अम्बेडकर, मार्क्स और हीगल: जातिविहीन समाज की सम्भावना

-करोड़ी सिंह
करोड़ी सिंह मानते हैं कि भीमराव अम्बेडकर ने भारत में जातिविहीन समाज की परिकल्पना की थी। हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था में उच्च जाति समाज निम्न जाति समाज को शोषण करता रहा है। जाति व्यवस्था के कारण ही दलित और पिछड़े हैं। अम्बेडकर को दुख रहा कि सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों को आर्थिक और राजनैतिक आरक्षण के बावजूद समानता का अधिकार नहीं मिल पाया। सत्ता सदैव ही उच्च जाति के हितों को पोषण करती रही है।

आधुनिक विश्व में चार सबसे बड़ी घटनाएं घटी जिन्होंने मानव समाज को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। फ्रांस की क्रांति ने वैयक्तिक स्वतंत्रता को व्यावहारिक बनाया तो वेस्ट फेलिया की संधि ने आत्मनिर्णय के अधिकार को स्थापित किया और ‘राष्ट्र राज्य’ को विश्व व्यवस्था का आधारस्तम्भ बनाया। बोल्शेविक क्रांति ने समानता के आधारित समाज को वास्तविकता का रास्ता दिखाया तो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने अहिंसक क्रांति से उपनिवेशवादी साम्राज्य को समाप्त कर विश्व को वांछितस्वरूप प्रदान किया। इन चारों घटनाओं की परिणिति वर्तमान समाज की व्यवस्था है।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरूप को निखारने में उपरोक्त घटनाओं के साथ ऐतिहासिक विरासत एवं सांस्कृतिक व्यवस्था की आधारभूत भूमिका रही। अतः भारतीय राष्ट्रवाद का जो स्वरूप बना उस पर प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास के साथ आधुनिक विश्व की महत्वपूर्ण घटनाओं की छाप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। प्राचीन भारत का स्वर्णिम युग एवं आधुनिक विश्व के परिदृश्य से प्रेरित स्वतंत्रता आंदोलन ने भारतीय समाज के पतित होने के दो कारणों को रेखोकित किया। उपनिवेशवादी साम्राज्यवादी शोषण आधारित व्यवस्था तथा भारतीय सामाजिक व्यवस्था में विभिन्न बुराइयों का समावेश। इन्हीं दो कारणों के निदान कि लिए स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारम्भिक दौर में दो विचारसमूह सामने आये- उदारवादी और अतिवादी। इन दोनों विचारों में समाज के पतन के कारणों के प्रभाव एवं इस प्रभाव को समाप्त करने के साधनों को लेकर मतभेद उभरे। अतिवादी त्वरित गति से कारणों का शमन करने के लिए उग्र रणनीति के पक्षधर बन गये। उदारवादी समाज में धीमे और निर्णायक साधनों के साथ पतन के कारणों का शमन करना चाहते थे। परन्तु दोनों के ही विचारों व क्रियाओं में पुर्नउत्थानवादी दृष्टिकोण एवं समाज के पुनर्गठन का उद्देश्य प्रमुखता में रहा।
इन दानों विचारों को समन्वित करने का कार्य महात्मा गांधी ने किया जिससे स्वतंत्रता आंदोलन के अन्तिम काल में राष्ट्रवाद का एक समग्र रूप उभर कर सामने आया। महात्मा गांधी ने पुर्नउत्थानवादी दृष्टिकोण एवं पुर्गठनवादी रणनीति के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एवं राष्ट्रवाद को जो स्वरूप प्रदान किया वो समस्त विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। लेकिन भारतीय समाज में सामाजिक भेदभाव व शोषण के अंतर्निहित स्वरूप के निदान का कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। गांधी ने माना कि उपनिवेशवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को समाप्त करना प्राथमिकता होनी चाहिए। एक बार उपनिवेशवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के समाप्त हो जाने पर समाज के पतन के अंतर्निहित कारणों का प्रभावी निदान स्वशासन में अधिक आसानी से सम्भव हो सकेगा। महात्मा गांधी का यह दृष्टिकोण उनकी सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि का स्वाभाविक परिणाम था। अतः स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन को प्राथमिकता नहीं दी गयी बल्कि बहुत ही धीमी गति से सामाजिक सुधार करना मुख्य उद्देश्य रहा एवं राष्ट्रवाद का स्वरूप भी भारतीय अभिजात्य वर्ग के हित को बिना नुकसान पहुंचाये सामाजिक परिवर्तन लाने पर आधारित रहा। इस परिवेश में भीमराव अम्बेडकर ने भारतीय समाज को दलित व शोषित वर्ग/जाति के संदर्भ में समझने, व्याख्यायित करने एवं परिवर्तित करने का प्रयास किया।
हीगल और मार्क्स का समन्वय
अम्बेडकर ने स्पष्ट किया कि भारतीय समाज विश्व के अन्य समाजों, विशेष रूप से पाश्चात्य जगत के समाजों से पूर्णतः भिन्न है जिसको समझने के लिए हीगल के विचारवाद और मार्क्स के भौतिकवादी दर्शन को समन्वित करना जरूरी है। वे मानते थे कि भारतीय समाज का मूल आधार सांस्कृतिक और वैचारिक है जिस पर आर्थिक और राजनैतिक अधिसंरचना का निर्माण होता है। इन सबका आधार हिन्दू धर्म और संस्कृति है जो कि जाति व्यवस्था से संरचित है। अतः जातीय विभाजन वर्ग विभाजन के समकक्ष है।
वर्ग विभाजन का आधार आर्थिक है जबकि जातीय व्यवस्था का आधार सांस्कृतिक व धार्मिक है जिस पर आर्थिक व राजनीतिक संरचनाएं टिकी हुई हैं। अतः जब तक सांस्कृतिक मूल्य व सामाजिक संस्थाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होगा जातीय व्यवस्था बनी रहेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि जातीय व्यवस्था वर्गविभाजन से भी ज्यादा गहन और मजबूत है। जातिविहीन समाज की स्थापना तभी हो सकती है जब जाति व्यवस्था का पूर्ण क्षय हो।
इस प्रकार अम्बेडकर ने हीगल और मार्क्स के दर्शन को समन्वित करके एक जातिविहीन समाज की संकल्पना प्रस्तुत की लेकिन इस संकल्पना को व्यावहारिक और साकार बनाने के लिए वांछिक राजनैतिक शक्ति और बौद्धिक स्रोतों का अभाव सदैव बना रहा फिर भी संवैधानिक व्यवस्था में दलित व पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान कराने में अम्बेडकर को कुछ सीमा तक सफलता मिली। आरक्षण के प्रावधानों से सीमित राजनैतिक और आर्थिक अवसर प्रदान किये गये लेकिन सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ क्योंकि प्रचलित सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को राष्ट्रवाद में समाहित किया गया। इसलिए अम्बेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता के बिना नहीं रह सकती। आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता व समानता के अभाव में जनसामान्य का राजनैतिक व्यवस्था से विश्वास उठ जायेगा जिसका परिणाम राजनैतिक अस्थायित्व ही नहीं हिंसक भी हो सकता है।
अम्बेडकर की चेतावनी को तत्कालीन राजनैतिक नेत्तृत्व ने नजरअंदाज कर दिया क्योंकि नेत्तृव उच्च जाति के हितों को पोषित करना चाहता था एवं दलित और शोषित समाज को केवल आरक्षणरूपी सांत्वना तक सीमित रखना चाहता था। अम्बेडकर का हिन्दू धर्म की जातीय व्यवस्था से मोहभंग हुआ तो निराश होकर बौद्ध धर्म को अंगीकार किया।
करोड़ी सिंह
एमेरिटस फैलो, दक्षिण एशिया अध्ययन केन्द्र
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
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