‘किशन वर्सेज कन्हैया’: दर्शकों की कमी में शुरू हुआ ‘जयरंगम-2016’

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जयपुर। जयरंगम 2016। बिरला सभागार। 21 नवम्बर।
21 नवम्बर की रात 10 बजे जब परेश रावल का नाटक देख कर बिरला सभागार से निकला तो सोच रहा था कि आज के प्रदर्शन में दर्शर्कों की उपस्थिति कम क्यों थी। क्या यह आयोजकों द्वारा प्रचार में कोई कमी थी? लेकिन पिछले कई दिनों से मीडिया में लगातार प्रचार तो हो रहा था। बॉलकनी तो दो तिहाई खाली नज़र आरही थी तो नीचे जहां शायद कई मुफ्त पास से आये थे वह भी काफी खाली दिखायी दे रहा था। पुष्टि तब हुई जब मध्यांतर में नाटकों के ब्रोशर की तलाश में फोयर में गया तो कई वोलियंटर बॉलकनी के दर्शकों से निवेदन कर रहे थे कि वे नीचे आकर बैठ जायें ताकि हॉल भरा सा लगे और अभिनेताओं को उत्साह मिले। यह भी पता लगा कि नाटक के शुरु होने तक जब भीड़ नहीं मिली तो आधे दामों में भी टिकट बेचे गये।

खैर यह चिंता आयोजकों की है। जयरंगम के 2015 के एडिशन में मामला इसके उलट था। लोगों में उत्साह था। नाटक देखने की ललक थी। टिकट के लिए मारामारी थी। तो इसका कारण क्या था कि दर्शक प्रेक्षागृह तक पहुंचा ही नहीं।

इसका एक साधारण सा जवाब तब मिला जब मैं घर की तरफ लौट रहा था। रात के अंधेरों में बंद एटीएम की धुंधली रोशनी में लगी लम्बी कतारों में लगे आम लोगों को उम्मीद की किरण नज़र आरही थी कि आज कुछ रुपया निकल आयेगा तो अगले दो तीन का रसोई, बच्चे की स्कूल फीस का सहारा हो जायेगा।

लेकिन ये तो वे लोग थे जो सिनेमा तो देख लेते हैं पर नाटक के दर्शक नहीं हैं। तो फिर नाटक का वो दर्शक कहां चला गया जो कम से कम सेलेब्रिटी के नाटक तो देखता ही है और परेश रावल तो एक जाना माना नाम है। लेकिन यह दर्शक चाहे कितना भी मोदीभक्त हो लेकिन केशक्रंच से परेशान तो है और आज के माहौल में अपने पास उपलब्ध धन को नाटक जैसे उपक्रम में नहीं लगाना चाहता।

या दर्शक ने यह नाटक पहले भी फिल्म ‘ओ माइ गॉड’ में देखा हुआ है जिसमें परेश रावल ने वही कानजी का रोल निभाया था जो इस नाटक में किशन के नाम से किया है और क्या यही कारण रहा कि उसकी इच्छा इस नाटक को देखने की नहीं हुई। कारण कुछ भी हो नाटक सफल था और दर्शक ही फेल होगये। यहां शायद जयरंगम के आयोजकों को सोचना था कि परेश रावल का नाटक ही आमंत्रित करना था तो कोई और नाटक होता जो दर्शक की उत्सुकता को जगाये रखता।

गुलाबी नगरी स्थित बिड़ला सभागार में सोमवार को जयरंगम के तहत अंगिकाम के उमेश शुक्ला निर्देशित नाटक ‘किशन वर्सेज कन्हैया’ के मंचन में सशक्त किरदार, बुलंद आवाज और दमदार डायलॉग डिलिवरी के चलते अभिनेता परेश रावल दर्शकों से खूब तालियां बजवायी। किशन लाल मेहता एक ऐसा नास्तिक व्यापारी है जिसकी शादी एक अति धार्मिक औरत से हुई है। वे हमेशा धर्म और धार्मिक कर्मकाण्डों के मसले पर आपस में उलझते रहते हैं। किशन अपनी चालाकी से नयी मूर्तियों को पुरानी और चमत्कारी बता कर बेचता है और इस धोखाधड़ी को अपने व्यापार का हिस्सा समझता और बताता है। नाटक के मुख्य किरदार में किशन लाल मेहता का रोल प्रसिद्ध फिल्म कलाकार परेश रावल ने किया।

करीब ढाई घंटे तक चले इस नाटक ‘किशन वर्सेस कन्हैया’ की कहानी ने दर्शकों को पूरी तरह बांधकर रखा। यह साधारण हास्य व्यंग्य नाटक नहीं है वरन धार्मिक कर्मकाण्डों और धर्म के ठेकेदारों के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध है।

नाटक के किरदार किशन ने धर्म के नाम पर लागों को ठगने, बेवकूफ बनाने और लूटने को लेकर तार्किक बहस कर सबका मुंह बंद कर दिया।

धर्म के नाम पर देशभर में चल रही कथित दुकानों और उनके ठेकेदारों पर नाटक का किरदार किशन जमकर बरसे। नाटक में हिंदू धर्म के साथ मुस्लिम, और ईसाई धर्मों में व्याप्त कुरीतियों पर भी जोरदार प्रहार कर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
अचानक आये भूकम्प से किशन की दुकान नष्ट हो जाती। बीमा कम्पनी भूकम्प को ‘एक्ट ऑफ गॉड’ ईश्वर का कार्य बताकर बीमा की रकम देने से मना कर देती है। इस स्थिति में किशन भगवान पर रकम वसूली का मुकदमा कर देता है। चूंकि भगवान स्वयं तो अदालत में नहीं आ सकते इसलिए मंदिरों के महंतों को भगवान के दलालों के रूप में बुलाया जाता है। इस मुकदमे से पूरे समाज और मीडिया में सनसनी फैल जाती है।

जब कोई वकील किशन की वकालत के लिए तैयार नहीं होता तो किशन स्वयं अपने केस में पैरवी करता है। यहीं से शुरू होती है ईश्वर के अस्तित्व पर एक बहस। सम्भवतया यहीं आकर नाटक के लेखक के सामने ‘धर्मसंकट’ रहा होगा इसलिए भगवान किशन के यहां प्रकट भी होते हैं और चमत्कार भी करते हैं। जब वे देखते हैं कि किशन अपने साथ साथ कई अन्य भुक्तभोगियों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहा है तो वे किशन की मदद करने लगते हे और जिसकी मदद स्वयं भगवान कर रहा हो वह तो हार ही नहीं सकता।

दरअसल इसी एक क्षण लगता है कि नाटक के लेखक की सम्पूर्ण तर्कशीलता यहां आकर समाप्त हो गयी है। जो लेखक अपने पात्र किशन की वैज्ञानिक सोच को अब तक स्थापित करता रहा है, वह स्वयं ईश्वर नामक सत्ता को स्वीकार करने लगता है और अपने पात्र की शारीरिक व्याधि को चमत्कार के माध्यम से ठीक करवा कर उस पात्र को भगवान के अस्तित्व में विश्वास करवा देता है। ऐसे ही चमत्कारों की मार्केटिंग कर धर्म के ठेकेदार अपनी दुकानों को चला रहे हैं। जो नाटक वैज्ञनिक सोच और तर्कशीलता के आधार पर प्रारम्भ होता है उसका चरम उसी तथ्य को स्थापित करता है जिसके विरुद्ध नाटक की शुरूआत होती है। हां समाज सुधारकों की भांति अंत मे कर्मकाण्डों और धार्मिक धोखाधड़ियों के खिलाफ युद्ध के लिए जागरूकता को संदेश ज़रूर देता है और इस धर्मयुद्ध को जारी रखने का संकल्प करता है।

नाटक का दर्शन कुछ भी रहा हो, अभिनय के मामले में सभी पात्रों ने उत्कृष्ठता का प्रतिमान स्थापित किया। होता भी क्यों ना, यह इस नाटक का 492वां प्रदर्शन जो था। परेश रावल तो पूरे नाटक की जान थे ही। मंच पर कम से कम प्रॉपर्टी का इस्तेमाल बखूबी किया गया। सबसे अच्छा प्रयोग वह लगा जहां अदालत का इतना लम्बा दृश्य होने के बाद भी जज साहब का चेहरा सामने नहीं आया। सिर्फ आवाज़ सुनायी दी।

ब्रोशर के अनुसार नाटक में परेश के अलावा चिराग वोरा, जिमि त्रिवेदी, विमल उपाघ्याय, प्रदीप वेंगुरलेकर, वैभव, बिन्नी वाले, नैमिश दवे, रिंकू पटेल और निशि दोशी ने अभिनय किया। परदे के पीछे प्रकाश व्यवस्था संतोश झवेरी और ध्वनि पर राजेन्द्र हरसोरा में सहयोग किया।

-प्रस्तोता-उषा एवं सुभाष नाहर