पानसरे, दाभोलकर और कलबुर्गी की हत्या: हत्या तार्किकता की

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सुभाष नाहर

सुभाष नाहर

क्या आपने कभी किसी 3 वर्ष के बच्चे से पूछा है कि उसका धर्म क्या है? उसका उत्तर क्या था? हिन्दू, मुसलमान, सिख, जैन, बौद्ध या ईसाई? नहीं वह नहीं जानता कि उसका धर्म क्या है। देश के करोड़ों बच्चे जानते ही नहीं कि वे किस धर्म के हैं जब तक कि हम उसके हाथ में कोई धर्म ना पकड़ा दें।

लेकिन यह स्थिति बड़ों के संसार में नहीं है। अपने आपको वैज्ञानिक सोच का कहने वाले अंतरिक्ष वैज्ञानिक रॉकेट प्रक्षेपण से पूर्व हवन करते हैं। जो एक ओर विज्ञान की किसी भी उपलब्धि श्रेय लेने के लिए तैयार रहते हैं वे इसके पहले पश्चिम की ओर मुंह करके नमाज की दुआ करते हैं। मंगलयान को अंतरिक्ष में दिशा परिवर्तन के पूर्व ये वैज्ञानिक अपने पैंट की दाहिने बांये जेब में हाथ चलाते हैं। अंधविश्वासों से परिपूर्ण ये वैज्ञानिक क्या अपने इन विश्वासों के लिए कोई तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं। क्या हम इन्हें तार्किक कह सकते हैं।

तार्किक कहे जाने वाले गोविन्द पानसरे, नरेन्द्र दाभोलकर और एम एम कलबुर्गी की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी कि वे अंधविश्वासों के विरोध में थे या इन्होंने समाज में स्थापित गलत मान्यताओं का विरोध किया था।
दाभोलकर ने अपना जीवन समाज में फैले अंधविश्वास, जादू टोना, काला जादू का विरोध और अपने आपको भगवान कहने वालों की असलियत उजागर करने में लगा दिया। इन्हीं कारणों से 20 अगस्त 2013 को सुबह सात बजकर 20 मिनिट पर पूना में उस समय उनकी हत्या कर दी गयी जब वे अपनी सुबह की सैर पर थे।
दाभोलकर ने सिर्फ हिन्दू अंधविश्वास के विरोध में ही नहीं बल्कि ईसाइयों के प्रति भी अपने तार्किक दृष्टिकोण को प्रकट किया। उनकी संस्था महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने मदर टेरेसा को तथाकथित चमत्कारों के आधार पर संत कहे जाने का भी विरोध किया था। वे भारत को अंधविश्वास मुक्त देश बनाना चाहते थे।

कलबुर्गी की हत्या 30 अगस्त 2015 की सुबह कर्नाटक के धारवाड़ में उनके अपने निवास पर कर दी गयी। इससे पहले उन्हे कई बार हत्या की धमकी दी गयी थी। तत्कालीन सरकार ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी लेकिन उन्होंने स्वयं ही अगस्त 2015 में पुलिस द्वारा प्रदान की गयी सुरक्षा को हटवा दिया।

1989 में लिंगायत मंदिरों के मुखियाओं ने कलबुर्गी को वीराशिववाद सम्प्रदाय के संस्थापकों बासवेश्वर, उनकी पत्नी और बहिन के प्रति उपयोग में लिए शब्दों को वापिस लेने के लिए धमकी दी। यह विवाद कलबुर्गी के उन दो लेखों से पैदा हुआ जो उनकी पुस्तक मार्ग एक में प्रकाशित हुए थे। बासवेश्वर की दूसरी पत्नी नीलाम्बिके की लिखी कई कविताओं के आधार पर कलबुर्गी इस निर्णय पर पहुंचे थे कि उन दोनों के बीच पति पत्नी का सम्बन्ध ही नहीं रहा।

उनके दूसरे लेख में कलबुर्गी ने छन्नवासव जो एक वीरशैव कवि थे, को बासवेश्वर की बहिन नीगलाम्बिके और उनके पति दोहारा कक्काया की संतान बताया था। दोहरा जाति से मोची थे। कलबुर्गी के लेख वाचन साहित्य के प्रमाणों के आधार पर थे। कलबुर्गी ने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए इन दोनों लेखों के लिए क्षमा तो मांग ली थी लेकिन उनका कहना था कि, ‘‘मैंने उसी दिन बौद्धिक आत्महत्या कर ली थी।’’

जून 2014 में अंधविश्वास के विरोध में लाये जारहे कानून पर बोलते हुए कलबुर्गी ने यू आर अनंथमूर्ति की पुस्तक ‘‘बेठाले पुजे याके कुराडू’ से एक उद्धरण दिया था जिसमें लेखक ने बचपन में देवों की मूर्तियों पर पेशाब कर दिया था कि वे यह जान सकें कि क्या इससे कोई दैवी प्रकोप होता है। इस कारण विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और श्री राम सेना जैसे दक्षिणपंथी कलबुर्गी और अनंथमूर्ति से नाराज हो गये थे।

कलबुर्गी ने अपने जीवनकाल में 103 पुस्तकें और 400 लेख लिखे। वे वाचन साहित्य के विद्वान थे। वे जाने माने शिक्षाविद थे। वे कन्नड विश्वविद्यालय हम्पी के कुलपति भी रहे।

गोविन्द पानसरे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बन्धित थे। वे दाभोलकर के मित्र भी थे। 16 फरवरी 2015 को उनकी हत्या उस समय की गयी जब वे सुबह की सैर पर थे। दरअसल पानसरे ने अपनी हत्या के एक माह पूर्व ही गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के बारे में कुछ तथ्य उजागर किये थे। उनका कहना था कि गोडसे एक मनोरोगी हत्यारे थे। दक्षिणपंथी उनके गौरव की गाथा गाते हैं जबकि गोडसे की लानत मलामत की जानी चाहिए। उसी वर्ष जनवरी में शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर में अपने भाषण में गोडसे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा बताया। उनका कहना था कि गांधी को इसलिए नहीं मारा कि उन्होंने पाकिस्तान बनने दिया या पाकिस्तान को पचास करोड़ रुपये देने के लिए जोर दिया।

सच्चाई तो यह है कि गांधी पर इससे पूर्व भी हत्या के प्रयास किये गये थे। 1948 में गांधी की हत्या में भाग लेने वाले दूसरे व्यक्ति नारायण आप्टे ने 1934 में एक बम हमले में गांधी को मारने का उस समय भी प्रयास किया था जिस समय तक पाकिस्तान की मांग उठी तक नहीं थी। 1934 में गांधी के छुआछूत के खिलाफ दौरे के दौरान जब वह पुणे में निगम कार्यालय से अपनी कार की ओर जा रहे थे तब उनकी गाड़ी पर उग्रपंथियों ने बम फेंका था पर वह उन्हें लगा नहीं। पानसरे ने महाराष्ट्र के सतारा जिले के पंचगनी में गोडसे द्वारा एक चाकू के माध्यम से गांधी की हत्या करने के 1944 के प्रयास का भी उल्लेख किया।

पानसरे ने अवकाश प्राप्त पुलिस अफसर अहमद शमशुद्दीन मुशरिफ द्वारा लिखी गयी पुस्तक पर एक सार्वजनिक बहस कराने का प्रयास किया। यह पुस्तक महाराष्ट्र राज्य आतंकवाद विरोधी दस्ते के मुखिया हेमंत करकरे की हत्या के विषय पर है। अक्तूबर 2008 में एटीएस ने तथाकथित हिन्दू आतंकवादियों को गिरफ्तार किया जिनमें विहिप नेता प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी अमृतानंद उर्फ दयानन्द पाण्डेय, अवकाश प्राप्त मेजर रमेश उपाध्याय और फौज के एक कार्यरत अफसर लेफ्टिनेन्ट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल थे। करकरे उपरोक्त द्वारा किये गये आतंकवादी हमलों की जांच कर रहे थे और यह तथ्य इस किताब में शीर्षक ‘करकरे के हत्यारे कौन?’ वाले अध्याय में दर्ज है। उग्र हिन्दु संगठन इस बात से नाखुश थे कि करकरे की हत्या को उपरोक्त अभियुक्तों व विषय के साथ जोड़कर दर्शाया जाये। यह दीगर बात है कि केन्द्र्र और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद इन सभी आरोपियों को क्लीन चिट देकर रिहा कर दिया गया।
कोल्हापुर जिले में 13 जनवरी 2015 को आयोजित ‘डा- नरेन्द्र दाभोलकर और तार्किक आंदोलन की हत्या’ विषय पर जब कामरेड पानसरे बोले तो हिन्दू जनजागरण समिति ने उन्हें सनातन संस्था तथा अन्य हिन्दुवादी संगठनों की आलोचना करने से बचने की हिदायत दी।

पानसरे की संस्था अंतर्जातीय विवाहों के लिए प्रेरित करती थी। पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्ठी यज्ञ जैसी कुरीतियों का विरोध करती थी। पानसरे टोल टैक्स के विरोध में थे।

पानसरे व दाभोलकर दोनों की हत्या में कई समानताएं हैं। दोनों तार्किक पृष्ठभूमि के सामाजिक कार्यकर्ता थे। दोनों अंधविश्वासों के विरोध में थे। दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादियों में इन दोनों के प्रति असहिष्णुता का भाव था। दोनों की हत्या प्रातःकाल की सैर के समय की गयी। दोनेां हत्याओं में हमलावर मोटरसाइकिल पर आये थे। दोनों की हत्या बहुत नजदीक से पिस्तौल द्वारा की गयी। पानसरे की हत्या से कुछ समय पूर्व ही उन्हें एक धमकी मिली थी कि उनका हश्र भी दाभोलकर जैसा होगा।

कलबुर्गी, दाभोलकर और पानसरे की हत्या किसने की? क्यों हुई? किसी ना किसी हत्यारे की बन्दूक से निकली गोली से इनकी मौत हुई। लेकिन क्या वे हत्यारे ही इन हत्याओं के जिम्मेदार थे या इनके पीछे कोई बड़ी साजिश थी। क्या वे जिम्मेदार हैं जिनकी मान्यताओं और विश्वास के विरोध में ये तीनों अपनी मुहिम चलाते रहे हैं? क्या हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथी संगठन इसके लिए उत्तरदायी हैं? क्या उन स्वयंभू भगवानों ने अपने गुर्गों से यह काम करवाया है जिनके खिलाफ इन तर्कशील विद्वानों ने आमजन को आगाह करने की कोशीश की। दरअसल इनकी हत्या के लिए दक्षिणपंथी सोच उत्तरदायी है जो अपना विरोध स्वीकार नहीं करता। यही अस्वीकार्यता हिंसा और हत्या के लिए प्रेरित करती है। ऐसी अस्वीकार्यता के लिए किसी का हिन्दू या मुसलमान होना जरूरी नहीं है। यह अतिवादिता किसी भी मजहब या तबके में हो सकती है। दाभोलकर और पानसरे के संदर्भ में ये अस्वीकार्यता निश्चय ही उस तबके की रही होगी जिनके विरोध में ये दोनों खड़े थे।