‘जंगलनामा’-आदमी से आदमी तक

-प्रस्तुति कमल सिंह-

-प्रस्तुति कमल सिंह-

‘जंगलनामा’-आदमी से आदमी तक की यात्रा
‘जल, जंगल, जमीन हमारा है’ यह आदिवासियों का राजनीतिक नारा मात्र नहीं है, भले ही इसका रास्ता राजनीति हो। यह आदिवासियों के जीवन-दर्शन, इतिहास और स्मृति का अभिन्न हिस्सा है, जो उन्हें बार-बार लड़ने की प्रेरणा देता है। आज आदिवासी अंचलों में जल, जंगल और जमीन एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। विकास और सभ्यता के पैरोकारों को आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और आर्थिक पक्ष की भावभूमि को समझने का प्रयास करना होगा।

आदिवासियों और उनकी जरूरतों और आंदोलन को कई लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी अपनी तरह से समझने का प्रयत्न किया है।

जनवरी 2010 में पेंग्युइन ने विश्व भारती द्वारा अंग्रेजी में अनुदित सतनाम की ‘जंगलनामा’ का प्रकाशन किया था। इससे पूर्व सतनाम की मूल पंजाबी में लिखी पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2004 में हो चुका था लेकिन अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशित होने के बाद विश्व भर में इसकी चर्चा हुई। सतनाम ने बस्तर के आदिवासियों के बीच रहकर जो अनुभव प्राप्त किया है, उसे अपनी इस कृति में शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया है। सतनाम ने माओवादी गुरिल्लाओं के बारे में बस्तर के आदिवासियों के बीच रहकर जो अनुभव प्राप्त किया है उसका सम्भवतः पहली बार विश्वसनीय वर्णन किया है। सतनाम इसे एक यात्रा वृतंात कहते है। यह पुस्तक जंगल के जीवन से अधिक बस्तर में माओवादी आंदोलन से प्रभावित क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति, विकास की नीतियों और सभ्य समाज की विद्रूपताओं को उजागर करती है। वनवासियों के जीवन के भोलेपन में उनकी उदात्त मानवीय मूल्य, जिनको पंूजीवादी लोभ डसने के लिए आतुर है, इस खूबसूरती और रोमांटिक अंदाज में उकेरती हेै कि लोकतंत्र और सभ्य समाज की दुहाई देने वाली सरकारों और संसदीय व्यवस्था के पैरोकार बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता है। इस पुस्तक के साथ अरुंधति राय का माओवादियों के बीच रहकर अनुभव किया लेख ‘वाकिंग विद् द कामरेड्स’ एक बार फिर चर्चा में है, जिसके लिए यथास्थिति के पैरोकारों ने उन्हें देशद्रोही और पता नहीं कैसे-कैसे आारोपों से नवाजा था।

यह महज इत्तेफाक है कि अरुंधती रॉय ने बस्तर के जंगलों में जाकर माओवादियों के साथ कुछ समय बिताया और पत्रकारिता के दृष्टिकोण से उनकी दशा दिशा को उजागर किया। जिसका प्रकाशन वर्ष 2010 में ही हुआ। पत्रकार अनिल चमड़िया ने अरुंधति राय के ‘वाकिंग विद् द कामरेड्स’ और जंगलनामा की तुलना की है। उन्होंने लिखा है कि आखिर अरुंधति ने दंतेवाड़ा के जंगल से लौटकर ऐसा क्या लिखा और कहा कि उसे माओवादी हिंसा समर्थक और राष्ट्रद्रोही कहा जाने लगा? क्या उनका एहसास, ‘मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह उंघते हुए बोली, ‘‘मैं सोच रही थी कि देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है- बेमानी है?’’ चमड़िया आगे लिखते हैं, ‘‘लेखक क्या करता है? पूरी ताकत से हर क्षण के अपने एहसास की ऐसी तस्वीर बनाना चाहता है कि किसी रंग की कोई सतह तक नहीं छूट पाये। वह एक विरोधाभासी स्थिति की तस्वीर उतारता है। जंगल के लोगों के साथ रहकर अरुंधति की बनायी ये तस्वीरें चुभती हैं? और साथ में जंगलों में जवान लड़कियों व लड़कों के कंधे पर बंदूक? अरुंधति की तस्वीरों के ज्यादा चुभने के कारण हैं।’’ उनकी पृष्ठभूमि से जो प्रतिनिधि चेहरा बनता है और जिस समाज की वे तस्वीर उतारती हैं, उनके बीच एक खाई दिखती है। वह वीभत्सता के खून से भरी होती है। गांधी कहते थे कि एक आम भारतीय और एक खास के बीच पांच हजार गुना कमाई का फर्क है। माओवादी कहते हैं कि आजादी, लोकतंत्र, गांधीवाद, अहिंसा, संविधान, चुनाव, संसद, मीडिया, न्यायालय इन सबकी मौजूदगी में एक आम भारतीय और दूसरे भारतीय के बीच एक लाख गुना से ज्यादा का फर्क पहुंच गया है। अरुंधति इसे लिखती हैं और अपने जो सूत्र बुनती हैं, वे सीधे चोट करते हैं ‘’आदिवासियों का 99 प्रतिशत हिस्सा माओवादी नहीं है लेकिन माओवादियों में 99 प्रतिशत आदिवासी हैं।’’ जितने तीखे और गहरे नजरिये से लेखक स्थितियों को देखता है, उसकी चोट उतनी ही परेशान करती है। वही हिम्मत कर सकता है कि चलो मुझे जेल में डाल दो का साहस रखता है ।’

चमड़िया सतनाम के ‘जंगलनामा’ के संदर्भ में अरुंधति का हवाला देते हुए एक और सवाल उठाते हैं कि माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर अरुंधति के ‘वाकिंग विद द कामरेड्स’ पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों और उन्होंने की है जो भारतीय भाषाओं में लगभग अंग्रेजी की तरह ही लिखते व सोचते हैं। क्या यही बात हिंदी और पंजाबी या दूसरी भाषाओं में लिखी जाती, तो इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती?
तेलुगु में पी शंकर की पारनंदि निर्मला द्वारा हिंदी में अनूदित ‘यह जंगल हमारा है’ भी आदिवासियों की स्थिति को दर्शाती है। अरुंधति के लेख में तो जंगल की झलक भर है। अरुंधति कथात्मक शैली में बताती है कि इन जंगलों में 1980 के आसपास माओवादियों के आने से पहले किस किस तरह के संगठन, संस्था और लोग आये। तेलुगु की किताब बताती है कि भूमि से वंचित हुए, स्वतंत्रता को खोने वाले, जंगल पर अधिकार को भी खोने वाले, यहां तक कि एक साधारण मनुष्य को मिलने वाले सम्मान भी खोने वाले, लूटखसोट करने वालों के औजार मात्र बन गये। उन आदिवासियों के लिए एक मात्र क्रांतिकारी (माओवादी) ही सहारा बनकर खड़े हुए हैं। 262 पृष्ठों में फैली कहानियां लोक और तंत्र को दो हिस्से में स्थापित करती हैं।

चमड़िया ने बताया है, ‘‘सतनाम की किताब पंजाबी में थी, जिसका हिंदी में अनुवाद महेंदर ने जंगलनामा के नाम से किया और बाद में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। जैसे अरुंधति जंगलों में गयीं, पंजाबी लेखक सतनाम भी बैलाडिला शहर से जंगल में प्रविष्ट हुए और कई दिनों तक वहां आदिवासियों के बीच रहे। अरुंधति लिखती हैं, ’‘पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) का एक कॉमरेड नीलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह पास आया, तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चीटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चीटिंयां उसके पूरे शरीर पर दौड़ रही थी और हाथ व गले में काट रही थी। नीलेश खुद भी हंस रहा था। कामरेड वेणु ने पूछा, ‘‘क्या आपने कभी चीटियों की चटनी खायी है?’’ सतनाम पंजाबी में न केवल ऐसी उनकी जीवन दशा लिखते हैं बल्कि 160 पृष्ठों में जंगलनामा पूरा करते हैं, तो उसमें अरुंधति और उसकी मां गूंजती सुनायी देती हैं। अरुंधति अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।

एक तरह से यह कहा जा सकता है कि सतनाम का ‘जंगलनामा- बस्तर के जंगलों में’ अपने तरह की अनूठी रचना है। इसके महत्व का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मूलतः पंजाबी में लिखी गयी उनकी इस कृति का अब तक अंग्रेजी सहित छः भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

माओवादी आंदोलन पर वैसे कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। कुछ चर्चित हैं, कुछ नहीं। सतनाम की ‘जंगलनामा’ उन सच्चाइयों से परिचय करने का एक प्रयास भर है, जिनसे हम या तो अब तक महरूम हैं या फिर गलत जानकारी के शिकार। इस पुस्तक के बारे में हरिपाल त्यागी लिखते हैं ‘‘अपनी अनूठी विषय वस्तु और सहज-सरल लेखन शैली की वजह से तो यह पुस्तक खास अहमियत रखती ही है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत है- आम आदमी की संघर्षपूर्ण जिंदगी के प्रति लेखक का लोकहितकारी नजरिया, इन्साफ और हक की लड़ाई में उसकी जनपक्षधरता, घटनाओं की तह तक पहुंचकर वास्तविक सच्चाइयों को खोजने की गहरी और प्रबल जिज्ञासा व इसके लिए लेखकीय ईमानदारी को प्रमुखता देते हुए अभिव्यक्ति का खतरा उठाना। यह महज एक जगह से दूसरी जगह का सफर तय करने और उसका रोचक ढंग से वर्णन करना ही नहीं है, बल्कि इससे भी ज्यादा आदमी से आदमी तक की यात्रा है। एक दिल से दूसरे दिल के जुड़ने को बयान करनेवाला यह बड़े मकसद का सफरनामा है।’’

पुस्तक का परिचय कराते हुए भूमिका में स्वयं सतनाम ने लिखा है, ’‘जंगलनामा’ जंगलों के बारे में कोई खोज पुस्तक नहीं है। न ही किसी कल्पना में से पैदा हुई, आधी हकीकत और आधा अफसाना बयान करने वाली कोई साहित्यिक कृति है। यह बस्तर के जंगलों में सक्रिय कम्युनिस्ट गुरिल्लों की रोजाना जिंदगी की एक तस्वीर और वहां के कबायली लोगों की जीवन-हालातों का विवरण है, जिसको मैंने अपनी जंगल यात्रा के दौरान देखा है। पाठक इसे किसी डायरी के पन्ने कह सकते हैं।’’

इसके पात्र हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान हैं, जो अपने सपनों को हकीकत में ढालना चाहते हैं। हुकूमत की तरफ से बागी और पाबंदीशुदा करार दिये गये ये पात्र नये युग, नयी जिंदगी को साकार होता देखना चाहते हैं। इतिहास उनके लिए क्या समेटे हुए है, ये तो आगे का इतिहास ही बतायेगा, लेकिन इतिहास को वो किस तरह मोड़ देना चाहते हैं, उसकी व्याख्या उन्हीं की जुबानी पेश की गयी है। अपने अकीदों के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार ये लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं, इसका अंदाजा पाठक इस किताब को पढ़कर आसानी से लगा सकते हैं।

बहरहाल, सतनाम के इस जंगलनामा में माओवादी विचार और उनकी कार्यनीतियों का संागोपांग वर्णन और विश्लेषण नहीं है। इस अर्थ में यह साहित्यिक कृति अधिक है और अरुंधति के ‘वाकिंग विद कामरेड्स’ से यहां इस अर्थ में फर्क देखा जा सकता है। अरुंधति का लेख पत्रकारिता के रिपोर्टिंग के दायरे में आता है। इसके बावजूद सतनाम का यात्रा वृंतांत इस मामले में महत्वपूर्ण है कि बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के सहज अनुभव के आधार पर वह आंदोलन के सकारात्मतक पक्ष को उद्घाटित करते समय आंदोलन की विसंगतियों के प्रति चश्मपोशी नहीं करता।

माओवादी आंदोलन आजादी से मोहभंग के साथ, हर प्रकार के शोषण के मुक्त, नयी दुनिया बनाने और गढ़ने का सपना पाले नौजवानों का एक पूरा का पूरा हुजूम 70 और 80 के दशक में भारतीय पटल पर सक्रिय हुआ था। लोकतांत्रिक समाजवादी (लोहियावादी) और साम्यवादी आंदोलन से निकली नक्सलबाड़ी धारा के युवक इसमें अगुवा भूमिका में थे। नौ प्रांतों में कांग्रेस की जगह कायम संयुक्त विधायक दल (संविद) सरकारों की असफलता और उग्रवामपंथ की नक्सलवादी धारा में दुस्साहसवादिता और अतिवामपंथी भटकाव के बाद, जेपी के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के आह्वान ने नयी संभावनाओं के द्वार खोले थे। लेकिन जनता पार्टी के गठन के साथ जेपी का संपूर्ण क्रांति और दल विहीन लोकतंत्र का सपना चकनाचूर हो गया। जनता द्वारा ठुकराये जा चुके दलों के जमघट के रूप में बनी जनता पार्टी के रूप में यथास्थितिवादी शक्तियां फिर काबिज हो गयीं। नतीजा हुआ कांग्रेस की वापसी और उसके बाद तीसरे मोर्चे के असफल प्रयोग और राजग और संप्रग के रूप में सत्ता का वर्तमान दौर।

80 के दशक के अंत आते-आते ही जेपी आंदोलन, समाजवादी, गांधीवादी सर्वाेदयी और नक्सलवादी आंदोलन से हताश युवकों की घर वापसी, उनका एनजीओ आदि के रूप में सीमित हो कर रह जाना यह एक प्रक्रिया रही है। नक्सलवादी आंदोलन को पुनगर्ठित करने का सिलसिला तीन मुख्य धाराओं में आज विभक्त है। एक धड़ा जिसमें लिबरेशन प्रमुख है, जो माकपानीत वामजनवादी मोर्चे की संसदीय राजनीति स्वीकार कर चुका है। दूसरा धड़ा, 90 के दशक के अंत तक माओवादियों के रूप में संगठित हो गया। तीसरी धारा के नक्सलवादी वे हैं जो कि संसदीय रास्ते की जगह सशस्त्र संघर्ष के रास्ते को अपनाने के बावजूद चुनावों के कार्यनीतिक प्रयोग और कानूनी व खुले संघर्षों की अहमियत को स्वीकार करते हैं। सतनाम का ‘जंगलनामा’ माओवादी सपनों और उनके त्याग और उद्देश्यों की रूमानियत में खो नहीं गया है। यह आंदोलन के ठहराव और विसंगतियों को भी सशक्त तरीके से उभारता है। आंदोलन के अंतर्संघर्ष भी यहां मौजूद हैं। तो पहाड़ और जंगल यानि की टेरीन यदि सशस्त्र संघर्ष के लिए रणनीतिक तौर पर अनुकूल हैं, तो मैदानी इलाकों में आंदोलन के फैलाव के अभाव में ये आंदोलन की सीमा भी हैं, इसे रेखांकित करते हुए जंगलनामा में पृष्ठ 43 पर माओवादी संगठक बंगाली कामरेड श्रीकांत कहता है, ‘‘आंदोलन को जंगल के बाहर और मैदानी इलाकों में फैलाना जरूरी है।’’ आदिवासियों की पशुवत जीवन परिस्थितियों और दमन के बीच विकास के मुद्दे को आंदोलन के फैलाव से श्रीकांत जोड़ता है। बस्तर के जन जीवन के बारे में ‘जंगलनामा’ के पृष्ठ 35 पर सतनाम से एक आदिवासी गुरिल्ला योद्धा कहता है, ‘‘आप जानना चाहते हैं हम यहां क्या खाते हैं? मछली, चावल, शिकार फल आदि लुभावनी चीजें लगती हैं। दूर से ऐसा लगता होगा कि जंगल की जिंदगी सबसे बढ़िया जिंदगी है।.. आप जब कैंप से बाहर निकलेंगे और गांव में घूमेंगे तो आपको बड़ी उम्र का कोई आदमी या औरत नहीं मिलेगा। हम मुश्किल से पचास तक पहुंच पाते हैं।.. मौत जन्म से ही हमारा पीछा करने लगती है। पचास तक पहुंचते-पहुंचते हमें दबोच लेती है।’’

प्रचार है कि बस्तर माओवादी प्रभावित इलाका है जहां उनका आधार क्षेत्र है। यहां सरकार या सत्ता के प्रतिष्ठानों का प्रवेश संभव नहीं है। इसके बावजूद गुरिल्ल्ला युद्ध की रणनीति में सशस्त्र संघर्ष के तीन तरह के इलाके होते हैं, ‘प्रतिरोध संघर्ष के इलाके’ जहां जनसंघर्ष प्रमुख है। यहां राजसत्ता का नहीं बल्कि जमीन पर कब्जा कर उसकी रक्षा के लिए सशस्त्र दस्तों का गठन कर अपना प्रभाव बनया जाता है और स्थानीय प्रतिक्रियावादी शक्तियों को दबाकर शक्ति संतुलन आंदोलन के पक्ष में परिवर्तित किया जाता है। दूसरा ‘गुरिल्ला इलाका’ जहां प्रतिरोध के लिए लड़ाकू दस्तों के अलावा हाथ में हथियार लिए दुश्मन पर प्रहार करने के लिए तैयार प्रशिक्षित नियमित गुरिल्ल छापामार योद्धा होते हैं। ऐसे क्षेत्रों को ‘गुरिल्ला जोन’ कहते हैं। यहां सत्ता और जनता के गुरिल्ला लड़ाकू दोनों का प्रभाव रहता है। शक्ति संतुलन की कवायद में मुठभेड़, घेराव, दमन तथा छापामार कार्यवाइयां चला करती हैं। तीसरा है जिसे आधार क्षेत्र कहते हैं। माओवादी सशस्त्र संघर्ष जिन इलाकों में है वे ‘गुरिल्ला जोन’ हैं, आधार इलाके नहीं हैं। वहां स्थानीय पुलिस पर जरूर वे हावी हैं परंतु अर्द्धसैन्य बलों से संघर्ष जारी है। आधार इलाके तो वे होते हैं जहां पुलिस या अर्द्ध सैन्य बल नहीं बल्कि नियमित सेना (फौज) और उसके मुकाबले जन सेना हो।

विकास के बारे में सतनाम ‘जंगलनामा’ में माओवादियों के बारे में लिखते हैं ‘‘वे शेखचिल्ली नहीं है, भले ही वे स्वप्नदर्शी हैं। जैसे कि जंगल की उपज की खपत जंगल में ही कैसे संभव बनायी जाये। यह एक महान स्वप्न है, आत्मनिर्भरता और अपनी उपज पर आधारित विकास का सपना। जैसा कि माओ के चीन में हुआ था।’’ वे सपनों को हकीकत में ढालने की योजनाएं बुन रहे हैं।

भारत में एक ओर संसदीय व्यवस्था और खुले काम के अवसर हैं, दूसरी ओर दलित उत्पीड़न, जिंदा जलाये जाने, महिलाओं के साथ बलात्कार और दलितों का सामूहिक जनसंहार, सांमती तत्वों और दबंगों की निरंकुशता है। कहीं इतने दुर्गम इलाके हैं कि पुलिस क्या सड़क तक नहीं हैं, दूसरी और गगनचुंबी शहर हैं। विशाल आबादी और विविधताओं से युक्त इस विशाल देश में संसदीय और गैर संसदीय संघर्षों के समन्वित विकास की समस्या, दुनिया की अब तक की क्रांतियों में अपने तरह की अलग समस्या है। सतनाम का ‘जंगलनामा- बस्तर के जंगलों में’ इन समस्याओं को भी पेश करता है। इसकी खूबी है पूर्वागृह रहित, सहज-सरल और स्वाभाविक शैली।

–प्रस्तुति कमल सिंह