प्रदूषणः उन्नाव में होगा मौत का ताण्डव

pollution_unnao_2 उत्तर प्रदेश में उन्नाव के सदर क्षेत्र में औद्योगिक जल प्रदूषण के चलते स्थानीय लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। किसी के लिवर में प्रॉब्लम है तो किसी को त्वचा संबंधी समस्या। सिर्फ इतना ही नहीं कैंसर जैसे गंभीर रोगों के शिकार होकर मौतों का आकड़ा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। हवा में मौत घुल चुकी है। उन्नाव के पानी से लेकर हवा तक सब में आर्सेनिक है। खतरे के निशान से ऊपर आर्सेनिक दरअसल कारखानों से निकलने वाला धुआं हो या गंदा पानी। दोनों ही वातावरण को गंभीर तौर पर प्रदूषित कर रहा है।

जानकारी के मुताबिक लोगों में आर्सेनिक की वजह से बीमारियां बढ़ रही हैं। उन्नाव में आर्सेनिक की मात्रा खतरे के निशान को पार कर चुकी है। यहां तक कि इस क्षेत्र के आस-पास निकलने वाले राहगीरों को दुर्गंध के चलते काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। लेकिन प्रशासन हो या स्थानीय नेता दोनों ही चुप्पी साधे हुए हैं। कीमत के आगे कीमती जिंदगियां घुट-घुटकर दम तोड़ रही हैं। विकलांगता और सांस से जुड़ी तमाम बीमारियां लोगों को काल के गाल की ओर धकेलती जा रही है।

pollution_unnao_3साल 2012 में सदर तहसील क्षेत्र के जल और वायु प्रदूषण से परेशान ग्रामीणों ने तत्कालीन कांग्रेसी सांसद अनु टंडन को अपनी इस समस्या से अवगत कराया था। लेकिन महज आश्वासन के बाद उनकी उम्मीदों को ठंडे बस्ते में फेंक दिया गया। जहरीले पानी पर कई चैनलों की ओर से कई रिपोर्टस चमकायी गयीं, लेकिन कैमरे की फ्लैश लाइट जब तक जलती रही, तब तक लोग इसे गंभीरता से लेते रहे। लाइट बुझते ही यहां की मासूम जिदगियां फिर अंधेरे में चली गईं। मुद्दा भी बिक गया, समस्या भी कीमती बोलियों की ऊंची आवाजों के सामने गूंगी हो गयी।

अनु टण्डन

अनु टण्डन

तत्कालीन सांसद अन्नू टंडन की ओर से औद्योगिक जल प्रदूषण से उन्नाव को बचाव अभियान चलाया गया। पर उसका क्या असर रहा, वो आज भी उन्नाव सदर के गांवों की बद्हाली बयां कर रही है। कहीं न कहीं महज दिखावा बनकर रह गया वो आंदोलन, वो वादा, वो आश्वासन। हालांकि अन्नू टंडन ने ये कहा भी था कि वे इस गंभीर समस्या से वाकिफ है और सुधारने की कोशिश कर रही हैं। पर समस्या सुधरी नहीं और भी बिगड़ गयी है।

एक बार फिर राजनीति पर विश्वास अंधे कुएं में डाल दिया गया। आर्सेनिक पर सवाल, समस्या उसी के खेमे में जाते हैं जिसके पास क्षेत्रीय या फिर जिले की जिम्मेवारी होती है। पर सवाल उठते ही जांच का हवाला देते हुए आवाज को शांत कराने की कोशिश की जाती है। नेता जी के कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही मुद्दा फिर से दूसरे के पाले में चला जाता है। 2012 आया तो कई आश्वासन दिये गये। अब 2017 आने वाला है। स्थिति जस की तस है। यदि लापरवाही कुछ इसी तरह रही तो वो दिन दूर नहीं जब यह पूरा शहर कब्र में तब्दील हा जायेेगा।