पर्यावरण को भी हिन्दुत्व का मामला बना रहे नायडू

shri_shriश्री श्री रविशंकर ने कहा कि वे नेशनल ग्रीन टिब्यूनल एनजीटी द्वारा लगाये गये जुर्माने का भुगतान नहीं करेंगे। इसके बजाय वे जेल जाना पसंद करेंगे। नेशनल ग्रीन टिब्यूनल 2010 में भारतीय संसद द्वारा पारित कानून के तहत स्थापित किया गया जिसका काम पर्यावरण की रक्षा के लिए त्वरित निर्णय लेना है। यह केन्द्रीय सरकार के तहत एक स्वतंत्र विभाग है जिसके अध्यक्ष उच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। कुल 20 सदस्यों में से आधे पर्यावरण विशेषज्ञ और आधे कानून विशेषज्ञ होते हैं।

श्री श्री रविशंकर  के शुक्रवार से यमुना किनारे शुरू होने वाले भव्य महोत्सव के लिए दिल्ली में यमुना नदी के किनारे जो अस्थायी निर्माण किया जा रहा है उसके लिए पर्यावरण सम्बन्धी क्लीयरेंस नहीं ली गयी और इसके विरोध में दायर एक याचिका का निस्तारण करते हुए एनजीटी ने श्री श्री की संस्था पर पांच करोड़ रुपये का जुर्माना किया है।

केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने पर्यावरण की चिंताओं के बीच श्री श्री का बचाव करने का प्रयास किया और पर्यावरण के मुद्दे को भी अन्य मुद्दों की तरह हिन्दुत्व का मामला बनाने की कोशीश की। नायडू ने कहा कि ‘‘वह कुछ भी जो हिंदू, भारत, भारतीय है, आपको उससे आपत्ति है।’’

केंद्रीय मंत्री नायडू ने श्री श्री के कार्यक्रम के लिए यमुना नदी के किनारे को समारोह स्थल की मंजूरी दिये जाने पर विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा सरकार पर पर्यावरण दायित्वों की पूर्ति न किये के लगाये जा रहे आरोपों के जवाब में यह बात कही। नायडू ने कहा कि ‘‘पूरे देश की प्रतिष्ठा दांव पर है। इस समारोह में विश्व के लगभग 35 नेताओं के आने की उम्मीद है।’’ दरअसल नायडू का यह बयान देश के संविधान के तहत देश की संसद द्वारा बनाये कानून से स्थापित एक संवैधानिक संस्था का अपमान है। वैसे भी जिस राजनैतिक दल के आकाओं ने कभी भी देश के संविधान और तिरंगे को स्वीकार नहीं किया उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है।

गौरतलब है कि यमुना बैंक के करीब 1,000 एकड़ एरिया को अस्थायी गांव के तौर पर तैयार किया गया है, जहां आर्ट ऑफ लिविंग का तीन दिन का वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल होना है। यहां योगा, मेडिटेशन और शांति प्रार्थनाओं के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम होने हैं। ‘‘आर्ट ऑफ लिविंग’’ के 35 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विश्व सांस्कृतिक उत्सव में 35000 कलाकार भाग ले रहे हैं।

एनजीटी के आदेश से यह तो साफ है कि यह आयोजन ही गैरकानूनी है, तो सवाल उठता है कि केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इस गैरकानूनी आयोजन हेतु सवा दो करोड़ की राशि क्यों दी। आयोजन हेतु 1,000 एकड़ से अधिक सरकारी भूमि के इस्तेमाल के लिए सरकार श्री श्री की संस्था से क्या ले रही है। सेना द्वारा पंटून पुल तथा अन्य निर्माणों का खर्चा कौन दे रहा है। किसानों की नष्ट फसल का मुआवजा कौन दे रहा है। दिल्ली पुलिस के 8,000 जवानों की तैनाती किस खाते में हो रही है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यह कार्यक्रम यदि श्री श्री का है तो सरकार इस पर खर्चा किस बजट से कर रही है। इसके अलावा सात एकड़ में बनने वाले स्टेज की मजबूती को लेकर भी सुरक्षा एजेंसियों को ऐतराज है शायद इसलिए प्रधानमंत्री के लिए अलग मंच बनाया जा रहा है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि पारिस्थितिकी के लिहाज़ से यह निर्माण कार्य तबाही लगता है। एनजीटी के आदेश से भी स्पष्ट है कि देश की राजधानी में सरकार की नाक तले सभी नियम तोड़े गये। उधर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने कहा कि आयोजन हेतु पर्यावरणीय अनुमति आवश्यक नहीं है। 2006 के नोटिफिकेशन के अनुसार 50 हेक्टेयर से अधिक विकास के लिए यह पर्यावरणीय अनुमति आवश्यक है। डीडीए ने सीमित क्षेत्र में आयोजन की मंजूरी दी थी, लेकिन आयोजन 1,000 एकड़ में हो रहा है। दरअसल इस गैर कानूनी आयोजन को केन्द्र की भाजपा सरकार का संरक्षण प्राप्त है शायद इसलिए किसी भी कानूनी प्रक्रिया की अनुपालना की आवश्यकता नहीं समझी गयी।

इस विवाद के चलते जिम्बॉब्वे के राष्ट्रपति मोगाबे अब इस कार्यक्रम में नहीं आयेंगे। वह इस कार्यक्रम के विशेष मेहमान थे। गैरकानूनी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के शरीक होने पर संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है इसलिए श्री श्री अब जुर्माना देने पर सहमत दिख रहे हैं। संभवतया वे बाद में इसके खिलाफ अपील करें। उधर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पांच करोड़ रुपये का जुर्माना भरने की डेडलाइन को शुक्रवार तक के लिए बढ़ा दिया है। एनजीटी का कहना है कि कार्यक्रम जारी रह सकता है, लेकिन कार्यक्रम शुरू करने से पहले श्री श्री को जुर्माने की राशि जमा करानी होगी।