पीर गनीः भटके हुए कश्मीरी नौजवान का पश्चाताप

peer_ghani_impressing_haseenaजयपुर, 2 अप्रेल। स्थानः विद्याश्रम स्कूल का महाराणा प्रताप सभागार। के. के. रैना के निर्देशन में कश्मीर के भटके नौजवानों को देश से जोड़ने का संदेश देने वाले नाटक ‘‘पीर गनी‘‘ का मंचन किया गया। ‘पीर गनी’ हेनरिक इब्सन के मूल नाटक ‘पेयर गिंट’ का हिन्दुस्तानी एडॉप्टेशन है। 19वीं शताब्दी के नार्वे के नाटककार हेनरिक इब्सन के नाटकों को दुनिया भर के रंगकर्मी मंचित करते रहते हैं। ‘पेयर गिंट’ से प्रभावित वरिष्ठ रंगकर्मी इला अरुण ने भारतीय परिवेश खास तौर पर कश्मीर के परिवेश के अनुसार हिन्दी में नये सिरे से ‘पीर गनी’ की रचना की। इला ने इससे पहले भी इब्सन के 1888 में रचे नाटक ‘लेडी फ्रॉम द सी’ का सफल एडॉप्टेशन ‘मरीचिका’ किया है। ‘पेयर गिंट’ की मूल कथा में नार्वे के बर्फीले पहाड़ और मैदान हैं तो ‘पीर गनी’ में कश्मीर है।

नाटक के निर्देशक के. के. स्वयं कश्मीरी हैं। इस नाटक में आतंकवाद से पीड़ित कश्मीर का दंश महसूस किया जा सकता है।

मूल नाटक पांच अंकों का है और सम्पूर्ण नाटक कवितामय है। इब्सन ने नाटकों में अक्सर परिकथाओं और लोककथाओं के साथ यथार्थ का समावेश भी किया। लेखक के देश नार्वे में ‘पेयर गिंट’ का मंचन वर्षों से होता आरहा है लेकिन मेरी जानकारी में भारत में इस नाटक के एडॉप्टेड रूप का मंचन सिर्फ इला ने किया।

इस नाटक का एडॉप्टेशन और मंचन किसी भी लेखक, निर्देशक या अभिनेता के लिए चुनौती हो सकता है लेकिन यह काम इला, उसके निर्देशक के. के. रैना और उनकी सुरनई के कलाकारों ने बखूबी कर दिखाया है। दोनों रंगकर्मी पिछले 30 वर्षों से साथ काम कर रहे हैं। इला के लिखे कई नाटकों का निर्देशन के. के. ने किया है।

यद्यपि ‘पेयर गिंट’ नार्वे की पहाड़ियों और घाटियों में रहने वाला एक सपनों में खोया रहने वाला आलसी नौजवान है लेकिन ऐसे नौजवान किसी भी समाज में मिल सकते हैं। इस नाटक की कहानी 1980 के कश्मीर पर आधारित है, जहां युवा पीर अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता था। पीर का सम्बन्ध अमीर व्यापारिक घराने से था। उसके पिता के निधन के बाद परिवार गरीबी का शिकार हो गया। अब उसके और उसकी मां के बीच केवल बचा था तो वह था कहानी सुनाना। पीर अपनी मां को परिकथाएं सुनाता था, जिसमें पौराणिक पात्रों को जीवन से बड़ा बताया जाता था, लेकिन पीर ने वास्तविक जीवन मे ऐसे पात्र कभी देखे नहीं थे। पीर इस प्रकार के चरित्रों की कहानियों के बीच बड़ा होता है। यह नौजवान अपनी मां को अपनी बहादुरी की जादुई कहानियां सुनाता है। दरअसल कमोबेश यह स्थिति हर नौजवान की होती है जो अपनी जिन्दगी से बड़ी उम्मीदें लगाये होता है। इब्सन के मूल नाटक के नौजवान की तरह पीर गनी भी अपनी बूढ़ी मां के इर्दगिर्द मंडराता रहता है, जो उसे बड़े ही लाड़ से कभी ‘‘हरामजादे’’ तो कभी ‘‘फकीरजादे’’ बुलाती है। यह नौजवान जो कुछ करना चाहता है उसे परिकथाओं में तलाशता है लेकिन जिंदगी हकीकत की जमीन पर खड़ी होती है। जब सपने पूरे नहीं होते तो भटक जाना स्वाभविक है। यही भटकाव ‘पीर गनी’ की कथावस्तु है।

peer_ghani_with_demon_princessकहानी के आगे बढ़ने के साथ ही टूटे हुए सपनों से भटका नौजवान पीर अपनी मां को अपनी प्रेमिका के लिए छोड़ देता है फिर अपनी प्रेमिका को छोड़कर असुरों के साथ चला जाता है। दृश्य परिवर्तन में पीर उम्रदराज है। वह एक दावत में बताता है कि कैसे उसने नशे और हथियारों के कारोबार में पैसा कमाया।

यह एक प्रतीकात्मक कथा है जो एक अशांत कश्मीर की त्रासदी को सामने रखती है। यह पीर की कल्पनाओं से परे का कश्मीर है। पीर जब अपने वतन वापस लौटता है तो अपने आपको कश्मीर की बिगड़ी हुई हालतोें से सम्बद्ध नहीं कर पाता। यह वही कश्मीर है जिसे उसके अपराधों ने नष्ट कर दिया। वह हैरान और दुखी होता है कि ‘‘मैं कौन हूं और ये कहां आ गया हूं’’।

यहां प्रतीक स्पष्ट हैं। पहले वह अपनी मां यानि कि अपनी मादरे वतन को अपनी प्रेमिका तथाकथित आजादी के लिए छोड़ देता है। फिर आजादी को छोड़ कर ऐसे अपराधों में लिप्त हो जाता है जिससे उसका अपना कश्मीर ही बर्बादी के कगार पर पहुच जाता है।

बेहतरीन अभिनेताओं और शानदार मंच सज्जा के साथ यह नाटक कभी तो एक जादुई प्रभाव डालता है तो कभी थोड़ा नीरस भी हो जाता है। फिर भी इसकी कवितामयी प्रस्तुति, कश्मीरी संगीत और प्रामाणिक वातावरण का निर्माण दर्शक को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। कुछ सुधी दर्शकों का मानना था कि इस नाटक में इसके मूल लेखक इब्सन की आत्मा का प्रभाव कम है। लेकिन मैंने इस नाटक को इब्सन के संदर्भ में नहीं देखा। मैंने इला को इस नाटक का लेखक समझा और माना और कश्मीर को एक प्रामाणिक वातावरण में देखा तो मुझे इस नाटक में इब्सन का खयाल ही नहीं आया।

मूल नाटकः हेनरिक इब्सन, एडाप्टेशनः इला अरुण, निर्देशकः के. के रैना
कलाकारः नौजवान पीरः राहुल बग्गा, पीर की मां आशी: इला अरुण, अधेड़ पीरः के.के. रैना, हसीनाः आदिति शर्मा, खुदा का फरिश्ताः विजय कश्यप, हिन्दू महिलाः अंजुला बेदी, फोटोग्राफरः अरोड़ा
अन्य कलाकारः आशीश चावला, अभिषेक पाण्डे, प्रकृति, शीबा लतीफ, अनमोल बकाया