आभास की आजादी बनाम आजादी की आभास

-डॉ.हेमेन्द्र चण्डालिया-

-डॉ.हेमेन्द्र चण्डालिया-

पूंजीवादी जनवाद मनुष्य को स्वतंत्रता की एक आभासी दुनिया में ले जाता है और शनैः शनैः उसे दासता का इतना अभ्यस्त बना देता है कि उसीको वह आजादी मानने लगता है। पूंजीवाद की आधारभूत स्थापनाओं में ही अंतर्विरोध के बीज छिपे हैं। पंूजीवाद उपभोक्ता को सार्वभौम मानता है तथा बाजार की समस्त प्रक्रियाओं का कारक उसे ही मानता है। शास्त्रीय पूंजीवाद की स्थापनाओं में दूसरी बड़ी मान्यता यह है कि बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता होती है, जिसके कारण उपभोक्ता के समक्ष चयन की स्वतंत्रता होती है। उपभोक्ता की पसन्द के आधार पर ही वस्तुओं और सेवाओं की मांग तय होती है। यह मांग ही यह तय करती है कि बाजार किन वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन करेगा तथा उनकी कीमत किस प्रकार निर्धारित होगी। सैद्धान्तिक पूंजीवाद की यह स्थापनाएं सामान्य पाठक के मन में पूंजीवादी जनवाद को जनतंत्र की सबसे बड़ी व सफल व्यवस्था मानने का भ्रम पैदा कर देता है। कमोबेश इसी भ्रम में व्यक्ति अपना जीवन निकाल देता है तथा अपने आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक संकटों के लिए इन ठोस धरातलीय भौतिक कारकों की बजाय किन्हीं पारलौकिक व ईश्वरीय कारणों को जिम्मेदार मानने लगता है। संस्थागत धर्म, जो स्वयं बाजार का ही उपकरण है, उसकी इस भ्रामक धारणा को पुष्ट ही करता है।

मनुष्य की विकास यात्रा में आदिम साम्यवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और फिर समाजवाद की दशाओं की कल्पना की गयी है। पंूजीवाद औद्योगिक क्रंाति की उपज है। श्रम का विभाजन, विशेषज्ञता का विकास, मुनाफे की वृद्धि व उससे जनित पूंजी का संग्रहण पूंजीवाद को जन्म देता है। यह सरप्लस वैल्यू (अतिशेष मूल्य) के सिद्धांत के आधार पर श्रम का शोषण करता है तथा श्रम की कीमत पर पूंजी निर्माण के माध्यम से विकास की बात करता है। इस व्यवस्था में पूंजीनिवेश को आर्थिक समृद्धि का आधार माना जाता है तथा उसके लिए नागरिक अधिकारों से लेकर राष्ट्रीय सार्वभौमिकता को भी दांव पर लगाया जा सकता है।

अगस्त 2016 में आजादी के सवाल पर भारत के संदर्भ में चर्चा करते समय पूंजीवादी जनवाद की इन सैद्धांतिक स्थापनाओं को याद रखना जरूरी है। यह तथ्य रोचक एवं महत्वपूर्ण है कि ‘‘आजादी’’ शब्द का प्रयोग करते ही हमें आज के समय में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के नेतृत्व में गाया गया संगठन का ध्येय गीत याद आ जाता है। भूख से, जातिवाद से, धार्मिक कठमुल्लावाद से, सभी प्रकार के शोषण से आजादी का यह गीत सत्तावर्ग को किस प्रकार विचलित कर देता है कि उसे एक 28 वर्ष के नौजवान के विरुद्ध राजद्रोह जैसे कानून का सहारा लेना पड़ता है। असल में यह शासक वर्ग मीडिया को इस तरह अपने विरोध में एक नायक का समर्थन करते देख हत्प्रभ था। इस वर्ग की पूंजीवादी अर्थतंत्र की समझ यहीं तक सीमित थी कि अपने पूंजीवादी उद्देश्यों के लिए वस्तुओं की अप्राकृतिक मांग पैदा करने के लिए मीडिया का प्रयोग करता है। इसीलिए मीडिया के लगातार आक्रामक प्रचार के कारण लगभग हर भारतीय ‘‘ठंडा’’ मतलब ‘कोकाकोला’ समझने लगा था। इस बात से बेहद प्रसन्न सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी वर्ग को यह कल्पना नहीं थी कि इसी मीडिया से कभी ऐसी आवाज निकल पड़ेगी जो आजादी की एक नयी परिभाषा जनता तक पहुंचा देगी और आजादी जिसे सत्तावर्ग ने 15 अगस्त और 26 जनवरी के झंडारोहण तथा पांच साला आम चुनाव तक सीमित कर दिया था, को अभिव्यक्ति की ऐसी आजादी के संघर्ष में बदल देगी जिससे सत्तारूढ़ दल व उसके दशाननी मुखवाले अग्रिम संगठनों की चूलें हिल जाएंगी।

लेकिन मीडियाजनित यह प्रखरता भी दीर्घजीवी नहीं बन पायी और राष्ट्र पुनः पूंजीवादी प्रचार तंत्र के दुश्चक्र में उलझता चला गया। दिल्ली में विद्यार्थियों के विरुद्ध राजद्रोह का आरोप और गुजरात में अपनी जाति के लिए आरक्षण की मांग कर रहे नौजवान हार्दिक पटेल पर राजद्रोह के आरोप एक अघोषित आपातकाल का संकेत है। ऐसे और भी अनेकानेक कदम हैं वर्तमान सरकार के, जो नागरिक स्वतंत्रता को सीमित कर अपनी निरंकुश सत्ता को बनाये रखने के लिए उठाये गये। सर्वाेच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के वर्षों से प्रमाणित कॉलेजियम व्यवस्था को बदलकर उसमें कार्यपालिका के हस्तक्षेप को बढ़ाने की कवायद उसी षडयंत्र का हिस्सा है। अब तो कोई भारतीय नागरिक क्या खायेगा उसकी भी इजाजत सत्तारूढ़ भगवा ब्रिगेड से लेनी पड़ेगी अन्यथा उसके रसोईघर के फ्रिज में ताक-झांक कर उसकी हत्या कर दी जायेगी। कौनसी फिल्म दिखाई जायेगी, कौनसी किताब पढ़ी जायेगी? और कौनसा उत्सव मनाया जायेगा? यह सब भी नैतिकता ब्रिगेड के हवाले कर कथित ‘‘राष्ट्र नेता’’ भारत के जनतंत्र को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए विश्व पर्यटन पर निकल पड़े हैं। भारत की ओर से अंतर्राष्ट्रीय बाजार को आकर्षित करने के लिए उनका यह फार्मूला बड़ा चर्चित रहा है-डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी एण्ड डिमाण्ड। लोकतंत्र, जनशक्ति और मांग। लोकतंत्र के मायने इस व्यवस्था में ये हैं कि चंूकि सत्तारूढ़ दल दोसौ बयासी सांसदों के साथ बहुमत में है इसलिए विदेशी निवेशकों के लिए जितनी सहुलियत चाहिए वे सभी दी जा सकती है, जनशक्ति का अर्थ यह है कि भारत में इतना सस्ता कुशल-अकुशल-अर्द्धकुशल श्रम उपलब्ध है कि विेदेशी निवेशकों के लिए लाभकर होगा और मांग तो है ही। एक ऐसा बड़ा मध्यम वर्ग जो विदेशी उत्पादों का खरीददार है व जिस आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है। देसी-विदेशी पूंजीपतियों को इस लोकतंत्र में इतनी आजादी है कि वे बिना किसी श्रम कानून का पालन किये, बिना कोई जनकल्याणकारी योजना लागू किये, बिना न्याय-अन्याय का ख्याल किये अपने मुनाफे को असीमित स्तर तक बढ़ा सकते है और इस काम में उनकी सहायता करने हाजिर है एक विशाल साइबर तंत्र।

गत् दिनों सर्वेक्षण भी सामने आया कि भारत में 84 करोड़ मोबाइल हैं। बहुत बड़ी जनसंख्या इन्टरनेट का प्रयोग कर रही है। ई-मेल, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर और टेलीविजन के उपभोक्ता दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। इन उपयोगकर्ताओं कीे अपनी अलग दुनिया है। यह एक आभासी दुनियां या ‘‘वर्चुअल वर्ल्ड’’ है जिसमें, उन्हें लगता है, बहुत स्वतंत्रता है व जो अभिव्यक्ति के सभी खतरों से मुक्त है। इस आभासी दुनिया की आजादी का सपना छद्म है। इसका अपना एक बाजार है, एक उपभोक्ता समाज है जिसकी एक सुनिश्चित जीवन शैली है। यह ठीक है कि संचार व संवाद का यह नवीन माध्यम लगता है। शून्य व्यय के द्वारा आपको अनेक लेागों तक पहुंचने की क्षमता प्रदान करता है। अनेक लोंगों से संवाद का अवसर भी प्रदान करता है। किन्तु यह एक अजीब किस्म की संतुष्टि का भी सृजन करता है जो आपके भीतर बाहर की यथार्थ दुनिया में जीवंत संघर्ष से उदासीन करती है। ऐसा लगता है मानो इस आभासी दुनिया में अपनी अभिव्यक्ति कर देने से हमारा दायित्व पूरा हो गया है। यह एक बड़ा खतरा है।

सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन की किसी भी लड़ाई के लिए, वास्तविक जीवन में आजादी को हासिल करने के लिए जमीनी लड़ाई आवश्यक है। आभासी दुनिया उसके लिए सहायक हो सकती है, उसका विकल्प नहीं हो सकती। जितने लोगों ने इन माध्यमों पर कन्हैया कुमार के भाषण को समर्थित किया था यदि वे सडक़ पर खुले में उतर जाते तो सारे देश में नया वातावरण बन जाता। तब वास्तविक आजादी का संघर्ष प्रारंभ होता जो अब कहीं दिखायी नहीं देता। 1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आंतरिक आपातकाल भारत में स्वतंत्रता पर एक बड़ा हमला माना जाता है। लेकिन उस समय जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, ज्योतिबसु, जॉर्ज फर्नांडीस, चन्द्रशेखर जैसे दिग्गज नेता थे जिन्होंने एक जुझारू आन्दोलन के द्वारा, जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय जनमानस भी सम्मिलित थे, आपातकाल को वापस लेने पर सरकार को बाध्य कर दिया।

वर्तमान समय में आजादी पर अतिक्रमण जितना राजसत्ता द्वारा किया जा रहा है, उतना अर्थतंत्र व कथित सांस्कृतिक किन्तु असल में साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा भी किया जा रहा है। संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और स्वंय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ऐसी शक्तियों को स्वीकार नहीं हैं। भारतीय संविधान के आमुख में प्रयुक्त ‘धर्मनिरपेक्षता’ व ‘समाजवादी’’ शब्द, भारतीय मुद्रा पर छपा गांधी जी का चित्र और हमारी राष्ट्रीय पहचान तिरंगा ध्वज और उसके बीच बना ‘अशोक चक्र’ विवादों में घसीटे जा रहे हैं। एक नयी शब्दावली का चलन शुरु हो गया है जो हमारी संस्कृति के सहयोग, सहकार, व सहअस्तित्व जैसे मूल्यों को चुनौती देती है। ‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ से बढक़र ‘‘मुस्लिम मुक्त भारत’’ जैसे नारे संसद के माननीय सदस्य दे रहे हैं। यह एक अजीब किस्म की आजादी है जो सत्ता वर्ग को असीमित अधिकार देती है और सत्ता से बाहर या अल्पसंख्यकों का अस्तित्व ही मिटा देने की धमकी देती हे। गौ-रक्षक दल नाम के संगठन के कार्यकत्ताओं ने गुजरात में मृत गाय के चमड़े को अलग करते देखने पर जिस तरह सार्वजनिक रूप से पीटा, राजस्थान में ट्रक में गायें ले जाते ड्राइवर व खलासी को पीट-पीट कर गोबर खाने पर मजबूर किया व हरियाणा व राजस्थान में प्रेमियों की हत्या, उन्हें नंगा कर पेड़ से बांध देने व पूरे गांव में घुमाने की घटनाएं हुई है उससे लगता है कि आजादी ताकतवरी सत्तारूढ़ दल व उससे संबंद्ध संगठनों को ही मिली है व कमजोर वर्गा पर जुल्म बढ़े हैं।

दूसरी ओर अर्थतत्र में असमानता अश्लीलता की सीमा तक बढ़ गयी है। पूरे देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। दूसरी ओर अम्बानी और अडानी जैसे उद्योगपति लाखों करोड़ रुपये की बैंकों की देनदारियां होते हुए भी निर्लज्ज घूम रहे हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू पर होने वाले खर्च लगभग 25 हजार रुपये पर संसद में सवाल उठाया गया था। ‘‘तीन आना बना पन्द्रह आना’’ बहस बड़ी लोकप्रिय हुई थी। तब भारत की अधिकांश जनता की एक दिन की आमदनी मात्र 3 आना थी जबकि योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत आय पन्द्रह आना थी। आज यह बहस भी कहीं होती दिखायी नहीं देती। 2005 से प्रारम्भ दशक में प्रतिवर्ष औसत 14000 से 18000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 2004 में यह संख्या अधिकतम 18241 थी जबकि नेशनल क्राइम रिर्काड्स ब्यूरों के अनुसार 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की। अधिकांश आत्महत्याएं फसल खराब होने के कारण कर्ज न चुका पाने की वजह से होती है। दूसरी ओर देश के दस बड़े पूंजीपतियों के ऊपर राष्ट्रीयकृत बैंकों का बकाया ऋण अक्टूबर 2015 में 3.04 लाख करोड़ रुपये था जिनमें अंबानी के रिलांयस समूह पर सवा लाख करोड़, वेदान्ता पर 1.03 लाख करोड़, एस्सार पर 1.01 लाख करोड़, अडानी पर 96,031 करोड़, जिन्दल समूह पर 58,171 करोड़ रुपये शामिल हैं। असली आजादी भारत के पंूजीवादी जनतंत्र में इन्हीं लोगों के लिए आयी है।

इसके विपरीत 1947 में सत्ता हस्तांतरण के बाद सबसे ज्यादा जुल्म देश के लगभग साढ़े आठ प्रतिशत आदिवासियों पर हुए हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों से लेकर राजस्थान व कश्मीर से कर्नाटक तक फैले इन आदिवासियों का न कोई राज्य है, न कोई दल है, न कोई राष्ट्रव्यापी मजबूत संगठन है। जिस विकास के नारे पर नरेन्द्र मोदी जीत कर प्रधानमंत्री बने हैं, उस कथित विकास की कीमत सबसे अधिक इन्हीं आदिवासियों ने चुकाई है। भूमि अधिग्रहण कानून 1824 जिस कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने 2013 में और फिर भाजपा नीत एनडीए सरकार ने संशोधित कर लाने का प्रयास किया, सरकार को भूमि अधिग्रहण के असीमित अधिकार देता है। न सिर्फ बिलानाम जमीन, वनभूमि बल्कि निजी खातेदारी जमीन को भी सरकार ‘‘जनहित’’ में अधिग्रहित कर सकती है। यह जनहित सामान्य तथा ‘‘अभिजन हित’’ या ‘‘कार्पाेरेट हित’’ होता है। देश के 90 प्रतिशत खनिज भंडार उन स्थानों पर हैं जहां आदिवासी रहते हैं। अतः कथित विकास के लिए आदिवासियों का विस्थापन अनिवार्य हो जाता है। यदि आदिवासी अपनी भूमि से हटाये जाने का विरोध करते हैं तो राजसत्ता अपनी पुलिस व सेना के बल पर न सिर्फ उन्हें हटा देती है बल्कि उन्हें माओवादी कहकर उनकी हत्या भी कर देती है। एक अध्ययन के अनुसार (फर्नांडीज व परांजपे 1997) 1950 से 1990 के बीच 213 लाख लोगों का विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन हुआ। इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं जो इन परियोजनाओं के चलते अपनी आजीविका के साधन नष्ट होने के कारण विस्थापन को बाध्य हुए। यदि उन्हें भी जोड़ा जाए तो यह संख्या लगभग चार करोड़ हो जाती है। इसके 84 प्रतिशत आदिवासी हैं।

1991 के बाद नव उदारवादी नीतियों के चलते यह संख्या और बढ़ी है व पूंजीपतियों को सहूलियत प्रदान करने के लिए सरकारें बन्दूकों की नोक पर जमीन आदिवासियों से खाली करवा कर कार्पाेरेट पूंजीपतियों को सौंप रही है। स्वयं सरकार का मानना है कि इसमें से 25 प्रतिशत से भी कम लोगों का पुनर्वास संभव हो पाया है। यह आजादी की आभासी दुनिया है। इन सारे संकटों के बावजूद इन गांव देहात में दूर-दराज के गांवों में पन्द्रह अगस्त व छब्बीस जनवरी को लोग उत्साह से राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं, मिठाई बांटते व भारत माता की जय बोलते हैं। उनके घरों पर बुलडोजर चलाकर खनिजों से हजारों करोड़ रुपये कमाने वाले पूंजीपति शायद ही ऐसे किसी राष्ट्रीय दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज को सलाम करने पहुंचते हों। उनके लिए वास्तविक आजादी इतनी है कि वे इस राष्ट्रीय कर्त्तव्य से भी आजाद है। समय मिले और कोई उन्हें अतिथि बना कर बुलाये तो चले जायें, वर्ना न भी जायें तो क्या फर्क पड़ता है।
डॉ.हेमेन्द्र चण्डालिया
सम्पर्कः ‘प्रांजल’, 76 बी रूप नगर
सेक्टर 3 , हिरन मगरी , उदयपुर (राज.) 313002