केन्द्रीय बजट 2015-16: प्रचार और हकीकत

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जयंती घोष

जयंती घोष

भारत में वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषणों जिन विशेष मुद्दों पर जोर दिया और अब उनसे निबटने के लिए आवंटित धन के बारे में बात कर रहे होते हैं, दोनो के बीच परस्पर विरोध नजर आता है। यह स्थिति पूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बरम के बजट भाषणों के समय भी दिखायी देती थी। लेकिन वर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली अपने लच्छेदार भाषण और आत्मप्रशंसा के अंदाज में समस्याओं के समाधान और योजनाओं का जिस अदंाज में जिक्र करते हैं तब उनका कोई सानी नजर नहीं आता, वे यहां चिदम्बरम को पीछे छोड़ देतें हैं।

कृषि पर विचार करें। अच्छी खबर है कि राजग सरकार कृषि में संकट के बारे में कम से कम सचेत तो हुई, अन्यथा पिछले एक साल से अधिक समय से तो वह देश में जारी कृषि संकट और किसानों की बदहाल स्थिति को लगातार नकारती आ रही थी। अब उसने किसानों की चिंता करते हुए बजट में कई उपायों (ज्यादातर में पहले की योजनाओं और कार्यक्रमों के नाम में बदलाव भर किया गया है) का ऐलान किया है। इन ऐलानों, योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए तय धन पर नजर डालते हैं तो पता लगता है कि वित्त मंत्री ने इनके लिए धन आवंटन में वास्तविक वृद्धि करने की जगह बाजीगरी का ही अधिक इस्तेमाल किया है। कागजी आंकड़ों के अनुसार कृषि मंत्रालय के लिए बजट आवंटन में धनराशि 22,959 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 44,486 करोड़ रुपये किया गया है। देखने पर तो यही लगता है कि यह एकमुश्त (15,000 करोड़ रुपये) भारी बढ़ोतरी है, परंतु वास्तविकता यह है कि यह किसी नये आवंटन के बदौलत नहीं है। अब कर्ज में यह छूट कृषि मंत्रालय के माध्यम से किसानों को दी जायेगी। इस प्रकार ब्याज में छूट के रूप में सब्सिडी की यह रकम वित्त मंत्रालय के खाते की जगह कृषि मंत्रालय के खाते में स्थानांतरित कर दी गयी है। इस बाजीगरी को अगर हटा कर कृषि मंत्रालय के खातों को देखा जाये (जैसा कि किया जाना चाहिए) तो बजट में किसानों के लिए आवंटन में की गई वृद्धि कोई खास नहीं है। कृषि के लिए बजट व्यय में कुल वास्तविक बढ़ोतरी जीडीपी के 0.17 प्रतिशत से बढ़कर महज 0.19 प्रतिशत हुई है।

इसी तरह वही मनरेगा योजना जो कि अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बिल्कुल पसंद नहीं थी, वे इसकी जमकर खिल्लियां उड़ाते रहे हैं, अब फिर से प्रतिष्ठित की जा रही है। यहां तक कि जेटली ने इस कार्यक्रम के लिए सर्वाधिक धन 38,500 करोड़ रुपए आवंटन किये जाने का ऐलान किया है। लेकिन ऐसा करते वक्त तीन महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरंदाज किया गया है। सर्वप्रथम, मनरेगा एक मांग आधारित योजना है। इस तरह से सरकार इसके लिए कर्तव्यबद्ध है कि वह श्रमिकों की मांग के अनुसार जितना भी धन आवश्यक हो, उपलब्ध कराये। अधिक धन आवंटन का ऐलान ठोकते हुए ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री या सरकार उदारता का परिचय दे रही है, जबकि यह कानूनन उसका दायित्व है। दरअसल सरकार अपने कानूनी कर्त्तव्य में बचने का रास्ता तलाश रही है।

दूसरा, सरकार मनरेगा के लिए आवश्यकतानुसार धन राज्यों को उपलब्ध कराते वक्त बेहद कंजूसी और सुस्ती का परिचय देती रही है। यहां तक कि मनरेगा के मद में 14 से अधिक राज्यों की सरकारों को केंद्र सरकार द्वारा इस समय कई हजार करोड़ रुपये देना है। यह केंद्र सरकार पर बकाया हैं। अगर इसकी गणना की जाये तो बजट में आवंटन वास्तव में बहुत कम है।

तीसरा, संप्रग के तहत मनरेगा की योजना जिस स्तर पर लागू थी, बजट में आवंटित यह राशि उस स्तर के अनुसार काफी कम है, 2009-10 में मनरेगा के लिए जीडीपी का 0.59 प्रतिशत धन आवंटित किया गया था। उसकी तुलना में अब जीडीपी का केवल 0.25 प्रतिशत आवंटन किया गया है। अन्य सामाजिक व्यय में भी स्थिति बदतर है।

भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में सभी के लिए स्वास्थ्य का लक्ष्य घोषित किया गया था, लेकिन इस बजट में इसे बीपीएल परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों तक ही सीमित करने का प्रयास किया गया है। घोषणा पत्र के अनुसार तुलना की जाये तो यह कुछ भी नहीं है। दरअसल, कुल स्वास्थ्य ठहराव की स्थिति में है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए बजट में किया जाने वाला जीडीपी 0.24 प्रतिशत ही है, जो कि बेहद कम और शर्मनाक है। इसका तात्पर्य यह है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए खर्च को और कम कर दिया गया है और देश भर में जो सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था है उनके लिए उपलब्ध धन में मुश्किल से ही कोई बढ़ोतरी की गयी है।

महिलाओं और युवाओं की उपेक्षा जारी है, बल्कि उनको और किनारे किया गया है। एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) पर आघात किया गया है। आने वाले वित्तीय वर्ष के लिए आवंटन को और कम (केवल 14,000 करोड़़ रुपये) कर दिया गया है, जबकि इस वर्ष 15,394 करोड़ रुपये खर्च किया जाना है। सवाल यह है कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण योजना किस तरह बरकरार रहेगी, जबकि देश भर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ती और सहायिकाओं को वैसे भी बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है, तिस पर वे देर से भुगतान की समस्या से भी पीड़ित हैं। इस सवाल के जवाब का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

केंद्र सरकार की ओर से जवाब यह है कि अब वित्त आयोग के अवार्ड के कारण राज्य सरकारों के खजाने में अधिक धन आयेगा। वे इस स्वयं इस समस्या का समाधान कर सकने में सक्षम हैं। लेकिन यहां भी, केंद्र सरकार ने अधिक उपकर और अधिभार में राज्यों के साथ साझा करने की जरूरत नहीं समझी है। बल्कि कर की दरों को बढ़ा कर अपना खजाना भरने की कला ही प्रदर्षित की है। चालू वित्त वर्ष में पहले ही करों से प्राप्त राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 36.3 प्रतिशत से घटा कर 34.8 प्रतिशत कर दी गयी है। प्रस्तावित बजट में भी विभिन्न उपकर और अधिभार प्रारंभ किये हैं जो कि सभी केंद्र सरकार के पास जायेंगे। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि खर्च पर ये सीमाएं “राजकोषीय अनुशासन” को बनाये रखने के लिए जरूरी हैं। लेकिन, वास्तव में, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है अर्थव्यवस्था की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है, निवेश की दर गिर रही है, रोजगार, खासतौर से औपचारिक नौकरियां बढ़ नहीं रही हैं, बल्कि कम हो रही है। निवेश दर नीचे गिर रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को जो बड़ा अप्रत्याशित लाभ कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से हुआ, वह भी व्यर्थ होता प्रतीत हो रहा है क्योंकि थोक मूल्यों में गिरावट के बावजूद खाद्य मंहगाई से जनता त्रस्त है। स्पष्ट है कि मजदूरी में बढ़ोतरी करने और रोजगार की संभावनाओं को विकसित करने के लिए उपाय किये जाने की आवश्यकता है। कृषि, सामाजिक क्षेत्रों और रोजगार योजनाओं पर वास्तविक खर्च को बढा़कर प्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया जा सकता है और परोक्ष रूप से अधिक विस्तृत फलक पर यह कर सकना संभव है। सड़कों और रेलवे में अधिक धन लगाना (जो कि स्वयं में लंबे समय के रूप में वांछनीय है, जब तक यह हाई स्पीड रेल लिंक या अन्य वैजयंती परियोजनाओं के रूप में व्यर्थ नष्ट नहीं होता) प्रभावी विकल्प नहीं है, और इससे रोजगार का सृजन, जिसके बारे में बहुत वायदे किये गये है और जिसकी सख्त जरूरत है, नहीं होगा। हमारे लिए सबसे अफसोस जनक यह है कि अभी यह सीखना शेष है।
(लेखक -जयती घोष, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक हैं) (मैक्रो स्कैन के सौजन्य से )