एक फौजी का इकबालिया बयान

Blood on my hands-1
‘मेरे हाथ ख़ून से रंगे हैं‘ एक गुमनाम फौजी अफसर का इकबालिया बयान है जिसे कलमबद्ध किया है लेखक और पत्रकार किश्लय भट्टाचार्य ने। किश्लय ने सवाल खड़ा किया है कि जहां शासकीय हिंसा के चलते मानवीय अधिकारों का हनन होता है, एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था की कल्पना ही कैसे की जा सकती है। सर्वप्रतिष्ठित भारतीय सेना की फर्जी एनकाउंटर सम्बन्धी कड़वी सच्चाई का सेना के ही एक अफसर खुलासा किया है।
इस खुलासे से सेना की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े हो गये हैं। इसमें बताया गया है कि सेना में तरक्की और सम्मान पाने के लिए कुछ प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। अफसरों के इसे पाने के लिए विशेष अंक अर्जित करने पड़ते हैं। उक्त इकबालिया बयान के आधार पर किश्लय का कहना है कि सेना के अधिकारी अंकों को अर्जित करने के दबाव में अपराध माफियाओं से ऐसे निर्दोष लोगों का सौदा करती है जिनका एनकाउंटर किया जा सके। यह इकबालिया बयान खास तौर पर उत्तरपूर्व भारत के बारे में है, लेकिन हम अगर पिछले वर्षों में हुए शेष भारत में फौजों द्वारा किये एनकाउंटरों का अध्ययन करें तो पता लगेगा कि शायद सभी जगह यही सच्चाई है।

Blood on my handsपुस्तक के एक इकबालिया के अनुसार, ‘‘एक एनकाउंटर में मारे गये एक व्यक्ति के लिए अफसर को पांच अंक मिलते है। कुल तीन सौ अंकों की आवश्यकता होती है। इस मामले में दस अंक कम पड़ रहे थे। फौज ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की सहायता से ऐसे दो बांग्लादेशियों को मार डाला जो वापिस लौट रहे थे।’’
पुस्तक के एक अध्याय में खुलासा किया गया है कि सेना के सर्वोच्च पद की होड़ में भी ऐसे फर्जी एनकाउंटरों से प्राप्त अंकों की भूमिका होती है। ऐसे खुलासों के कारण ही यह पुस्तक पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हो रही है। वहां की सच्चाई भी तो यही है।

किश्लय आसाम में जन्मे, पले और बड़े हुए। उन्होंने कई वर्षों तक उत्तर पूर्व के माओवादियों के इलाकों में रिपोर्टिंग की है। शायद यही कारण है कि वे पुलिस, फौज और आतंकियों से कोई सहानभूति नहीं रखते।
किश्लय का कहना है कि जब भी ऐसे एनकाउंटर होते थे, हम पर दबाव बनाया जाता था कि हम सच्चाई की बजाय सरकारी बयान ही छापें। इसलिए शेष भारत को कभी भी सही सूचना नहीं मिल पाती थी। किश्लय का मानना है कि भारतीय राज्य की स्थापना हिंसा से ही हुई है। यहां हिंसा का संस्थागत रूप सामने आता है। ज्यादातर मामलों में केस बनता है और बंद कर दिया जाता है। सजा किसी को नहीं मिलती।

जब भारतीय संघ की स्थापना हुई थी तो सरकार ने फौजों के बल पर ही स्वतंत्र राज्यों को संघ में मिलाया। आर्म्ड फोर्सेस स्पेशियल प्रोटेक्शन एक्ट एक आपातकालीन व्यवस्था है जिसे देश के कई हिस्सों में पिछले 58 वर्षों से लागू किया हुआ। एक प्रजातांत्रिक देश में कैसे एक ऐसा कानून पिछले छः दशकों लागू है जो सिर्फ और सिर्फ आपात काल के लिए है। देश में ऐसे ही करीब 10-12 और भी कानून लागू हैं जो मानवीय अधिकारों का हनन करते हैं।

ऐसी ही एक स्थिति में अपराध माफिया ने एक निर्दोष व्यक्ति की सेना को ‘आपूर्ति’ की जिसे रेलवे स्टेशन से उठाकर मार डाला गया। किश्लय लिखते हैं कि ‘‘ऐसे तथ्यों को सुनकर मैं हैरान और व्यथित हो गया।’’
द्वितीय महायुद्ध के अंतिम दिनों में जब जूलियस रोबर्टो ओपनहेमर ने परमाणु बम के प्रयोग के बाद अमरीका के राष्ट्रपति हेनरी टूªमेन से भेंट की थी तब कहा था, ‘‘राष्ट्रपति महोदय मेरे हाथ खून से रंगे है।’’ सम्भवतया उसीसे प्ररित होकर किश्लय ने एक फौजी अफसर के इकबालिया बयान पर आधारित पुस्तक का नाम ‘‘ब्लड ऑन माय हैंड्स’’ रखा।

किश्लय का कहना है कि पहले तो यह खयाल आया कि इन तथ्यों को उजागर करने से देश के सुरक्षा बलों का मनोबल गिरेगा। सेना की बदनामी होगी। लेकिन कई उच्चस्थ अफसरों, जिनमें सेना के अफसर भी शामिल थे, का कहना था कि सेना से इस गंदगी को साफ करना भी जरूरी है।

दरअसल मानव अधिकार समूहों, अदालतों और विभिन्न जांच कमीशनों ने इस बात पर जोर दिया है कि भारतीय फौजों ने कई बार अपने कर्तव्यों के निबाह के लिए बर्बर तरीकों का प्रयोग किया है। यद्यपि समाचार पत्र और आमजनों में सिर्फ आर्म्ड फोर्सेस स्पेशियल प्रोटेक्शन एक्ट के बारे में चर्चा होकर रह जाती है। यह सही कि इस कानून के तहत सेना को कई आपत्तिजनक अधिकार हैं लेकिन इसके अलावा भी कई ऐसे तथ्य हैं जो इस पुस्तक के माध्यम से सम्भवतया पहली बार सामने आये हैं। इस दृष्टिकोण से किश्लय भट्टाचार्य की पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। यह पहली पुस्तक है जिसमें आसाम और मणिपुर में सेवारत फौजी अफसर ने विस्तार में फौजों की कार्यप्रणाली को बताया है। यद्यपि किश्लय ने उस अधिकारी का नाम उजागर नहीं किया है लेकिन वर्णनों से यह स्पष्ट लगता है कि वह निश्चय ही कर्नल स्तर का ऐसा अधिकारी रहा होगा जिसने अपनी बटालियन का उस क्षेत्र में नेतृत्व किया होगा।

उसके बयानों के अनुसार तीन तरीकों के एनकाउंटर होते हैं। एक जो वास्तव में होता है, जिसमें फौजों और मिलिटेंटों के बीच मुठभेड़ होती है। दूसरा जो फर्जी होता है जिसमें वास्तविक मिलिटेंट को पहले हिरासत में ले लिया जाता है फिर एक फर्जी मुठभेड़ कर मार दिया जाता है। और तीसरा जिसमें किसी निर्दोष को मार कर उसे मिलिटेंट बता दिया जाता है। बाद के दोनों तरीके निश्चय ही हत्या की श्रेणी में आते हैं। लेकिन सम्भवतया आमजन को पहले दोनों तरीकों पर इतना गुस्सा नहीं आयेगा लेकिन तीसरा तरीका अवश्य ही उद्वेलित कर देता है। जैसा कि ऊपर कह आये हैं, फौजों में अपने यूनिट के लिए या व्यक्तिगत सम्मान पाने के मोह में तीसरा तरीका अपनाया जाता है। जब जब भी मिलिटेंसी की घटनाओं में गिरावट आती है सेनाओं के सामने चुनौती आ जाती है। दिखाने और करने के लिए कुछ नहीं होता। वरिष्ठ अधिकारियों के दौरों में एक ही सवाल पूछा जाता है, ‘‘पिछले दो माह में कितने मारे?’’ यह कश्मीर में सन 2000 के बाद हुआ भी है।

इस पुस्तक में फौजी अधिकारी के इकबालिया बयान के आधार पर किश्लय ने फौजों की विचित्र आर्थिक प्रक्रिया को उजागर किया है। फर्जी एनकाउंटर में निर्दोष लोग और हथियार प्राप्त करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। यह धन फौज की स्थानीय यूनिट को उन लोगों से मिलता है जो सीमा पर लकड़ी या नशीले पदार्थों का व्यापार करते हैं। इस वर्णन में कुछ अतिश्योक्ति लगती है लेकिन उक्त फौजी के इकबालिया के अनुसार कश्मीर में यह स्थिति इतनी महसूस नहीं होती है जितनी कि आसाम में जहां पूरी राजनैतिक व्यवस्था, पुलिस और फौजें बिना किसी रोक टोक के काम करते हैं।

किश्लय ने एक अनन्ता कालिता का जिक्र किया है जिसे ऐसे ही एक एनकाउंटर में सिर में गोली मार कर पहाड़ी से नीचे धकेल दिया गया। गोली उसके जबड़े को चीरती निकल गयी और वह अपनी कथा कहने के लिए जिन्दा बच गया। पुस्तक में ऐसे ही कई दूसरे तथ्य भी उजागर किये गये हैं।

एक अध्याय में किश्लय ने सेना प्रमुखों के उत्तराधिकार को लेकर वर्णन किया है। यद्यपि किसी का नाम नहीं लिया गया लेकिन सेना को जानने वाले लोग अंदाजा लगा सकते हैं कि किनका जिक्र्र किया गया है। एक सेना प्रमुख जो बाद में अरुणाचल में राज्यपाल बनकर गये उनकी यूनिट के खुफिया विभाग के जवान डाके के मामले में लिप्त पाये गये थे। एक जनरल जो उत्तरी कमाण्ड का नेतृत्व कर रहे थे उनकी ही यूनिट के दो भाइयों ने उनके लिए किसी महिला का बन्दोबस्त किया था।

कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे कृत्य अलगाववादियों, आतंकवादियों और अतिवादियों की कार्यवाइयों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे एनकाउंटर तभी किये जाते हैं जब स्थितियां आम तौर पर काबू में और सामान्य होती हैं और सेनाओं को अपनी बैरकों में लौटना होता है। मिलिटेंटों की फिर से सक्रिय ना हो जायें और स्थानीय प्रशासन में ऐसी स्थिति सम्भालने की क्षमता कम हो, इस भय से सरकार फौजों को आर्म्ड फोर्सेस स्पेशियल प्रोटेक्शन एक्ट के अधिकारों के साथ वहां तैनात रखती है। आवश्यक यह है कि स्थितियां सामान्य होने या आतंकवादियों के हमले कमजोर पड़ने पर सरकार फौजों को बैरक में भेज दे और स्थानीय प्रशासन को कानून व्यवस्था सौंप दे। मिजोरम और त्रिपुरा में ऐसा किया गया था। पंजाब में सेनाओं को दूर रखा गया था और राज्य की पुलिस ने ही सिख खाड़कुओं से लोहा लिया था।

इस पुस्तक में शामिल तथ्यों को शायद कभी किसी अदालत में साबित ना किया जा सके लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सच्चाई नहीं। सरकार और फौजों में ऐसी कोई जागृति आये जिससे फर्जी एनकाउंटरों में कमी आये तो इस पुस्तक की सार्थकता स्थापित होगी। किश्लय की यह रचना भारत के सामने आतंकवाद की चुनौतियों और उनसे निपटने के तरीकों को समझने में सहायक हो सकती है।

पिछले दिनों श्रीनगर में कश्मीर सामाजिक और विकास अध्ययन केन्द्र के सदस्य इस पुस्तक की समीक्षा के लिए एकत्र हुए। केन्द्र की अध्यक्षा हमीदा नईम ने बताया कि इस पुस्तक पर विशेष चर्चा इसलिए रखी गयी कि, ‘‘फौजों के बारे में जो कुछ हम अब तक कहते रहे हैं, यह पुस्तक उन सब बातों की ताईद करती है।’’
हमीदा का कहना था कि, ‘‘कश्मीर में आम नागरिकों के साथ जो अत्याचार होते रहे हैं, उनके बारे में सरकार ही नहीं देश के आम नागरिक का भी यह खयाल है कि हम झूठ बोल रहे हैं। देश के नागरिकों को असलियत बतायी ही नहीं जाती। कश्मीर की जमीनी सच्चाई यही है कि ये एनकाउंटर सरकार की ओर से किये गये संस्थागत कत्ल हैं जो फौजों द्वारा तरक्कियों, चक्रों और ऊंचे पदों के लिए होते हैं।

पुस्तक परिचय
ब्लड ऑन माय हैंड्सः कंफेशन्स ऑफ स्टेज्ड एनकाउंटर्स
लेखकः किश्लय भट्टाचार्य
प्रकाशकः हार्पर कॉलिन्स
पृष्ठ संख्याः 210
कीमतः रु. 250