजेपी सरकार, आरएसएस और तमाम दूसरे मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी।

उमर पर देशद्रोह का केस नहीं चलना चाहिए

उमर पर देशद्रोह का केस नहीं चलना चाहिए

कन्हैया के मुताबिक उमर और अनिर्बन पर देशद्रोह का केस नहीं चलना चाहिए। जेएनयू के बारे में छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा कि कुछ टीवी चैनलों ने जेएनयू की छवि खराब की। जेएनयू का छात्र और यहां के लोग देशद्रोही नहीं है। राजद्रोह और देशद्रोह में फर्क होता है। संविधान के साथ खिलवाड़ करने वालों की साजिश नाकाम रही। कन्हैया ने कहा कि जेएनयू में कुछ काले बादल हैं लेकिन ये लाल सूरज को छिपा नहीं सकते। जेएनयू जो आज सोचता है वो समाज कल सोचता है। उसने जेएनयू को संविधान के साथ खड़ा रहने वाला संस्थान बताया। कन्हैया ने आगे कहा कि उन्हें अदालत और संविधान पर भरोसा है। उनका मोदी से मतभेद है मनभेद नहीं है। कन्हैया ने कहा कि मोदी संविधान से चलें। कोर्ट में छेड़छाड़ वाला वीडियो नहीं चलता। कन्हैया ने कहा कि उनका विरोध जारी रहेगा और वे संविधान और लोकतंत्र के दायरे में रहकर विरोध करते रहेंगे। उन्होंने खुद को विद्यार्थी बताया।

कैंपस में कन्हैया ने भाषण की शुरूआत में कहा कि, ‘‘एक कहावत है बदनाम हुए तो क्या नाम नहीं हुआ?’’ जेएनयू को बदनाम करने के लिए चैनलों के प्राइम टाइम पर जेएनयू को जगह देने वाले लोगों का धन्यवाद। किसी के लिए कोई दुर्भावना हमारे मन में नहीं है। खासकर एबीवीपी के लिए। हम लोग संवैधानिक लोग हैं। एबीवीपी पर टिप्पणी करते हुए कन्हैया ने कहा कि शिकार उसका किया जाता है जो शिकार करने लायक हो। सच में कह रहा हूं जेएनयू ने जो दिखाया, जेएनयू जो सच कहने के लिए खड़ा हुआ है वो बड़ा काम है। हमें इस देश की न्यायप्रक्रिया पर भरोसा है। हम बदलाव के पक्ष में है। जो संविधान की प्रस्तावना में लिखा है हम उसके साथ।

कन्हैया ने कहा कि हम भ्रष्टाचार, जातिवाद और भुखमरी से आजादी चाहते हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि बाबा साहब ने कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र से काम नहीं चलेगा। हम सामाजिक लोकतंत्र लेकर आयेंगे। हम इसलिए लड़ रहे हैं कि एक राष्ट्रपति का बेटा और एक चपरासी का बेटा एक ही स्कूल में पढ़ाई कर सकें। हम सबका साथ सबका विकास वाला देश बनायेंगे। छात्रसंघ अध्यक्ष ने आगे कहा कि हम जेएनयू के लोग शालीनता से बात तो करते हैं, मगर बहुत भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए हमारी बात देश की जनता की समझ नहीं आती। हम तो देश को बेचने वालों से बचाना चाहते हैं। क्योंकि इन राजनेताओं ने देश का सब कुछ ओएलएक्स पर बेच दिया।

आखिर कन्हैया कुमार के भाषण में ऐसा क्या था कि देश भर के मीडिया का ध्यान उसने खींचा और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक भी उन्हें एक संभावित राजनीतिक चुनौती के तौर पर देख रहे हैं? उसके भाषण में ग़ुस्सा नहीं चुटीलापन था। उसने सत्तर और अस्सी के दशक के छात्र नेताओं की तरह आग नहीं उगली, न ही विरोधियों की ईंट से ईंट बजा देने का हुंकारा भरा और न ही ख़ुद को शहीद के तौर पर पेश किया। पूरे भाषण के दौरान वो लगातार मुस्कुराते और हंसते-हंसाते रहे, लेकिन एक पल के लिए भी इस हंसी-ठिठोली में गंभीर राजनीतिक मुद्दों को उड़ने नहीं दिया।

मतभेद है मनभेद नहीं

मतभेद है मनभेद नहीं

उसका भाषण पूरी तरह राजनीतिक था जिसमें उसने किसी बात को गोल-मोल तरीके से नहीं कहा। उसके निशाने पर सत्तापक्ष था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था और संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) थी। बीजेपी और आरएसएस ही क्यों, कन्हैया कुमार के भाषण के बाद ख़ुद उनकी पार्टी यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के कई “स्थापित नेता” भी आइना देखने पर मजबूर हो गये होंगे। नरेंद्र मोदी को नॉक आउट पंच देने की कोशिश में राहुल गांधी चाहे जितना उछल उछल कर हवा में मुक्केबाजी करें, वो कभी निशाने के आसपास भी नहीं पहंुच पाते। पर कन्हैया कुमार ने मुस्कुराते हुए मोदी की आंख में आंख डालकर जैसे सवाल किये, उससे मोदी का कुछ बिगड़े न बिगड़े, राहुल गांधी के युवा नेतृत्व के लिए एक और चुनौती पैदा हो गयी है। ये चुनौती पार्टी के आधार की नहीं बल्कि एक नये विचार की चुनौती है।

विश्वविद्यालय का बेचैन नौजवान क्या उस राहुल गाँधी से प्रेरणा लेगा जो नरेगा, नारेगा या मनरेगा का सही उच्चारण तलाशने की कोशिश में उलझा रहता है या ऐसे कन्हैया की तरफ देखेगा जिसे एक एक सेकेण्ड के हिसाब से एयरटाइम बेचने वाले टीवी चैनल एक घंटे का निर्विघ्न प्रसारण समय देते हैं? कल तक जो कन्हैया एक अनगढ़, कच्चा, अनुभवहीन, आदर्शवादी छात्र था आज उसमें नेतृत्व की संभावनाएं देखी जा रही हैं। संसदीय वामपंथी पार्टियों के सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और अतुल अनजान या डी राजा इसलिए ख़ुश हैं कि कन्हैया ने उनकी मुरदा राजनीति में जान फूंक दी है। जो बात उन्हें कहनी चाहिए थी वो कन्हैया कह रहा है। फर्क ये है कि अगर यही बात वामपंथी दलों के ये बड़े नेता कहते तो टीवी चैनल शायद तीस सेकेण्ड से ज्यादा का समय नहीं देते और देते भी तो लोग उसे इतनी तवज्जो नहीं देते।

पर कन्हैया इन सब पर भारी पड़ा है। हालांकि वो सीपीआई के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआइएसएफ़) का नेता है पर वो पार्टी की वजह से नहीं बल्कि पार्टी के बावजूद अपनी अपील बनाये रख पाया है। क्योंकि नरेंद्र मोदी की तरह कन्हैया भी जानता है कि गूढ़ राजनीतिक मुद्दों पर जनता से सीधे संवाद कैसे किया जाता है। शायद कन्हैया अकेला छात्र नेता है जो खुली सभा में कहने की हिम्मत करे कि हम जो कुछ कहते हैं जनता उसे समझती नहीं है? और फिर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में ऐसे कामयाब होता है कि टीवी कैमरे उससे चिपक कर रह जाते हैं।

जेएनयू का एबीवीपी ज्यादा तार्किक है

जेएनयू का एबीवीपी ज्यादा तार्किक है

लेकिन ये सिर्फ भाषण कला में प्रवीण होने का ही सवाल ही नहीं है। कन्हैया को मालूम था कि वो सिर्फ जेएनयू के छात्रों को ही संबोधित नहीं कर रहा। उसके सामने दलित नौजवान थे जो देश भर के विश्वविद्यालयों में उसकी बात सुनने का इंतजार कर रहे थे। जिस बात से भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को सतर्क हो जाना चाहिए वो है प्रतीकों के बेहतरीन राजनीतिक इस्तेमाल की कला। पूरे भाषण में कन्हैया ने साफ साफ कहा कि उसके निशाने पर संघ परिवार है, पर साथ ही यह भी कहा कि उनके दिल में किसी के खिलाफ नफरत नहीं है। विद्यार्थी परिषद के खिलाफ तो कतई नहीं क्योंकि “जेएनयू का एबीवीपी बाहर के एबीवीपी से ज्यादा तार्किक है” और “हम उन्हें दुश्मन नहीं प्रतिपक्ष की तरह देखते हैं।”

ये बिहार के एक गरीब परिवार से आया वो नौजवान है जिस पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है, देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह एक फर्जी ट्विटर एकाउंट के आधार पर पूरे जेएनयू मामले को पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद से जोड़ते हैं। दिल्ली के पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी पहले ठोस सबूत होने का दावा करते हैं और फिर आत्मविश्वास भरी भविष्यवाणी करते हैं कि आगे आगे देखिये होता है क्या। और जब कन्हैया को पुलिस अदालत में पेशी के लिए ले जाती है तो भारी सुरक्षा के बावजूद “राष्ट्रवादी” वकीलों का एक हुजूम अदालत के भीतर उसपर हमला कर उसे पीटता हैै। बस्सी तो अपने सबूतों पर इतने मुतमइन थे कि यहां तक दावा कर दिया कि अब अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी कन्हैया की है। शायद वे यह भी भूल जाते हैं कि कानूनन आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी आरोप लगाने वाले की होती है। फिर भी जेल से लौटने पर कन्हैया ऐलान करता है – ‘‘जेल में जब तक चना रहेगा, आना-जाना बना रहेगा।’’ उसने यह कहकर जताने की कोशिश की है कि राजद्रोह का आरोप लगाये जायें या जेल भेजा जाये पर वो अपनी बात कहने से चूकेगा नहीं।

जिस तरह गाँधी ने नमक को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया था उसी अंदाज में कन्हैया ने अपने भाषण के दौरान रंगों के प्रतीकों से अपना राजनैतिक मंतव्य स्पष्ट कर दिया। उसने लाल और नीले रंग को राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया और कहा, “जेल में मुझे लाल और नीले रंग को कटोरे दिये गये थे। भाग्य पर मुझे भरोसा नहीं है और भगवान को मैं नहीं जानता। लेकिन उस लाल और नीले रंग को देखकर मुझे लगा कि देश में कुछ अच्छा होने वाला है। नीला रंग अंबेडकर का और लाल रंग इंकलाब का।”

गुरुवार की रात जेएनयू में जो कुछ हुआ उससे क्या भारत का राजनीतिक परिदृश्य रातोंरात बदल जायेगा? क्या एक रात में एक घंटे का भाषण देकर टीवी पर छा जाने वाले कन्हैया को देखकर बड़े राजनीतिक नतीजे निकाले जाने चाहिए? शायद नहीं। क्योंकि जिस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से कन्हैया फिलहाल जुड़े हैं उसमें अभी इतना दम ही नहीं है कि कन्हैया की गिरफ्तारी से उठे तूफान को किसी नतीजे तक पहुंचा सके। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपनी पार्टी लाइनों की उलझनों में इस कदर उलझे हैं कि कन्हैया जैसों को शायद अपना अलग रास्ता तलाशना होगा। वैसे भी कन्हैया ने 2015 में जेएनयूएसयू के चुनावों में भाषण देते हुए जो वामपंथी दलों की लानत मलामत की थी साथ ही दक्षिणपंथी विचारधारा पर कटाक्ष किये थे उससे यह साफ हो जाता है कि जेएनयू का छात्र किसी अंधभक्ति का शिकार नहीं हो सकता।

One Response to जेएनयू का छात्र किसी अंधभक्ति का शिकार नहीं हो सकता!

  1. teerth gorani

    March 6, 2016 at 2:01 pm

    कन्हैया अपने आप में कितना ही ईमानदार क्यों न हो ,उसका इस्तेमाल और हश्र भी आगामी चुनावी राजनीति में वैसे ही होगा जैसे फिल्म अर्जुन में सनी का हुआ था. फर्क इतना है कि फिल्मी अर्जुन ने चौग्ले को मार डाला मगर ये अर्जुन तो वह भी नहीं कर पायेगा. चुनाव खत्म होने के बाद कन्हैया कोई आंदोलन खड़ा कर पायेगा उसकी भी सम्भावना नहीं है क्योंकि उसकी बात आम आदमी नहीं समझता. अन्ना हजारे तक अपने आंदोलन में लाख सम्भलने के बावजूद केजरीवाल जैसा नौटंकीबाज ही दे पाये.