ऐसा देश है मेरा! सोणा देश है मेरा!

-सुरेश कांत-

-सुरेश कांत-

देखने से भले ही कहीं से न लगता हो, पर यह सच है कि आज़ादी के लिहाज से अपना देश सत्तरवें साल में प्रवेश कर कर गया है। जैसा कि हममें से बहुत-से लोग जानते होंगे, अपने इस प्यारे देश का नाम इंडिया है और यहां की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। कुछ सिरफिरे लोग इसे भारत या हिंदुस्तान कहकर भी पुकारते हैं और यहां की राष्ट्रभाषा हिंदी होने की गलतफहमी पैदा करने की कोशिश करते हैं, पर शुक्र है भगवान का कि विदेशी ही नहीं, देशवासी भी उनकी बातों में नहीं आते। वैसे भी, चूंकि राष्ट्रकवि शेक्सपियर ने अंग्रेजी में घोषित किया हुआ है कि नाम में क्या रखा है, अतः इस देश का नाम कुछ भी होता, फर्क कुछ न पड़ता। हम-आप इसी तरह इस मुल्क के एक कोने में पड़े सड़ते रहते और कुछ दबंग नेता और अफसर, जिन्हें नेता या अफसर कहने के बाद दबंग कहने की या दबंग कहने के बाद नेता या अफसर कहने की जरूरत नहीं, इस देश को अपनी जागीर समझते रहते।

इंडिया, चलिए भारत ही सही, पहले कृषि-प्रधान देश था, अब कुर्सी-प्रधान देश है। पहले सोने की चिड़िया था, अब सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है, खासकर विदेशियों की नजर में। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने लिखा भी है, “अरुण यह मधुमय देश हमारा। जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।” यह अनजान क्षितिज और कुछ नहीं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रतीक है। अलबत्ता कुछ विद्वान् इस कविता को अरुण शौरी का लिखा हुआ भी मानते हैं। विवाद खड़ा करने के शौकीन कुछ लोग इसे जयशंकर प्रसाद की भी बताते हैं।

देश के अस्सी प्रतिशत लोग खेती पर और बाकी राहत-कार्यों पर निर्भर हैं। यहां की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है, जिसका सबूत यह है कि विदेशी भी ऐसा ही कहते हैं। हमारे पास साधनों का कोई अभाव नहीं। कोयले, लोहे, तांबे, अभ्रक आदि के विशाल भंडार हैं। जमीन से कोयला निकाला जाता है, तो कोयले के साथ घोटाला मुफ्त में निकलकर आता है। आर्थिक स्थिति हमेशा अच्छी बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि खनिज भंडार बने रहें। हम इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं। इसी वजह से खानों से ज्यादा चीजें नहीं निकालते और बिना उसके ही कोयले की दलाली में मुंह काला और धन सफेद करते रहते हैं।

भारत भारत है, यहाँ नदियों की जगह नदियां, पहाड़ों की जगह पहाड़ और मैदानों की जगह मैदान हैं, जिनमें सबसे ज्यादा फसल नेताओं की होती है। इनमें से जो कुछ छंटे हुए नेता होते हैं यानी छंटकर प्रधानमंत्री जैसे ऊंचे पदों पर पहुंच जाते हैं, वे देश का कर्ज उतारने के लिए बार-बार विदेशों में जा-जाकर अपने देश की बुराई करके उसकी बड़ाई करने का दुष्कर कार्य करने लग जाते हैं। देश में इफरात में पैदा होने वाली अन्य फसलों में मक्कारी, बेईमानी, तस्करी, घोटाले, दलबदल, रिश्वतखोरी, सेक्स-स्कैंडल, अफीम और कच्ची शराब आदि प्रमुख हैं। कहीं-कहीं गेहूं, मक्का, बाजरा आदि भी पैदा होता है, जिसके लिए किसान बारहों महीने पछताता है।

भारत में तीन ओर समुद्र है, जो तस्करों और आतंकवादियों को जान जोखिम में डालकर भी देश को अपनी बहुमूल्य सेवाएं देने का अवसर उपलब्ध कराता है। भारत में रेगिस्तान भी हैं, जिसमें सबसे प्यारी चीज रेत होती है जो फांकने के काम आती है। वैसे एक राजस्थानी गीत के अनुसार महिलाएं भी रेतीले जैसलमेर की ही सबसे सुंदर होती हैं, हालांकि इसका मुझे कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं। जहां पर रेगिस्तान नहीं, वहां पर वन हैं और जहाँ पर वन हैं, वहां पेड़-पौधे हैं जिन्हें काटा जाता है, ईंधन के तौर पर जलाया जाता है और बहुओं, दलितों, आदिवासियों को जिंदा जलने के काम में भी लाया जाता है। जहां-तहां बलात्कार होते रहते हैं, जिनमें किसी का हाथ-मुंह काला नहीं होता।

पहले भारत में घी-दूध की नदियां बहती थीं, अब उन नदियों में प्रदूषण की बाढ़ आयी रहती है। जबसे दूध यूरिया और साबुन से बनने लगा है, गायें दूध देने के कम, दंगा करवाने के काम ज्यादा आने लगी हैं। जीते-जी गाय मनुष्य के जितने काम आती है, मरकर उससे भी ज्यादा काम आती है। इसलिए समझदार लोग इधर कसाईखाने चलाते हैं, उधर गाय के मरने पर दंगे करवाकर गोभक्ति का परिचय देते हैं।

दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए देश का हर नागरिक दिल्लीमुखी है, यहाँ तक कि हरेक की अपनी अलग दिल्ली है। चपरासी की दिल्ली, दिल्ली के चपरासी की जेब में और मंत्री की दिल्ली प्रधानमंत्री की मुट्ठी में रहती है। दिल्ली में अन्य चीजों के अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन इफरात से पाये जाते हैं। जिन लोगों के पास कोई काम नहीं होता, वे ऐसे संगठनों के सचिव और अध्यक्ष बन जाते हैं, जिससे उनके पास काम ही काम हो जाता है। देश में कई बड़े नगर हैं, जिन्हें सुविधा के लिए महानगर कहा जाता है, हालांकि वहां असुविधाएं ज्यादा होती हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई ऐसे ही महानगर हैं, जहां अट्टालिकाओं में तस्कर और झुगी-झोंपड़ियों में बेबस मानवता रहती है।

हमारा प्रमुख व्यवसाय एक-दूसरे की आलोचना करना है। एक की टांग खींचना, दूसरे के मामले में टांग अड़ाना, तीसरे से हाथापाई और हाथापाई के बाद जूतम-पैजार करना हमारा पसंदीदा शगल है। रात को अलबत्ता फिर सब इकट्ठे हो जाते हैं और मिलजुल कर दारू पीते हैं, ताकि सुबह फिर से आपस में जूतम-पैजार की जा सके। जबसे नवाबों का जमाना लदा है, मुर्गेबाजी, बटेरबाजी, पतंगबाजी आदि की जगह इस थुक्काफजीहतबाजी ने ले ली है।

देश में शिक्षा की बाढ़-सी आ गयी है। इस क्षेत्र में हमने इतनी तरक्की कर ली है कि विद्यार्थी जिस विषय में चाहे, टॉप कर सकता है, यहां तक कि कई बार तो उसे खुद पता नहीं चलता कि उसने किस विषय में टॉप किया है। टॉप करना पास होने से भी ज्यादा आसान हो गया है। शिक्षा की उन्नति में सरकार का सहयोग लोगों ने भी हर गली-मुहल्ले में पब्लिक स्कूल खोलकर दिया, जिनका आम पब्लिक से कभी कोई नाता नहीं रहा। सहायक उद्योगों के रूप में कोचिंग उद्योग और नक़ल उद्योग ही नहीं, फर्जी डिग्री उद्योग भी पनप आये, जिन्होंने डिग्री पाने के लिए पढ़ना अप्रासंगिक बना दिया। नेता जैसे व्यस्त लोगों का तो ये ही एकमात्र सहारा होते हैं।

देश का शिक्षा विभाग मूलतः तबादला विभाग है। इस विभाग में चूंकि अक्सर पति-पत्नी दोनों इकट्ठे काम करते हैं। इकट्ठे काम करने के कारण ही अक्सर वे पति-पत्नी हो जाते हैं। अत। दोनों में से एक का तबादला करके परिवार-नियोजन कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की कोशिश की जाती है। लेकिन पता नहीं कैसे, यह प्रयोग भी विफल रहता है और फलतः हमारी आबादी सवा सौ करोड़ तक पहुंच गयी है। शिक्षा के क्रम में ही पीएचडी का भी विकास हुआ है और हालत यह हो गयी है कि हर लल्लू-पंजू, ऐरा-गैरा, नत्थू खैरा किसी न किसी शिक्षा की दुकान से पीएचडी होने की फिराक में रहता है। जो हो जाता है, वह सोच में पड़ जाता है कि होकर भी क्या हुआ और जो नहीं हो पाता, वह इस सोच में कि इतना पैसा खर्च करके भी क्यों नहीं हुआ?

भारत में रेल-परिवहन काफी विकसित है। समूचे देश में रेल की पटरियों का जाल-सा बिछा है। इन पटरियों का हमारे निजी जीवन में भी बड़ा महत्त्व है। इन पर नित्यकर्म से निवृत्त हुआ जा सकता है। खुले में शौच न करने और घर में ही शौचालय बनवाने के सरकारी आदेश का पालन चूंकि बेघर लोग चाहकर भी नहीं कर सकते, लिहाजा स्टेशन के निकट बसे लोगों का सहारा रेल की पटरियां ही बनती हैं। रेल की पटरियों में फिश-प्लेटें भी होती हैं, जो उखाड़े जाने के काम आती हैं। रेल की पटरियों का एक उपयोग और भी है, उन पर रेलगाड़ियां चलती हैं। वैसे यह उपयोग बहुत गौण है, क्योंकि भारतीय रेलगाड़ियां अकसर पटरियों से नीचे भी चलती हैं। पिछले दिनों कई रेलगाड़ियां थल पर चलते-चलते जल में उतर गयीं। इससे पता चलता है कि भारत में रेलगाड़ियों को जल-थल दोनों पर समान रूप से चलाने के जोरदार प्रयास किये जा रहे हैं, जिसमें नदी-नालों पर रेल के पुल बनाने वाले ठेकेदार भरपूर योगदान कर रहे हैं।

इधर हमारे देश ने कई क्षेत्रों में काफी तरक्की की है। पैदावार बढ़ी है। बच्चे भावी भारत के कर्णधार हैं, यह बात हम शुरू से ही ध्यान रखते आये हैं। यही कारण है कि ‘दो या तीन बस!’ के सरकारी नारे को ‘दो या तीन बस?’ के रूप में लेते हुए हमने भारत के लिए कर्णधारों की भरमार कर दी है। कुछ धार्मिक नेता तो इससे भी संतुष्ट नहीं हैं और ‘कम से कम चार’ का नारा देते हैं। इसके बिना उन्हें धर्म खतरे में नजर आता है। सरकार के अथक प्रयासों से बचत भी बढ़ी है। स्थिति यह हो गयी है कि लोगों को बाजार जाने पर पता चलता है कि वे अपनी आय का उपयोग बचत करने के अलावा और किसी चीज के लिए कर ही नहीं सकते।

भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुख्य रूप से दो ही घटनाएं हो पाती हैं। आयात और निर्यात। भारत जिन चीजों का आयात करता है, उनमें तेल सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस तेल का एक पूल होता है, जिसका घाटा बराबर बढ़ता ही जाता है। उसे कम करने का एक ही सरल उपाय सरकार को लगता है, कीमत बढ़ाना। सरकार यह उपाय बड़ी शिद्दत से करती रहती है, यहां तक कि जब अंतरराष्ट्रीय जगत में तेल की कीमतें घटती हैं, तब भी देश में तेल की कीमतें बढ़ती हैं।

तेल मुख्यतया बसों और बहुओं को जलाने के काम आता है, हालांकि उससे वाहन चलाने का परंपरागत काम भी भरपूर मात्रा में लिया जाता है। तेल से चलने वाले वाहन बाई-प्रोडक्ट के रूप में धुएं का जोरदार उत्पादन करते हैं, जो मच्छरों को मारकर डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों के उन्मूलन में वाहन-चालकों के विनम्र योगदान का परिचायक है। धुएं से दमा, कैंसर, टीबी जैसे दूसरे रोग हो भले हो जाएं, पर मच्छरजन्य बीमारियों के मामले में वह बहुत आश्वस्तकारी समझा जाता है। सरकार इसीलिए उनकी तरफ से पूरी तरह आश्वस्त रहती है और अपनी ओर से कोई और कदम उठाना आवश्यक नहीं समझती।

भारतीय निर्यात की प्रमुख मद खाद्यान्न है। भारत से खाद्यान्न का निर्यात भारतवासियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से निहायत जरूरी है। देश में ज्यादा अनाज रहने से लोग ठूँस-ठूँसकर खाने से मर जायेंगे, जो बिना खाये मरने से ज्यादा शर्मनाक है। लोग अगर नहीं भी मरे, तो यह तो होगा ही कि ज्यादा अनाज रहने से लोग अनाज ही अनाज खा पायेंगे, चारा नहीं, जो कि स्वास्थ्य की दृष्टि से ज्यादा फायदेमंद है। इधर हम अपनी निर्यात-सामग्री में नयी-नयी वस्तुएं, जैसे कि सांसदों की हिंदी-समिति आदि, जोड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं।

हमारा देश एक विकासशील देश है और यह बात हम कुछ इस गर्व से कहते हैं कि विकसित देश तक डर जाते हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने यही बात दोहरा-दोहराकर अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक सबकी मिट्टी खराब कर दी। सब विकसित देश सोच में पड़ गये कि विकासशील होना कहीं विकसित होने से भी ज्यादा बढ़िया तो नहीं?

देश में सहिष्णुता का भयंकर बोलबाला है, जिसे साबित करने के लिए असहिष्णुता का सहारा लेने में भी संकोच नहीं किया जाता। जो असहिष्णुता का नाम भी ले लेता है, उसका नामोनिशान तक मिटाने की तैयारी रहती है। इसके बावजूद जिन्हें सहिष्णुता नजर नहीं आती, उन ढीठ लोगों को पाकिस्तान चले जाने के लिए धमकाया जाता है। सुनते ही आदमी को सब जगह सहिष्णुता ही सहिष्णुता नजर आने लगती है। देश में राष्ट्रवादियों और अराष्ट्रवादियों की दो धाराएं प्रचलित हैं। चूंकि सरकार राष्ट्रवादियों की है, इसलिए जो उनके साथ नहीं हैं, वे सब अराष्ट्रवादी हैं। अराष्ट्रवादियों को चुन-चुनकर राष्ट्रवादी बनाने या पाकिस्तान भगाने की मुहिम जारी है। राष्ट्रवाद का लक्षण है यह विश्वास कि देश की सभी समस्याओं के लिए गांधी-नेहरू जिम्मेदार हैं, खासकर पाकिस्तान की समस्या के लिए गांधी और कश्मीर की समस्या के लिए नेहरू। सरकार द्वारा हाल ही में नागालैंड के लिए अलग झंडा और अलग पासपोर्ट स्वीकृत करना सर्वथा राष्ट्रवादी मामला है, जिसकी तुलना कश्मीर से नहीं की जानी चाहिए।

देश समृद्ध है और जनता खुशहाल। बड़े-बड़े नेता आम आदमियों की तकलीफें जानने के लिए अकसर देश का दौरा किया करते हैं। वे सर्किट-हाउसों से लेकर फाइव-स्टार होटलों तक की खाक छान मारते हैं, लेकिन कहीं कोई भूखा-नंगा नजर नहीं आता। जी तरसकर रह जाता है भूखे-नंगों के साथ सेल्फी लेने के लिए। सभी देशवासी सुखी और प्रसन्न हैं। कहीं-कहीं तो लोग इतने संपन्न हैं कि लंगोटी तक पहनते हैं। सभी के लिए आवास उपलब्ध है। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार कुछ लोग छतों के नीचे रहते हैं, तो बाकी गरीबी की रेखा के नीचे।

ऐसा देश है मेरा! सोणा देश है मेरा!

-सुरेश कांत
7-एच, हिमालय लीजेंड, न्याय खंड-1,
इंदिरापुरम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) 201014