रोहित वेमुला होने के मायने

-लता राय-

-लता राय-

-लता राय-हैदराबाद में दूसरे वर्ष के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के साथ दो सवाल हैं जो मुखर होकर सामने आते हैं। पहला सवाल यह है कि जो जातिगत भेदभाव गांवों में ज्यादा था वह आज शहरी मध्यवर्ग, सरकारी संस्थानों और शिक्षण संस्थाओं में अत्यंत तीव्रता से फैल रहा है। दूसरा सवाल है कि बहुसंख्यकवाद की राजनीति जिसका आधार सवर्णवाद है, दलितों पर अनुग्रह करने के लिए तो तैयार है, इस प्रकार नवब्राह्मणवाद जिसमें दलितों का सांस्कृतिकरण किया जाता है वैसे ही जैसे कि वे मुसलमानों के भारतीयकरण के पैरोकार हैं। वे दलितों को वर्णव्यवस्था पर टिकी व्यवस्था बदलने और इसके लिए व्यापक संघर्ष संगठित करने ही इजाजत देने के लिए तैयार नहीं हैं।

रोहित के आखिरी पत्र से स्पष्ट है कि उसकी जान ली है, जातिव्यवस्था के उस भयावह पिंजर ने जिस पर हमारी तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्था टिकी हुई है। इतना ही नहंी है। वह दलित मुद्दों तक ही सीमित नहीं था, व्यवस्था में दलितों के लिए स्थान से आगे बढ़कर समाज व्यवस्था के सवाल भी उसने उठाये। यही उसका ज्यादा बड़ा अपराघ बन गया। समाज के हाशिये पर रह रहे सभी वर्गों की लड़ाई लडऩे का अपराध! अल्पसंख्यकों, मजदूरों, औरतों, आदिवासियों, सबकी लड़ाइयों को जोड़ने का, उनमें अपनी आवाज उठाने का अपराध! अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) के एक सक्रिय छात्र नेता के तौर पर रोहित ने वर्तमान व्यवस्था को ही चुनौती दी थी।

एक दलित छात्र के अलगाव एवं विरक्ति के मूल में सवर्णाे की यही मानसिकता है कि उस दलित को हमेशा यह स्मरण कराया जाता है, कि उसकी उपस्थिति विश्वविद्यालय परिसर में सवर्ण हिन्दुओं द्वारा दी गयी रियायत के कारण है। विश्वविद्यालय परिसर का राजनीतिक वातावरण भी एक दलित छात्र के लिए सहयोगपूर्ण नहीं है। आज छात्र राजनीति काफी निम्न स्तर पर जा पहुंची है। हर प्रकार के चरमपंथी, कट्टरपंथी, दक्षिणपंथी, उग्रराष्ट्रवादी, बाहुबली एवं धनाढ्य, सभी छात्र राजनीति में प्रवेश कर गये हैं। इस कारण से असिष्णुता, हिंसा एवं जातीय संघर्ष इत्यादि की प्रतिदिन घटनाएं होती रहती हैं।

संस्थानों के अन्दर ऐसी आत्महत्या-हत्या के शिकार होने वाले छात्र ज्यादातर अकेले होते हैं, पर रोहित अकेला नहीं था। रोहित के पास उसके दोस्त थे, सहकर्मी और साथी थे- ऐसे साथी जिनके साथ साझा संघर्षों का लंबा इतिहास था। रोहित को 5 छात्रों के साथ हॉस्टल से निकाला गया था, पर जब वह निकला तो सिर्फ 5 छात्र नहीं, सैकड़ों छात्रों का एक हुजूम निकला था। उसके साथ उसके संघर्ष में शामिल होने, खुले आकाश में सोने, सुबह संघर्ष के गीत गाने, जुलूस निकालने। फिर मसला सिर्फ हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर का भी नहीं था। एएसए के साथी जब अपने कैंपस में निकलते थे तब उनकी साझीदारी में देश भर के तमाम छात्र अपने परिसरों में, अपने शहरों की सड़कों पर उतर आते थे।

ऐसे सशक्त प्रतिरोध आन्दोलन का हिस्सा होने के बावजूद, ऐसी साझीदारियों के बावजूद, रोहित को अपनी जान लेनी पड़ी, यही तथ्य इस आत्महत्या-हत्या को इससे पहले की घटनाओं से अलग करता है। इस आत्महत्या-हत्या को आने वाले खतरनाक कल की चेतावनी में बदल देता है।

अगर हम एक बार घटनाओं की उस कड़ी पर नजर दौड़ायें जो रोहित की आत्महत्या-हत्या का कारण बनीं तो शायद देख पायेंगें कि हमारे गणतंत्र के हाशिये पर जी रहे लोगों के लिए आने वाले दिन कैसे होने वाले हैं। इस मामले की शुरुआत अगस्त 2015 में एएसए द्वारा मोंटाज फिल्म सोसाइटी (दिल्ली यूनिवर्सिटी) पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) द्वारा किये गये हमले के खिलाफ यूनिवर्सिटी कैम्पस में विरोध प्रदर्शन के आयोजन से हुई थी। एबीवीपी के फिल्म सोसाइटी पर हमले का कारण था उनके द्वारा मुजफ्फरनगर दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ का प्रदर्शन। एबीवीपी का गुस्सा लाजमी था, यह फिल्म दंगों में हिंदुत्ववादी फसादियों की भूमिका को सामने लाती है। इसलिए एबीवीपी की हैदराबाद ईकाई हमले के विरोध से निश्चित तौर नाखुश थी और उनके एक नेता सुशील कुमार ने अपनी नाराजगी फेसबुक पर एएसए के साथियों को ‘गुंडा’ कहते हुए जतायी। एएसए समेत तमाम छात्रों के विरोध के बाद सुशील कुमार ने इस टिप्पणी पर लिखित माफी भी मांगी। फिर उसके बाद न जाने क्या हुआ कि अगली सुबह सुशील कुमार ने ये आरोप लगाया की एएसए के तकरीबन 30 सदस्यों ने उस के साथ मारपीट की है जिसकी वजह से उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। यूनिवर्सिटी के प्रोक्टोरिअल बोर्ड ने इन आरोपों की जांच की और तमाम अन्य सबूतों के साथ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर भी सुशील कुमार के आरोपों को बेबुनियाद पाया। बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, ‘सुशील कुमार के साथ मारपीट होने का कोई भी सबूत बोर्ड को नहीं मिला है, न ही श्री कृष्णा चैतन्या से और ना ही डॉ अनुपमा द्वारा दी गयी रिपोर्ट से। डॉ अनुपमा की रिपोर्ट के हिसाब से ‘श्री सुशील कुमार की सर्जरी का कोई सम्बन्ध किसी भी किस्म की मारपीट से नहीं है।’

जांच के इन नतीजों के बाद बोर्ड ने दोनों संगठनों को चेतावनी देकर मामले को खत्म करने का निर्णय लिया। इसके बाद परदे के पीछे फिर कुछ घटा जिससे बोर्ड ने अपनी आखिरी रिपोर्ट में एएसए के सदस्यों को सुशील कुमार को शारीरिक क्षति पहुंचाने का जिम्मेदार बताते हुए उसके साथ मारपीट करने के आरोप में रोहित समेत पांच छात्रों को निलंबित करने का आदेश दिया। एएसए ने स्वाभाविक ही इस निलंबन का विरोध किया और तत्कालीन वाईस चांसलर प्रो आर पी शर्मा के साथ जांच प्रक्रिया, तथ्यों और निर्णय के बीच असंगतियों पर बातचीत की। इस बातचीत के मद्देनजर प्रो शर्मा ने भी माना कि एएसए के साथ न्याय नहीं हुआ है और निलंबन का आदेश खारिज करते हुए पूरे मसले की फिर से और निष्पक्ष के लिए एक नयी जांच समिति के गठन का आदेश भी दिया।

वीसी शर्मा के विश्वविद्यालय छोड़ते ही मामले का रुख बदलना शुरू हो गया। नये कुलपति प्रो पी अप्पाराव ने किसी जांच समिति का गठन नहीं किया और एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा पांचों छात्रों के निलंबन और छात्रावास से उनके निष्कासन का निर्णय ले लेने तक अंधेरे में रखा। ऐसा क्यों हुआ इसके सूत्र केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के मामले में कूदने और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को चिट्ठी लिखने में खुलते हैं।

दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिखी अपनी चिट्ठी में उससे हैदराबाद विश्वविद्यालय में एएसए जैसे ‘जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी’ संगठनों से मुक्त करने का अनुरोध किया था। उनके इन आरोपों का मुख्य कारण था संगठन द्वारा याकूब मेमन की फांसी की सजा के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करना। शायद उन्हें अंदाजा भी न हो कि यह कारण आनंद ग्रोवर, प्रशांत भूषण, इंदिरा जयसिंह, युग चौधरी, नित्या रामकृष्णन, वृंदा ग्रोवर जैसे देश के जानेमाने वकीलों को भी देशद्रोही बना देता है क्योंकि उन्होंने भी इस सजा का विरोध किया था। यह कारण शायद सर्वाेच्च न्यायालय को भी देशद्रोही ठहरा दे क्योंकि उसने इन लोगों के विरोध का संज्ञान लेते हुए ऐतिहासिक तरीके से सुबह 5 बजे मामले की सुनवाई की थी।
सवाल उठता है कि एक केंद्रीय मंत्री को एक विश्वविद्यालय के मामले में दखल देने की जरूरत क्यूं हुई। वह भी ऐसे ‘छोटे’ से मामले में, जबकि ऐसे अनेक मामले देश भर के संस्थानों में होते ही रहते हैं? क्या मंत्री महोदय रोहित और एएसए द्वारा हाशिये पर रहने वाले सभी शोषित समुदायों के संघर्षों को एक साथ जोड़ने की कोशिशों से परेशान थे? शायद हां, क्यूंकि दलितों का, अल्पसंख्यकों की लड़ाई में साथ देना उस राजनैतिक-वैचारिक फंतासी की जड़ों में मट्ठा डाल देगा जिसके बल पर वे अभी सत्ता में हैं।.

यही नुक्ता है जो रोहित की आत्महत्या-हत्या को ऐसी तमाम आत्महत्यायों से बिलकुल अलग कर देता है और देश के किसी भी विवेकशील नागरिक को इस बात से डरना चाहिए। अतीत में हुई दलित छात्र आत्महत्याओं-हत्याओं के जिम्मेदारों को, कुटिल जातीय ताकतों को साफ-साफ पहचाना जा सकता था। उन्हें सजा दिलायी जा सकती थी क्यंूकि जातिवाद चाहे व्यवस्था में कितनी भी गहरायी तक रचा-बसा हो पर इसको ऐसे डंके की चोट पर अमल में लाना इतना आसान भी नहीं था। तब दलित छात्रों को प्रताड़ित करने की घटनाएं ज्यादातर किसी एक व्यक्ति की शुरू की हुई होती थीं भले ही व्यवस्था उनको बाद में बचाने में लग जाये। मगर इतनी बेशर्मी के साथ जातिवाद का अभ्यास इससे पहले नहीं देखा गया। पहले कभी नहीं देखा गया कि एक केंद्रीय मंत्री सामाजिक न्याय की मांग करती हुई आवाजों को खामोश करने के लिए उन आवाजों को देशद्रोही करार करना शुरू कर दे और दूसरा केंद्रीय मंत्री का उसका साथ देना। क्यूंकि वो आवाजें अब तक तमाम जगहों में, खांचों में बिखरी दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी पुरुष स्त्री आदि को संगठित करने की कोशिश कर रही हैं।

रोहित की आखिरी चिट्ठी इस देश के जनतंत्र के खिलाफ आरोपपत्र है, हलफनामा है। उस जनतंत्र के खिलाफ जो अरसे से अपने कमजोर लोगों को ठगता रहा था और जिसने अब उन्हें न्याय दिलाने के लिए तैयार होने का स्वांग रचाना तक भी त्याग दिया है।

इंसानों को इंसान नहीं रहने देकर उन्हें अलग-अलग खांचों में बैठा देना, रोहित ने अपनी सारी जिंदगी इसी के खिलाफ लडऩे में लगा दी। इसी के लिए उसने शायद अपनी जान भी दे दी। इंसानों को खांचों में कैद करने के खिलाफ आखिरी प्रतिरोध के बतौर, उन्हें ललकारते हुए कि शरीर ही न रहा तो क्या कैद करोगे?

रोहित का शरीर, एक दलित के शरीर के तौर पर, यूं भी हमेशा से ही संघर्ष की जमीन बनता आया है। रोहित ने इस बार फिर अपने शरीर को एक और संघर्ष की जमीन में बदल दिया- उस संघर्ष के जो सदियों की गुलामी को चुनौती दे रही ताकतों और सड़ांध मारती जातिव्यवस्था के नये सत्ताधारी अलंबरदारों के विरोध में होना है।
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1920 के दशक में सिर्फ चार प्रतिशत सवर्ण हिन्दुओं का भारत की उच्च शिक्षा पर एक छत्र राज था, लेकिन अब उन्हें दलित एवं शोषित वर्ग के छात्रों के साथ विश्व विद्यालयों में उच्च शिक्षा हेतु सहपाठी बनना पड़ता है। भारत की 1931 की जनगणना के अनुसार अविभाजित भारत की कुल जनसंख्या का 68.2 प्रतिशत हिन्दू थे। उसमें से 21.1 प्रतिशत दलित एवं शोषित वर्गों से आते थे, जिन्हे आज अनुसूचित जाति एवं जनजाति भी कहा गया।
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रोहित के ‘सुसाइड नोट’ से

‘इंसान की कीमत
कितनी कम लगायी जाती है
एक छोटी सी पहचान दी जाती है
फिर जिसका जितना काम निकल आये,
कभी एक वोट,
कभी एक आंकड़ा,
कभी एक खोखली सी चीज
कभी माना ही नहीं जाता कि इंसान
आखिर एक जीवंत मन है
एक अद्भुत सी चीज है
जिसे तारों की धूल से गढ़ा गया है
चाहे किताबों में देख लो, चाहे सडक़ों पर,
चाहे उसे लड़ते हुए देख लो,
चाहे जीते-मरते हुए देख लो’