क्यों उबल रहा है कश्मीर? ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

-प्रकाश चतुर्वेदी-

-प्रकाश चतुर्वेदी-

कश्मीर के इतिहास को जाने बगैर शायद हम कश्मीर की समस्या को नहीं समझ सकते। अब तक हम पाकिस्तान, फौज, आतंकवाद और युद्ध के जरिये ही कश्मीर की जानने की कोशीश करते रहे हैं। यह इतना आसान नहीं है। कश्मीर की सांझी संस्कृति को समझना भी उतना ही आवश्यक है। कश्मीरियत को समझना जरूरी है। इसके लिए पहले उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृश्ठभूमि को जानना होगा। प्रस्तुत लेख में प्रकाश चतुर्वेदी इतिहास के पन्नों से कश्मीरियत को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। लेखक का मानना है कि इतना ही काफी नहीं होगा। पाकिस्तान से युद्ध या महज आतंकवादियों को सीमापार से आने से रोकने की जगह हमें कश्मीरियों के दिल जीतने होंगे, जो पिछली पूरी शताब्दी में छलनी हुआ है। दृसम्पादक

हमारे देश के हर राज्य का अपना राजनीतिक अतीेत है और इस अतीत का वर्तमान से स्थायी रिश्ता है। जम्मू और कश्मीर के वर्तमान उबाल का स्त्रोत उसके अतीत की पहचान में छिपा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1857 में गदर के दौरान जब रियासती शासकों ने अपनी गद्दी बचाने के लिए रियासत को भारत बनाकर जनमानस को साथ लिया था तब भी कश्मीरी जनता जम्मू-कश्मीर रियासत के डोगरा राजवंश के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी । यानी कश्मीरियत बचाने के लिए कश्मीर की जनता अंग्रजों के साथ-साथ डोगरा शासकों के खिलाफ भी खड़ी थी।

सन् 1947 से पहले जिस जम्मू और कश्मीर रियासत का जिक्र आता है वह भारतीय उप महादीप का एक वृहतर क्षेत्र था। आज वह दो हिस्सों में विभाजित है। जिसे हम जम्मू और कश्मीर कहते है उसे ही पाकिस्तान ‘‘भारत अधिग्रहित कश्मीर’’कहता है और जिसे हम पाक के कब्जे वाला कश्मीर कहते है उसे पाकिस्तान ‘आजाद कश्मीर’ कहता है। भारतीय जम्मू-कश्मीर के तीन डिवीजन है। छह जिलों को मिलाकर जम्मू डिवीजन और इतने ही जिलों को मिलाकर कश्मीर डिवीजन बना जबकि लद्दाख डिवीजन में कुल दो जिले हैं। ठीक इसी तरह पाकिस्तानी कश्मीर के भी तीन डिवीजन हैं। मीरपुर डिवीजन में तीन और मुजफ्फराबाद डिवीजन में दो जिले हैं। बिल्कुल उत्तर में स्थित गिलगिट भी पाक अधिग्रहित कश्मीर का ही एक हिस्सा है। लेकिन पाकिस्तान ने उसे अपनी केन्द्र सरकार के प्रशासनिक दायरे में रखा है।

जब हमें आजादी मिली तब जम्मू कश्मीर रियासत की बागडोर हिन्दू महाराजा हरि सिंह के हाथ में थी। यदि वह चाहते तो अन्य रियासतों की तरह अपनी रियासत का भी भारत में विलय कर देते और वर्तमान समस्याओं का बड़ा हिस्सा हल हो जाता लेकिन उन्हें अपनी राजशाही पसंद थी इसलिए वह जम्मू कश्मीर को एक स्वतंत्र राश्ट्र राज्य के बतौर रखने के अपने विचार पर अड़े रहे। विलय की बात उन्हें तब समझ में आयी जब कश्मीर की घाटी उनके हाथ से निकल कर पाकिस्तान के कब्जे में पहुंचने की आशंकाओं से घिर गयी।

दिलचस्प एवं गौर तलब तथ्य यह है कि जिन शेख अब्दुल्ला को संकीर्ण मनःस्थिति के लोग भारत विरोधी राश्ट्रद्रोही और पाकपरस्त करार देते रहे है वही शेख अब्दुल्ला उस वक्त भारत विलय के पक्ष में थे। इस मामले में शेख ने जिन्ना की नहीं सुनी और जिन्ना का समर्थन करने वाली कश्मीर में सक्रिय ‘‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ के समानान्तर ‘नेशनल कांफ्रेंस’ का परचम बनाये रखा।

अंततः कश्मीर का भारत में विलय हो गया। महाराजा हरि सिंह ने 4 मार्च 1948 को शेख अब्दुला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया। इस बीच महाराजा और शेख के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया। एक वर्श चले इस विवाद में महाराजा को रियासत की बागडोर छोड़नी पड़ी। 9 जून 1949 को महाराजा ने अपने पुत्र कर्ण सिंह को अपने सारे अधिकार दे दिये। विवादों को निपटाने के लिए भारत सरकार ने राज्य को भारतीय संविधान की धारा 370 के साथ विशेश दर्जा दिया।

इस राज्य के लिये अपना संविधान भी बनना था लिहाजा युवराज कर्ण सिंह ने 1 मई 1951 को एक उद्घोशणा जारी कर संविधान निर्मात्री सभा की स्थापना की। इस उद्घोशणा के तहत चालीस हजार की जनसंख्या का एक चुनावी जिला बना। हर जिले से संविधान सभा के लिए प्रतिनिधि चुने गये। अक्टूबर,1951 के मध्य चुनाव हुए। सभी 75 सीटें शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस ने जीत ली। इनमें 73 पर निर्विरोध दो चुनाव जीत कर आयी। हिन्दूवादी संगठन जम्मू प्रजा परिशद ने इन चुनावों का बहिश्कार किया। उसका नारा था- ‘एक देश में दो विधान, एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान नहीं चलेंगे ,नहीं चलेंगे।’ बहरहाल कश्मीर का यह पहला चुनाव था जिसमें चुने हुए प्रतिनिधियांे का काम प्रशासन करना नहीं बल्कि राज्य का संविधान निर्मित करना था। इस संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष मौलाना मसूदी बने थे।

इस चुनाव ने यह साबित कर दिया था कि कश्मीर की बहुसंख्यक जनता शेख अब्दुल्ला के साथ है। शेख का दबदबा बढ़ा। दिल्ली- समझौते में इसे स्पश्टतः देखा जा सकता है। इस समझौते के बाद कश्मीर में पैतृक राजतंत्र की समाप्ति हो गयी। 21 अगस्त, 1952 को एक औपचारिक प्रस्ताव के जरिये राज्याध्यक्ष को ‘सदरे रियासत ’की पदवी दी गयी। कर्ण सिंह पहले सदरे रियासत बने।

कश्मीर के लिए विशेश राज्य का दर्जा हासिल कर लेने के बाद शेख अब्दुल्ला ने उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया। राज्य की सम्प्रभुता का यह स्वरूप न कर्ण सिंह को जंचा और न ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को। हिन्दुवादी संगठनों नेे शेख के खिलाफ जम्मू प्रजा परिशद के नेतृत्व में आंदोलन भी प्रारम्भ कर दिया। जनसंघ के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी आंदोलन में शरीक होने के लिए जम्मू गये लेकिन शेख ने 11 मई,1953 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। संयोग एवं दुर्भाग्य से 23 जून,1953 को पुलिस हिरासत में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु हो गयी। बदले हुए वातावरण में 9 अगस्त,1953 को कर्ण सिंह ने शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर गिरफ्तार कर लिया। शेख अब्दुल्ला के विरोधी और उन्हीं के मंत्रिमण्डलीय सहयोगी बख्शी गुलाम मोहम्मद को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।

सन् 1953 से1968 के बीच शेख अब्दुल्ला अधिकांश समय जेल में ही रहे। उन्हें गिरफ्तार और रिहा करने का सिलसिला 15 वर्शाे तक जारी रहा। सन् 1953 की गिरफ्तारी के बाद वह 8 जनवरी,1958 को रिहा हुए और फिर 30 अप्रेल 1958 को गिरफ्तार कर लिये गये। 6 अप्रेल,1964 को वह फिर छूटे और 8 मई,1965 को उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया । वर्श 1971 में तो उन्हें जम्मू-कश्मीर से निश्कासित ही कर दिया गया।

गौरतलब है कि शेख की अनुपस्थिति के चलते जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस की बागडोर बख्शी गुलाम मोहम्मद के पास रही। शेख अब्दुल्ला के एक करीबी सहयोगी मिर्जा अफजल बेग ने बख्शी गुलाम मोहम्मद की नेशनल कांफ्रेंस को भारत सरकार की पिट्ठू बताते हुए , उसके समानान्तर 9 अगस्त, 1955 को ‘जनमत संग्रह मोर्चा’ की स्थापना की। शेख अब्दुल्ला की तरह मिर्जा भी अधिकांश समय जेल में ही रहे।

इस बीच 17 नवम्बर,1956 को जम्मू-कश्मीर का संविधान स्वीकार कर लिया गया। इस संविधान में जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया, जिसका बदले हुए हालात में शेख अब्दुल्ला ने जेल से ही विरोध किया। बहरहाल नये संविधान के तहत 1957 में जम्मू-कश्मीर विधान सभा का पहला चुनाव हुआ। इस चुनाव में बख्शी गुलाम मोहम्मद की नेशनल कांफ्रेंस की जीत हुई लेकिन कश्मीर की कुल 75 में से मात्र 32 पर ही चुनाव हुए। बाकी 43 सीटों पर चुनाव नहीं हुए। कश्मीर घाटी की इन सीटों पर सभी प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो गये। सन् 1962 के विधानसभा चुनावों में सन् 1957 को ही दोहराया गया इस चुनाव में भी जीत बख्शी गुलाम मोहम्मद की नेशनल कांफ्रेंस की ही हुई । उन्हें 75 में से 70 सीटों पर विजय मिली लेकिन इस बार भी मुकाबला मात्र 41 सीटों पर हुए। बाकी की 34 सीटों के प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो गये।

सन् 1957-62 के बीच बख्शी गुलाम मोहम्मद की छवि काफी गिरी। उन पर भ्रश्टाचार और भाई-भतीजावाद के कई आरोप लगे। उनके ही एक सहयोगी गुलाम मोहम्मद सादिक ने तो विद्रोह कर 1957 में ही ‘डेमोक्रेटिक नेशनल कांफ्रेंस’ नाम की एक नयी पार्टी बना ली थी। इन सब आरोपों के चलते बख्शी गुलाम मोहम्मद को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन अपनी जगह अपने समर्थक ख्वाजा शमशुद्दीन को प्रधानमंत्री बनवाने में सफल रहे। 14 अक्टूबर, 1963 को शमशुद्दीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने और कुछ ही दिनों बाद यानी 27 दिसम्बर, 1963 को एक घटना घटी जिसने शमशुद्दीन की कुर्सी हिला दी। कश्मीर के हजरत मकबरे से पैगम्बर मोहम्मद के ‘मोये-ये-मुकद्दस’ (पवित्र बाल) के गायब हो जाने की घटना ने समूचे कश्मीर को उद्वेलित कर दिया। चार जनवरी ,1964 को उक्त बाल मकबरे में वापस रख दिये गये थे लेकिन शमशुद्दीन को सत्ता से अलग होना पड़ा। नतीजतन 29 फरवरी, 1964 को गुलाम मोहम्मद सादिक जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने ।

परिवर्तनों के इस दौर में 30 मई, 1965 से जम्मू-कश्मीर के संविधान में एक संशोधन के जरिये ‘प्रधान मंत्री’ और ‘सदरे रियासत’ की पदवी बदल कर क्रमशः ‘मुख्यमंत्री’ और ‘राज्यपाल’ कर दी गयी। सन् 1967 में जम्मू-कश्मीर विधान सभा के चुनाव हुए। इसमें भी 1957 और 1962 की तरह कश्मीरियों के जेहन में कई तरह की आशंकाएं पैदा की। इस चुनाव में 118 प्रत्याशियों का नामांकन रद्द कर दिया गया, जिसके चलते कई जगह मात्र एक ही प्रत्याशी चुनाव मैदान में रह गया। इस चुनाव में भी 75 में से 39 विधायक निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। गुलाम मोहम्मद सादिक अब कांग्रेस में थे। जीत कांग्रेस की हुई और सादिक मुख्यमंत्री बने। 12 दिसम्बर 71 को उनकी मृत्यु हो गयी और कांग्रेस ने मीर कासिम को मुख्यमंत्री बनाया।

सन् 1971 में लोकसभा और 1972 में जम्मू-कश्मीर विधान सभा के लिए फिर चुनाव होने थे। यह वह समय था जब भारत सरकार और शेख अब्दुल्ला में ठनी हुई थी। भारत सरकार चाहती तो इन चुनावों को निश्पक्ष करा कर वास्तविक प्रतिनिधियों के जरिये कश्मीर में लोकतंत्र की पवित्र शक्ल स्थापित कर सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शेख अब्दुल्ला और अफजल बेग का ‘जनमत संग्रह मोर्चा’ इन चुनावों में उतरने का फैसला कर चुका था। लोकसभा चुनावों तैयारी के सिलसिले में 8 जनवरी,1971 को शेख अब्दुल्ला श्रीनगर पहुंचने वाले थे। दिल्ली के जिस विमान से उन्हें श्रीनगर जाना था उस विमान को रद्द कर दिया गया और अगले दिन शेख और बेग के लिए एक आदेश जारी कर दिया गया कि वे दोनों जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते। उनके संगठन ‘जनमत संग्रह मोर्चा’ को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। पूरे प्रकरण पर भारत सरकार का तर्क था कि यदि शेख अब्दुल्ला का मोर्चा इन चुनावों में जीत गया तो कश्मीर को भारत से अलग करने की मांग उठ सकती है। बहरहाल 1972 में विधान सभा चुनाव हुए और 75 में से 57 सीटें जीतकर कांग्रेस की सरकार बन गयी। मीर कासिम मुख्यमंत्री हुए । इन चुनावों में ‘जमाते इस्लामी’ की भी पांच सीटों पर जीत हुई। आरोप है कि शेख अब्दुल्ला को अलग-थलग करने के लिए कांग्रेस ने इस कट्टर मुस्लिम संगठन को बढ़ावा दिया था।

सन् 1971 में भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय और एक राश्ट्र के तौर पर बंाग्लादेश के निर्माण का कश्मीर के मानस पर भी गहरा प्रभाव पड़ा । शेख अब्दुल्ला ने विकल्पों की असलियत को पहचाना। तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को भी कश्मीर समाधान के लिए शेख अब्दुल्ला जैसे प्रभावी नेता की जरूरत महसूस हुई। नतीजतन 24 फरवरी, 1974 को श्रीमती इन्दिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला ने ‘कश्मीर सहमति’ नाम के समझोैते पर दस्तखत किये। समझौते के परिणामस्वरूप मुुख्यमंत्री मीर कासिम ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया और 25 फरवरी 1971 को शेख अब्दुल्ला कांग्रेस के समर्थन से जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। शेख अब्दुल्ला की लोक प्रियता में देश में किसी को शक नही है लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें पहली बार महाराजा हरि सिंह के रियासती काल में सन् 1948 में प्रधानमंत्री बनाया और लम्बी तकरार के 25 साल बाद कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री बने।

श्रीमती गांधी और शेख अब्दुल्ला का दोस्ताना ज्यादा दिन नहीं चला। श्रीमती गांधी उन्हें कांग्रेस में शामिल करना चाहती थी जो शेख अब्दुल्ला को मंजूर नहीं था। उन्होंने 13 अप्रेल, 1975 को नेशनल कांफ्रेंस पुनर्जीवित किया और उसके अध्यक्ष बने। फिर 5 जुलाई, 1975 को अपने पुराने संगठन ‘जनमत संग्रह मोर्चा’ को भंग कर अपनी पार्टी में विलय कर लिया। इस प्रकार शेख कांग्रेस से परे होते गये।

आपत काल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में श्रीमती गांधी का खयाल था कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर को जनता पार्टी और जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन से जोड़ देंगे। इस सोच के चलते श्रीमती गांधी ने 25 मार्च 1977 को शेख को दिया कांग्रेस समर्थन वापस ले लिया और नया मंत्रीमंडल बनाने की पेशकश की। लेकिन शेख ने उनकी इस कोशिश को नाकाम कर दिया। कश्मीर के तत्कालिन राज्यपाल एल.के. झा ने मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला की बात मानते हुए विधानसभा भंग कर नये चुनाव कराने की घोशणा कर दी।

30 जून, 1977 को हुए जम्मू-कश्मीर के विधान सभा चुनावों का कश्मीर राजनीति में अलग अर्थ है। कश्मीर राजनीति के जानकार लगभग सभी राजनीतिक विश्लेशक मानते है कि यह पहला निश्पक्ष चुनाव था। विधान सभा की 75 में से 48 सीटों पर शेख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस ने विजय हासिल कर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। घाटी के 42 विधान सभा क्षेत्रों में से 39 नेशनल कांफ्रेंस ने हासिल की। इसी प्रकार जम्मू क्षेत्र की 32 में से 7 तथा लदाख की दोनों सीटें नेशनल कांफ्रेंस को प्राप्त हुई। जनता पार्टी को तब घाटी में केवल दो और जम्मू में 11 सीटें प्राप्त हुई। बहरहाल 9 जुलाई,1977 को शेख अब्दुल्ला कश्मीर के मुख्यमंत्री बने।

कश्मीर राजनीति के लम्बे संघर्श और कारावास ने शेख अब्दुल्ला को परिवारपरस्त बना दिया। हालांकि उनके स्वाभाविक उतराधिकारी मिर्जा अफजल बेग नजर आते थे। शेख को यह ठीक नहीं लगा। वह अपने पुत्र डॉ. फारूक अब्दुल्ला को ही अपना राजनीतिक वारिस बनाना चाहते थे। इस इच्छा को स्थापित करने के लिए उन्होंने उन सभी व्यक्तियों को नेशनल कांफ्रेंस से निकाल बाहर किया जो फारूक अब्दुल्ला के सम्भावित प्रतिद्वंदी हो सकते थे। मसलन अफजल बेग को भी शेख ने 25 सितम्बर,1978 को नेशनल कांफ्रेंस से निश्कासित कर दिया । इसी दौरान 8 सितम्बर, 1982 को शेख अब्दुल्ला ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली और उम्मीद के मुताबिक डॉ. फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने ।

इसके बाद की कश्मीर कथा सत्ता में बने रहने के विभिन्न फार्मूलों की कथा है। सन् 1983 में जम्मू-कश्मीर के चुनावों पर पंजाब के आंतकवाद और अलगाववाद का असर होने लगा था। जम्मू-कश्मीर कश्मीरियत से परे एक पीढ़ी के हवाले होने जा रहा था जो इतिहास के सुखद पन्नों से अनभिज्ञ था। 1983 के चुनावों फारूक अब्दुल्ला ने मुस्लिम भावनाओं को भुलाकर घाटी की 42 में से 39 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि श्रीमती गांधी की कांग्रेस ने हिन्दू भावनाओं को उभारने में हिन्दूवादी भाजपा व अन्य पार्टियों को पीछे छोड़ते हुए जम्मू क्षेत्र की 32 में से 25 सीटें अपने नाम लिख ली। मुख्यमंत्री फारूक अब्दुला और कांग्रेस में दूरियां बढ़ती गयी और वह कांग्रेस विरोधी राश्ट्रीय विपक्ष की ओर चले गये। श्रीमती गांधी ने फारूक अब्दुला की सरकार गिराने के लिए नेशनल कांफ्रेंस के 13 विधायकों की मदद से कांग्रेस के गुलाम मोहम्मद शाह को मुख्यमंत्री बनाने की सिफारिश राज्यपाल वी.के. नेहरु से की।

राज्यपाल ने इसे मानने से इंकार कर दिया। राज्यपाल वी.के. नेहरु को वापस बुला लिया और उनकी जगह 26 अप्रेल,1984 को जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। जगमोहन ने वही किया जो श्रीमती गांधी चाहती थी। डॉ. फारूक अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त हुई और गुल शाह मुख्यमंत्री बने।

श्रीमती गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने राजनीतिक समीकरण बदलने की आहट हुई। केन्द्र के इशारे पर गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार को 7 मार्च, 1986 को बर्खास्त कर दिया गया। राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ। फिर राज्यपाल शासन तब खत्म हुआ जब 7 नवम्बर, 1986 को राजीव-फारूक के बीच समझौता हुआ और फारूक अब्दुल्ला के मुख्यमंत्रित्व में नेशनल कांफ्रेंस तथा कांग्रेस का संयुक्त मंत्रीमंडल बना।

23 मार्च,1987 को जम्मू-कश्मीर विधान सभा का चुनाव हुआ। धांधलियों के लिए विख्यात इस चुनाव में कांग्रेस -नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन और जमाते इस्लामी सहित 13 पार्टियों को मिलाकर बने मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एम.यू.एफ.) बीच था। एम.यू.एफ. को 30 प्रतिशत मिले लेकिन सीटे चार ही प्राप्त हुई। शेख फारूक जैसे लोग पराजित हो आंतक रास्ते की ओर गये। बहरहाल डॉ. फारूक मुख्यमंत्री बने और घाटी में आंतकवाद की पगडंडिया पाकिस्तान से जुड़ती चली गयी।

राजनैतिक घटनाक्रम को ऐतिहासिक क्रम में सजाकर न तो आलेख के लेखक को और न किसी अन्य को ही भ्रम पालना चाहिये कि उसने जम्मू-कश्मीर की समस्या को समझ लिया है। इसे कम से कम उपरोक्त आधार पर सुलझाने का स्वप्न तो देखा ही नहीं जाना चाहिये। देश के किसी भी अन्य राज्य की तरह ही जम्मू-कश्मीर का अपना अतीत तो है ही साथ ही अपनी अलग पहचान विशेशता और उलझने भी हैं। ज्ञात इतिहास में भारत पर सिकन्दर महान के आक्रमण के समय कश्मीर पर अमिसर का शासन था जिसने पोरस का साथ न देकर सिकन्दर को सम्पत्ति व हाथी आदि देकर अधीनता स्वीकार की। कश्मीर कभी मौर्य साम्राज्य का हिस्सा भी रहा। कनिश्क ने भी कश्मीर विजय किया। 8वीं शताब्दी में कारकोटा वंश के चन्द्रपीड़ तथा ललितादित्य प्रतापी सम्राट हुये जिनके द्वारा चीन एवं तिब्बत तक पहुॅच बनायी गयी। एक लंबा शासन काल (1000 से 1320) लोहार राजवंश का रहा। इसी काल में महमूद गजनवी ने कश्मीर तक पहुंचने के दो बार असफल प्रयास किये। लेकिन सफलता मिली तुर्क-मंगोल जलजु को। सल्तनत काल के मुल्तान और मुगल बादशाहो ने भी कश्मीर को अपने अधीन किया।

राजाशाही के शासन के दौर में जम्मू के राजा गुलाब सिंह ने घाटी को अंग्रेजों से खरीदा और बहु संख्यक मुसलमानों को अपने उत्पीड़न और शोशण का शिकार बनाया, वह अलग ही धारा है। अन्तर्धारा के अन्तर्गत बहुसंख्य मुसलमानों ने राजा गुलाब सिंह से हिन्दू धर्म में वापसी की याचना की। राजा ने 10 पण्डितों का दल काशी भिजवाया ताकि शास्त्र की व्यवस्था जानी जा सके। आज चाहे हम आश्चर्य करें लेकिन उस काल के पण्डितों ने व्यवस्था दी कि धर्म की पवित्रता को बनाये रखने के लिये घर वापसी की अनुमति नहीं दी जा सकती चाहे वह समुदाय कुछ समय पहले हिन्दू धर्मानुयायी ही क्यों न रहा हो और चाहे अन्य धर्म में पहुंचकर भी अपने पुराने संस्कारों और रीति-रिवाजों में ही रचा बसा हो। चाहे उनकी आस्थाएं इस्लाम के कट्टरपंथ वहाबियों से इतर सूफियाना क्यों न हों। चाहे वे अपने धर्म ग्रंथों का हिन्दुओं की तरह सस्वर संगीतात्मक पाठ क्यों न करने लगे हों। चाहे उनकी आस्थाएं संकेतों और प्रतीकों में हिन्दुओं से साझा क्यों न करती हों लेकिन कथित उदार हिन्दू परचम धारी उन्हें अपने आगोश में नही ले सकते थे, गले नहीं लगा सकते थे।

बात यहीं खत्म नहीं होती। राजा हरिसिंह के जमाने तक राज्य, प्रशासन भूमि पर सम्पत्ति पर अधिकार हिन्दू उच्च वर्ण का ही था। मुसलमान को तो श्रमिक तक ही सीमित रखा गया था। राजा हरिसिंह के काल में ही राजनैतिक सरगर्मी शुरू हो चुकी थी। बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय प्रशासन में प्रतिनिधित्व चाहने लगा। सन् 1927 में एक ‘ लेजिस्लेटिव एसेंबली’ की मांग स्वीकार हुई और घोशणा भी हुई लेकिन अमल नहीं हुआ। तब तक शेख अब्दुल्ला के नेत्ृत्व में ‘नेशनल कांफ्रेंस’ ने राजनैतिक मुख्य धारा में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था। यहां तक कि राजा हरि सिंह ने कश्मीर विलय के बाद अपना प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को ही बनाया। शेख की छवि आज चाहे जो भी बन चुकी हो लेकिन भुलाया नहीं जा सकता कि चुनाव की घड़ी में उन्होंने पाकिस्तान के स्थान पर हिन्दुस्तान को चुना था। क्योंकि कश्मीर का अवाम और स्वयं शेख लोकतंत्र के पक्षधर थे। बात सिर्फ राजनैतिक उन्माद की नहीं वरन कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत की है। सामूहिक वैचारिकी में कश्मीर के लोगों के स्पश्टतः तीन आधार दिखाई पड़ते है दृ जम्हूरियत, कश्मीरियत, और इन्सानियत। इन तीनों आधारों के इर्दगिर्द ही कश्मीर की राजनीति ,सामाजिकता और संस्कृति घूमती है। संकीर्णता या साम्प्रदायिकता तो दिल्ली की सत्ताओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिये उन पर चिपकाया गया पोस्टर है। कहीं ऐसा तो नहीं कि दिल्ली की भिन्न भिन्न सत्ताएं विभिन्न समस्याओं से ध्यान हटाने के लिये समय समय पर जो राजनैतिक धार्मिक ,सीमा या वाह्यआक्रमण या छद्मयुद्ध आदि का उन्माद बिखेरती रही हैं उसमें कश्मीर की समस्या सबसे मुफीद रही है। यदि यह हथकंडा पाकिस्तान के लिये सबसे अधिक कारगर रहा है तो हमारे लिये क्यों नहीं।

यदि तर्कपूर्ण विचार किया जाये तो कश्मीर की समस्या सिर्फ राजनैतिक या धार्मिक नहीं वरन् कश्मीर की अस्मिता, उसके लोकतान्त्रिक अधिकार, कश्मीरी अवाम की सांझी संस्कृति। शैव, बौद्ध और सूफी (इस्लाम) की सांझी आस्थाओं की। उनको मौलिक अधिकारों युक्त बनाये जाने की है। चाहे विशेश अधिकार रक्षा सैनिकों को प्राप्त क्यों न हो। समस्या का समाधान पाकिस्तान से जंग जीत कर नहीं वरन कश्मीरियों का मन जीत कर निकलेगा।