राजनैतिक दर्शन के अभाव में भटके भारत के किसान आन्दोलन

इस वर्ष महान ऑक्टोबर क्रांति के 100 वर्ष हो रहे हैं। सोवियत संघ की इस जनक्रांति ने दुनिया भर के देशों में अपना प्रभाव छोड़ा लेकिन भारत में भी किसानों की क्रांति का अपना लम्बा इतिहास रहा है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही देश में तत्कालीन अंग्रेज सरकार के विराध में पूरा देश आंदोलित हो गया था और वह आग देश के दिल में आजादी की ज्वाला की तरह धधकती रही। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह से जनआंदोलन तो नहीं बन पाया लेकिन विरोध के स्वर की ताकत को देश के किसानों ने समझ लिया।
अनेक स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आन्दोलन हुए। इनमें से अधिकांश आन्दोलन अंग्रेजों के खिलाफ किये गये थे। समाचार पत्रों ने भी किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों के अन्यायपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को अपने पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आन्दोलन, चम्पारन सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आन्दोलन के रूप में जाने जाते हैं।
भारत के आन्दोलन कभी कभी फैसलाकुन हुए तो कभी कभी कुचल दिये गये। इन आन्दोलनों में किसानों की महती भूमिका रही लेकिन किसी भी राजनैतिक दर्शन की अभाव में ये आंदोलन स्वतंत्रता आन्दोलन में तो परिवर्तित हुए या जातिगत और साम्प्रदायिक मुद्दों में भटक गये लेकिन वृहत सामाजिक बदलाव लाने में असफल रहे।
कहा जाता है कि 1917 में ऑरोरा नामक युद्धपोत की दागी गयी तोप की आवाज के इशारे ने ही महान ऑक्टोबर क्रांति का सूत्रपात किया और बोल्शेविक्स ने विंटर पेलेस पर हमला कर दिया था लेकिन तोप की वो आवाज भारत तक नहीं पहंुची।
1917 के रशिया के बोल्शेविक आंदोलन पर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं की नजर थी। वे मार्क्सवाद का व्यावहारिक रूप देख रहे थे। महात्मा गांधी ने इस मौके पर लेनिन को बधाई भी दी लेकिन वे लेनिन के हिंसक क्रांति के तरीकों के आलोचक थे। गांधी अहिंसक साधनों से समाजवाद लाना चाहते थे। वे वर्गसंघर्ष के स्थान पर वर्गसामंजस्य में विश्वास रखते थे।
यद्यपि भारत में साम्यवादी दल का गठन सन 1925 में हुआ लेकिन एम. एन रॉय और डांगे जैसे नेताओं ने इसकी तैयारी पहले ही शुरू करदी थी। वे मानते थे कि भारतीय आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि क्रांतिकारी तानाशाही का तरीका इस्तेमाल नहीं किया जाता। वे गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को सही नहीं मानते थे। गांधी मानते थे कि हिंसा से समाज में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। एम. एन रॉय मानते थे कि साम्राज्यवाद के खिलाफ, बुर्जुआ पूंजीवादी और समाज के शोषित कभी किसी साझा संघर्ष का हिस्सा नहीं हो सकते। बुर्जुआ पूंजीवादी का अस्तित्व ही शोषण की सामंती व्यवस्था में है। शोषक और शोषित कैसे साथ हो सकते हैं जबकि उनके हित अलग अलग हैं।
1859
1917 की रशियन क्रांति से बहुत पहले, 1859 में बंगाल में भारतीय किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ नील आंदोलन किया गया। अपनी आर्थिक मांगों के सन्दर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आन्दोलन उस समय का एक विशाल आन्दोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिये ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे, तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को ददनी प्रथा कहा जाता था। चम्पारन का मामला बहुत पुराना था। चम्पारन के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया पद्धति’ कहते थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में रासायनिक रगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाजार में गिरावट आने लगी, जिससे नील बागान के मालिक अपने कारखाने बंद करने लगे। किसान भी नील की खेती से छुटकारा पाना चाहते थे।
1872
कूका विद्रोह तेलंगाना में कृषि सम्बन्धी समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज सरकार से लड़ने के लिए हुआ। इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। सन 1872 में इनके शिष्य बाबा रामसिंह ने अंग्रेजों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कैद कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहाँ पर सन 1885 में उनकी मृत्यु हो गयी।
1873
1873 में पाबना के युसुफ सराय के किसानों ने मिलकर एक ‘कृषक संघ’ का गठन किया। यह जागीरदार की ज्यादतियों के विरोध में किया गया। पाबना जिले के काश्तकारों को 1859 में एक कानून द्वारा बेदखली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण प्राप्त हुआ था, इसके बावजूद भी जमींदारों ने उनसे सीमा से अधिक लगान वसूला एवं उनको उनकी जमीन के अधिकार से वंचित किया।
1874
दिसम्बर 1874 में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के खिलाफ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर जिलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार किसानों का शोषण कर रहे थे। इन साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन की शुरुआत सन 1874 में शिरूर तालुका के करडाह गाँव से हुई।
1875
महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रमोसी किसानों ने जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया। महाराष्ट्र सूखे से त्रस्त था और सरकार इस सम्बन्ध में उदासीन थी। फड़के ने कोली, भील और धांगर समुदायों को संगठित कर क्रांतिकारियों का दल बनाया। इन आदिवासियों ने कुछ समय के लिए पूना शहर पर कब्जा भी कर लिया था।
1879
आन्ध्र प्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध रंपाओं का विद्रोह हुआ, जो सन 1879 से लेकर 1920-22 तक छिटपुट ढंग से चलता रहा। रंपाओं को ‘मुट्टा’ तथा उनके ज़मींदार को ‘मुट्टादार’ कहते थे। यह किसानों का जमीदारों के अत्याचार और शोषण खिलाफ विद्रोह था।
1914
ताना भगत आन्दोलन की शुरुआत 1914 में बिहार में हुई। यह आन्दोलन लगान की ऊंची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक ‘जतरा भगत’ थे, जिन्हें कभी बिरसा मुण्डा के समतुल्य बताया गया। इसके अतिरिक्त अन्य नेताओं में बलराम भगत, गुरुरक्षितणी भगत आदि इस आन्दोलन से सम्बद्ध थे। ‘मुण्डा आन्दोलन’ की समाप्ति के करीब 13 वर्ष बाद ‘ताना भगत आन्दोलन’ शुरू हुआ। यह वैसे तो धार्मिक आन्दोलन था, लेकिन इसके लक्ष्य राजनीतिक थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नये ‘पंथ’ के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धरित किये थे।
1918
होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा गौरीशंकर मिश्र, इन्द्र नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरी, 1918 में उत्तर प्रदेश में ‘किसान सभा’ का गठन किया गया। सन 1919 के अन्तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। प्रतापगढ़ जिले की एक जागीर में ‘नाई धोबी बंद’ सामाजिक बहिष्कार संगठित कारवाई की पहली घटना थी।
1918
अवध की तालुकेदारी में ग्राम पंचायतों के नेतृत्व में किसान बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया। झिंगुरीपाल सिंह एवं दुर्गपाल सिंह ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन जल्द ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचन्द्र उभर कर सामने आये। उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन को 1920 के दशक में सर्वाधिक मजबूती बाबा रामचन्द्र ने प्रदान की। उनके व्यक्तिगत प्रयासों से ही 17 अक्टूबर, 1920 को प्रतापगढ़ ज़िले में ‘अवध किसान सभा’ का गठन किया गया। प्रतापगढ़ ज़िले का ‘खरगांव’ किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इस संगठन को जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र, माताबदल पांडे, केदारनाथ आदि ने अपने सहयोग से शक्ति प्रदान की।
उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर ज़िलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने ‘एका आन्दोलन’ नाम का आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन में कुछ जमींदार भी शामिल थे। इस आन्दोलन के प्रमुख नेता ‘मदारी पासी’ और ‘सहदेव’ थे। ये दोनों दलित किसान थे।
1918
गांधीजी ने सन 1918 में खेड़ा किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। खेड़ा गुजरात में स्थित है। खेड़ा में गांधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की। खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत की मांग की, लेकिन कोई रियायत नहीं मिली। 22 मार्च, 1918 के दिन गांधीजी ने खेड़ा आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। अन्य सहयोगियों में सरदार वल्लभ भाई पटेल और इन्दुलाल याज्ञनिक थे। 22 मार्च, 1918 को नाडियाड में एक आम सभा में गांधीजी ने किसानों का लगान अदा न करने का सुझाव दिया। लगान न अदा करने का पहला नारा खेड़ा के ‘कापड़गंज’ तालुका में स्थानीय नेता ‘मोहन पाण्ड्या’ ने दिया। गांधीजी के सत्याग्रह के आगे विवश होकर सरकार ने यह आदेश दिया कि, वसूली समर्थ किसानों से ही की जाय।
1920
केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपलाओं द्वारा सन 1920 में विद्राह किया गया। प्रारम्भ में यह विद्रोह अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ था। महात्मा गाँधी, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेताओं का सहयोग इस आन्दोलन को प्राप्त था। इस आन्दोलन के मुख्य नेता के रूप में ‘अली मुसलियार’ चर्चित थे। 15 फरवरी, 1921 को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत तथा कांग्रेस के नेता याकूब हसन, यू. गोपाल मेनन, पी. मोइद्दीन कोया और के. माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद यह आन्दोलन स्थानीय मोपला नेताओं के हाथ में चला गया। 1920 में इस आन्दोलन ने हिन्दू-मुसलमानों के मध्य साम्प्रदायिक आन्दोलन का रूप ले लिया, परन्तु शीघ्र ही इस आन्दोलन को कुचल दिया गया।
1922
जहाँ 1918 का खेड़ा सत्याग्रह गांधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं कल्याण जी तथा कुंवर जी मेहता ने भी 1922 में बारदोली सत्याग्रह को प्रारम्भ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के हाथों में रहा।
1923
सन 1923 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘बिहार किसान सभा’ का गठन किया। 1928 में ‘आंध प्रान्तीय रैय्यत सभा’ की स्थापना एन.जी. रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चौधरी ने ‘उत्त्कल प्रान्तीय किसान सभा’ की स्थापना की। बंगाल में ‘टेंनेंसी एक्ट’ को लेकर अकरम ख़ां, अब्दुर्रहीम, फजलुलहक, के प्रयासों से 1929 में ‘कृषक प्रजा पार्टी’ की स्थापना हुई। अप्रैल, 1935 में संयुक्त प्रान्त में किसान संघ की स्थापना हुई। इसी वर्ष एन.जी. रंगा एवं अन्य किसान नेताओं ने सभी प्रान्तीय किसान सभाओं को मिलाकर एक ‘अखिल भारतीय किसान संगठन’ बनाने की योजना बनायी।
1928
सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुके में 1928 में किसानों द्वारा ‘लगान न अदायगी’ का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल ‘कुनबी-पाटीदार’ जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि ‘कालिपराज’ (काले लोग) जनजाति के लोगों ने भी हिस्सा लिया। बारदोली सत्याग्रह पूरे राष्ट्रीय आन्दोलन का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा है। बारदोली के श्मेड़ता बन्धुओंश् (कल्याण जी और कुंवर जी) तथा दयाल जी ने किसानों के समर्थन में 1922 ई. से आन्दोलन चलाया था। बाद में इसका नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। बारदोली क्षेत्र में कालिपराज जनजाति रहती थी, जिसे ‘हाली पद्धति’ के अन्तर्गत उच्च जातियों के यहाँ पुश्तैनी मजदूर के रूप में कार्य करना होता था।
1946
किसान आन्दोलनों में सन 1946 का बंगाल का तेभागा आन्दोलन सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, जिसमें किसानों ने ‘फ्लाइड कमीशन’ की सिफारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। यह आन्दोलन जोतदारों के विरुद्ध बंटाईदारों का आन्दोलन था। इस आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण नेता ‘कम्पाराम सिंह’ एवं ‘भवन सिंह’ थे। बंगाल का ‘तेभागा आंदोलन’ फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने का आंदोलन था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। ‘किसान सभा’ के आह्वान पर लड़े गये इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
1946
तेलंगाना आन्दोलन आंध्र प्रदेश में जमींदारों एवं साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध सन 1946 में किया गया था।
हैदराबाद रियासत में तेलंगाना में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह आन्दोलन शुरू हुआ। यहां पर किसानों से कम दाम पर अनाज की जबरन वसूली की जा रही थी, जिसके कारण उनके अन्दर एक आक्रोश उत्पन्न हुआ। इस आन्दोलन का तात्कालिक कारण ‘कम्युनिस्ट नेता’ कमरैया की पुलिस द्वारा हत्या कर देना था। किसानों ने पुलिस व जमींदारों पर हमला कर दिया तथा हैदराबाद रियासत को समाप्त कर भारत का अंग बनाने मांग की। तेलंगाना कृषक आन्दोलन भारतीय इतिहास के सबसे लम्बे छापामार कृषक युद्ध का साक्षी बना।
राजस्थान के किसान आंदोलन
मातृकुण्डिया किसान आंदोलन (1880)
22 जून, 1880 में हुआ। चित्तौड़गढ़ के मातृकुण्डिया गांव में यह एक जाट किसान आंदोलन था। इसका मुख्य कारण नयी भू-राजस्व व्यवस्था थी। इस समय मेवाड़ के शासक महाराणा फतेहसिंह थे।
‘बिजोलिया किसान आन्दोलन’ (1897 -1941)
भारत भर में प्रसिद्ध रहा, जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन 1847 से प्रारम्भ होकर करीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। जिस प्रकार इस आन्दोलन में किसानों ने त्याग और बलिदान की भावना प्रस्तुत की, इसके उदाहरण अपवादस्वरूप ही प्राप्त होते हैं। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुकाबला किया, वह इतिहास बन गया।
बिजौलिया ठिकाने का संस्थापक अशोक परमार था। खानवा के युद्ध में सांगा की सहायता करने के कारण, सांगा ने यह ठिकाना अशोक परमार को दिया था।
बिजौलिया का क्षेत्र उपरमाल के नाम से जाना जाता हैं। इस ठिकाने में धाकड़ किसान कृषि कार्य करते थे।
बिजौलिया किसान आंदोलन की शुरूआत साधु सीताराम दास, नानकजी पटेल व ठाकरी पटेल के नेतृत्व में हुई थी। जिसकी बागड़ोर 1916 मंे विजयसिंह पथिक ने सम्भाली। 1917 ई. में विजयसिंह पथिक ने ऊपरमाल पंचबोर्ड़ की स्थापना की। 1919 ई. में किसानों की मांगों के लिए एक आयोग का गठन किया गया- बिन्दुलाल भट्टाचार्य आयोग। 1923-41 तक इस आंदोलन का राष्ट्रीय पहचान मिली। 1927 में विजयसिंह पथिक इस आंदोलन से अलग हो गये।
पथिक के बाद माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय तथा जमनालाल बजाज ने इस आंदोलन की बागडोर संभाली। माणिक्यलाल वर्मां व मेवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री टी. राघवाचार्य के बीच समझौता हुआ और किसानों की अधिकांश मांग मान ली गयी।
बेंगु किसान आंदोलन (1897 -1941)
चित्तौड़गढ़ के बेंगु कस्बे में 1921 में किसान आंदोलन हुआ। इसकी शुरूआत लाग बाग, बेगार प्रथा के विरोध के परिणामस्वरूप हुई थी। किसान मेनाल गांव में एकत्रित हुए। आंदोलन की शुरूआत रामनारायण चौधरी ने की। किसानों ने तत्कालीन मेवाड़ सरकार द्वारा लागू की गयी ऊंची लगान दरों को तर्कसंगत बनाने और बेगारी को बंद करने की मांग की। बाद में इसकी बागडोर विजयसिंह पथिक ने सम्भाली थी। इस समय बेंगु के ठाकुर अनूपसिंह थे।
दो साल तक आंदोलन को कुचलने की कोशीश की गयी लेकिन फिर 1923 में अनूपसिंह और राजस्थान सेवा संघ के मंत्री रामनारायण चौधरी के मध्य एक समझौता हुआ जिसे वोल्शेविक समझौते की संज्ञा दी गयी। यह संज्ञा किसान आंदोलन के प्रस्तावों के लिए गठित ट्रेन्च आयोग ने दी थी।
13 जुलाई,1923 को गोविन्दपुरा गांव में किसानों का एक सम्मेलन हुआ, सेना द्वारा किसानों पर गोलियां चलायी गयी। जिसमें रूपाजी और कृपाजी नामक दो किसान शहीद हुए। अन्त में बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया। यह आन्दोलन विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में समाप्त हुआ था।
अलवर सुअरपालन विरोधी आंदोलन (1921)
अलवर में बाड़ों में सुअर पालन किया जाता था, जब कभी इन सुअर को खुला छोड़ा जाता था, तब ये फसल नष्ट कर देते थे। जिसका किसानों ने विरोध किया, जबकि सरकार ने सुअरों को मारने पर पाबंदी लगा रखी थी। लेकिन अंत में सरकार के द्वारा सुअरों को मारने की अनुमति दे दी एवं आंदोलन शांत हो गया।
अलवर नीमूचणा किसान आंदोलन (1923-24)
अलवर के महाराजा जयसिंह द्वारा लगान की दर बढ़ाने पर 14 मई, 1925 को नीमूचणा गांव में 800 किसानों ने एक सभा आयोजित की जिस पर पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमंे सैकड़ों किसान मारे गये। गांधीजी ने इस आंदोलन को जलियांवालाबाग कांड से भी वीभत्स की संज्ञा दी और इसे दोहरे डायरिजमकी संज्ञा दी।
शेखावटी किसान आंदोलन (1925)
यह आंदोलन पलथाना, कटराथल, गोधरा, कुन्दनगांव आदि गांवों में फैला हुआ था। खुड़ी गांव और कुन्दन गांव में पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही में अनेक किसान मारे गये। शेखावटी किसान आंदोलन में जयपुर प्रजामण्डल का योगदान था। 1946 में हीरालाल शास्त्री के माध्यम से आंदोलन समाप्त हुआ।
बूंदी किसान आंदोलन (1926)
इस आंदोलन को बरड़ किसान आंदोलन भी कहते हैं। आंदोलन का मुख्य कारण अत्यधिक लगान, लाग बाग और बेगार थी। आंदोलन की शुरूआत नैनूराम शर्मा ने की। इनके नेतृत्व में डाबी नामक स्थान पर किसानों का एक सम्मेलन बुलाया, पुलिस ने किसानों पर गोलिया चलाई, जिसमें झण्डा गीत गाते हुए नानकजी भील शहीद हो गये। कुछ समय बाद माणिकलाल वर्मा ने इसका नेतृत्व किया। यह आंदोलन 17 वर्षं तक चला एवं 1943 में समाप्त हो गया।
मेव किसान आंदोलन (1931)
यह अलवर व भरतपुर (मेवात) में हुआ। अलवर, भरतपुर के मेव बाहुल्य क्षेत्र को मेवात कहते हैं। यह लगान विरोधी आंदोलन था। आंदोलन का नेतृत्व मोहम्मद अली के द्वारा किया गया।
जाट महिला आंदोलन (25 अप्रैल, 1934)
सीकर के कटराथल नामक स्थान पर सरदार हरलालसिंह की पत्नि किशोरीदेवी के नेतृत्व में जाट महिलाओं का एक सम्मेलन बुलाया गया। जिसमें लगभग 10,000 महिलाओं ने भाग लिया। श्रीमती रमादेवी, श्रीमती दुर्गादेवी, श्रीमती उत्तमादेवी ने इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। किशोरीदेवी के प्रयासों से शेखावाटी क्षेत्र में राजनैतिक चेतना जागृत हुई।
दूधवा-खारा किसान आंदोलन (1946-47)
बीकानेर रियासत के चुरू में हुआ। आंदोलन का कारण जमींदारों का अत्याचार था। इस समय बीकानेर के शासक शार्दुलसिंजी (गंगासिंहजी के पुत्र) थे। इस आंदोलन का नेतृत्व रघुवरदयाल गोयल, वैद्य मघाराम, हनुमानसिंह आर्य के द्वारा किया गया।
सन 1858 के बाद हुए किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश मांगे आर्थिक होती थीं। किसान आन्दोलन ने राजनीतिक सोच और शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, बल्कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते थे। इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।