कश्मीर समस्या: इतिहास, अतीत और अनिश्चिता के झरोखे से

-डॉ निदा नवाज़-

-डॉ निदा नवाज़-

निदा नवाज उन चुनिन्दा लेखको में से एक हैं जो ”इंसान के रूहानी दर्द” को कागज पर उकेरना जानते हैं।’’ निदा नवाज की ‘सिसकियां लेता स्वर्ग’ डायरी के प्रकाशन के बाद कश्मीर का यह हिन्दी लेखक एक ओर देश भर के तर्कशील बुद्धिजीवियों में चर्चा का विषय बना तो दूसरी ओर आतंकियों और फौजों के रडार पर आगया। बकौल ज्ञानरंजन ‘‘निदा के ऊपर संगीन तनी है, वह फौज के लिए संदिग्ध हैं, आतंकी उसे अपहृत करना चाहते हैं, जासूसी कुत्ते उसे सूंघ रहे हैं, लोकतंत्र के छलछंदों और रक्तपात और उजाड़ से घिरा लेखक अपनी डायरी को टुकड़ों-टुकड़ों में संवार रहा है। वह यहां-वहां हर जगह घायल और मारे जाने के लिए अभिशप्त है। निदा नवाज की डायरी कश्मीर के असंख्य नागरिकों की डायरी बन गयी है। पुण्य प्रसून वाजपेयी कहते हैं कि ‘‘निदा नवाज की ‘सिसकियां लेता स्वर्ग’ डायरी में कश्मीर का ऐसा अनकहा सच है जिसका एनकाउंटर नब्बे के दौर में हो जाना चाहिए था।’’
डॉ. निदा नवाज़ का मानना है कि आम कश्मीरियों के गुस्से को बन्दूकों और पैलेट-गनों से दबाने की कोशिश की गयी तो मेरी नज़र में यह हमारे देश की सब से बड़ी भूल होगी। निदा नवाज़ कहते हैं कि देश भर में स्थित कुछ संगठन, समुदाय, गुट, टीवी चेनलें और समाचारपत्र कश्मीर की अनिश्चिता से अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं। ये कश्मीरियों को बदनाम करने, यहां के हालात को साम्प्रदायिक रंग देने और नफ़रत फैलाने का हर सम्भव अवसर इस्तेमाल कर रहे हैं। दुर्भाग्य है कि इन्हें हमारी वर्तमान केंद्र सरकार का संरक्षण भी प्राप्त है। दरअसल केन्द्र की सरकार हो या राज्य की सरकार, हर समस्या के फौरी समाधानों पर काम करने की कोशीश कर रहे हैं। ज़रूरत है, समस्या की गहरायी को समझने और उसके दीर्घकालिक समाधानों को खोजने की।-सम्पादक
——————
जम्मू व कश्मीर हमारे देश भारत के उत्तरी भाग का एक राज्य है । इस राज्य का क्षेत्रफल 222236 वर्ग किलामीटर है। जबकि सन 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 1.25 करोड़ है। इसमे 8567485 व्यक्ति इसमें 8567485 व्यक्ति मुसलमान, 3366674 हिन्दू, 108761 बौद्ध और 234848 सिख हैं। राज्य में मुसलमानों की कुल जनसंख्या 8567485 है जबकि गैर-मुस्लिमों की कुल जनसंख्या 3710283 है। कश्मीर में मुसलमानों की जनसख्या ज़्यादा है जबकि लदाख में मुसलमानों और गैर-मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग बराबर है । इसके विपरीत जम्मू में हिन्दुओं की जनसंख्या ज़्यादा है। यह राज्य पिछले लगभग 70 वर्षों से भारत और पाकिस्तान के लिए गले में अटकी हड्डी साबित हो रहा है और समय समय पर इस राज्य के कश्मीर क्षेत्र में अलगाववाद और धार्मिक कट्टरवाद के कारण प्रदर्शन होते रहते हैं। यह राज्य, विशेषकर कश्मीर घाटी पिछले 27 वर्षों से मिलिटेंसी की जटिल, भयावह और मार्मिक परिस्थितियां झेल रही हैं जिस दौरान सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1989 से 2009 तक लगभग 43460 लोग मारे गये हैं जिनमें 21323 आतंकवादी विभिन्न सैन्य-आपरेशनों में मारे गये। इस दौरान लगभग 3542 आम कश्मीरी नागरिक विभिन्न रक्षाकर्मियों द्वारा भी मारे गये। इसके साथ-साथ मिलिटेंटों द्वारा 3869 सुरक्षाकर्मी और लगभग 1500 जम्मू व कश्मीर पुलिसकर्मी भी इस दौरान मारे गये। इन बीस वर्षों के दौरान 13226 आम निर्दाेष नागरिक मिलिटेंटों द्वारा मारे गये। इन सरकारी आंकड़ों के अनूसार पिछले बीस वर्षों के दौरान मिलिटेंटों और फ़ौजियों के हाथों 16768 आम निर्दाेष लोग कश्मीर घाटी में मारे गये जिनमें 219 कश्मीरी हिन्द ू(पण्डित) भी थे। ये आकंड़े 2009 में राजस्व मंत्री रमन भला ने राज्य की विधान सभा में प्रस्तुत किये। 2016 तक यह संख्या लगभग 47 हज़ार तक पहुंच गई है लेकिन 1989 से आज तक मारे गये कश्मीरी हिंदुओं (पण्डितों) की कुल संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार 219 ही है।
अगस्त 1947 में हिन्दुस्तान अंग्रेजों से आज़ाद होते ही दो अलग देशों भारत और पाकिस्तान के रूप में अलग हो गये। विभाजन के फ़ौरन बाद दोनों देशों में भयानक दंगे भड़के जिनमें दोनों बड़े समुदायों, हिन्दुओं और मुसलमानों ,के साथ संबंधित लाखों लोग मारे गये। इन दंगों ने दोनों देशों के बीच नफ़रत की न मिटने वाली बुनियाद डाल दी। हिन्दुस्तान के विभाजन के बाद ही जम्मू व कश्मीर को भी केवल दो में नहीं बल्कि तीन देशों भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच बांटने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। तब से लेकर आज तक भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सब से बड़ी समस्या कश्मीर समस्या ही रही। कश्मीर समस्या को समझने के लिए कश्मीर के इतिहास पर एक उचटती नज़र डालनी बेहद ज़रूरी है।
1947 में जब ब्रिटिश शासकों ने इस उपमहाद्वीप को छोड़ा था तब जम्मू व कश्मीर उनके शासन में नहीं था बल्कि उस गुलाब सिंह के वंशज महाराजा हरिसिंह के पास था, जिसने 75 लाख नानक शाही सिक्कों के बदले इसको अंग्रेज़ो से बयनामा अमृतसर के तहत ख़रीदा था। मुस्लिम बहुल आबादी वाले कश्मीर के हिंदू राजा, महाराजा हरिसिंह ने पाकिस्तान और भारत में से किसी में भी शामिल नहीं होने का बज़ाहिर निर्णय लिया। उधर 14 अगस्त 1947 को कश्मीर के डाकघरों और तारघरों पर पकिस्तान के झंडे लहराये गये। इन परिस्थितियों को देख महाराजा हरिसिंह जम्मू व कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे और हिन्दू होते हुए भी भारत के साथ जम्मू व कश्मीर के विलय के विरोध में थे। इन्ही दिनों गांधी जी श्रीनगर के दौरे पर आये और महाराजा हरिसिंह और महारानी तारा देवी के साथ एक लम्बी मुलाक़ात की। इस मुलाक़ात के बाद ही जम्मू व कश्मीर के अंदर राजनैतिक हलचल पैदा हो गयी। 11 अगस्त को रामचंद काक को प्रधान मंत्री के पद से हटाया गया । वह एक स्वतंत्र जम्मू व कश्मीर के बड़े हामी थे। इस दौरान लार्ड माउंटबेटन के सलाहकार मिस्टर वी. पी. मेनन अधिकतर कश्मीर आकर महाराजा हरिसिंह से मुलाक़ात किया करते थे। उनके ही कहने पर 15 अक्तूबर को ठाकुर जंगसिंह की जगह महरचंद महाजन जम्मू व कश्मीर के नये प्रघान मंत्री बनाये गये, 16 अक्तूबर को शेख अब्दुल्ला हवाई जहाज द्वारा श्रीनगर से दिल्ली बुलाये गये जहां उन्होंने गांधीजी, जवाहरलाल नेहरु, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद और सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ मुलाकातें कीं।
अभी यह आपसी बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान ने कबाइलियों और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा किया। कश्मीर की परिस्थितियां इस हद तक ख़राब थीं कि महाराजा हरिसिंह को रात के अंधेरे में अपने परिवार सहित कश्मीर घाटी छोडनी पड़ी। 26 अक्तूबर 1947 को महाराजा ने लार्ड माउंटबेटन को एक पत्र द्वारा सूचित किया कि जम्मू व कश्मीर के हालात बेहद ख़राब हो गये हैं, पाकिस्तान ने कबाइली कश्मीर में दख़ल किया है। इसलिए, मुझे आपकी सहायता की बहुत ज़रूरत है मगर मैं यह भी जानता हूँ कि आप जम्मू व् कश्मीर के भारत के साथ विलय के बिना सहायता करने के लिए तैयार नहीं होंगे इस कारण मैं भारत के साथ जम्मू व कश्मीर के विलय के डाक्यूमेंट्स वी. पी. मेनन के हाथ भेज रहा हूं।
इस तरह 26 अक्तूबर को ही जम्मू कश्मीर का भारत के साथ विलय हुआ। भारत ने हवाई जहाज़ों द्वारा अपनी फ़ौज श्रीनगर के एयर-बेस पर उतारी। शेख अब्दुल्लाह जम्मू व कश्मीर के प्रधान मंत्री नियुक्त हुए। पाकिस्तान के भेजे कबाइलियों जिनका नेतृत्व पाकिस्तानी फ़ौजी कर रहे थे और कश्मीर के पूर्व सैनिकों के बीच दिसम्बर 1948 तक छुटपुट झड़पें होती रही जिनकी सहायता अब भारतीय सेना कर रही थी।
1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र की मुदाखलत से जंगबंदी की घोषणा की गयी। इस तरह जंगबंदी लाईन (सीज़ फायर लाईन) सामने आगयी। संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेम्बली में पारित प्रस्तावों के तहत यह तय हुआ कि जम्मू व कश्मीर में हालात थोड़े बेहतर होने के साथ ही पूरे क्षेत्र के लोगों को इस बात का निर्णय लेने का अवसर दिया जायेगा कि वे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहना चाहते हैं या भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ। लेकिन दोनों देशों के राजनैतिक और फ़ौजी दिग्गजों ने विभिन्न प्रकार से जम्मू व कश्मीर के आतंरिक मामलों में अपना अनावश्यक हस्तक्षेप जारी रखा। भारत नियंत्रित जम्मू कश्मीर में शेख़ मुहम्मद अब्दुलाह एक मात्र नेता थे जिनके साथ जनून की सीमा तक क्षेत्र के आम लोग थे। भारत की केंद्र सरकार ने शेख़ अब्दुल्लाह को केवल इसलिए 11 साल तक जेल में रखा क्योंकि वह कश्मीरियों को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताओं के तहत निर्णय लेने का अवसर देने की वकालत कर रहे थे।
भारतीय केंद्र सरकार ने भी समय समय पर बक्शी गुलाम मुहम्मद, जी. एम. सादिक़, मीर क़ासिम आदि जैसे लोगों को इस्तेमाल करके जम्मू व कश्मीर में कठपुतली सरकारों को स्थापित किया और उन्ही की सहायता से न केवल धारा 370 को पूरी तरह खोखला बनाया गया बल्कि पूरी कश्मीर घाटी को एक फ़ौजी छावनी में तब्दील भी किया गया। इन्ही हालात में आखिरकार शेख़ अब्दुल्लाह अपने बुनियादी पक्ष को त्याग कर 1975 में इन्द्राजी के साथ एकार्ड करने पर मजबूर हुए। उधर कश्मीर में लोगों की एक बड़ी संख्या संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ राय देने का अधिकार प्राप्त करने के लिए समय समय पर आवाज़ें उठाती रही।
शेख अब्दुल्लाह की मृत्यु के बाद कश्मीर में भारत विरोधी भावनाओं में तेज़ी आयी। कश्मीर में एक नया राजनैतिक दल मुस्लिम यूनाइटेड फ्रेंट के नाम से सामने आया। 1988 के चुनाव में उन्हें बहुमत मिलते देख केंद्र सरकार ने एक बार फिर कश्मीर को लेकर अपनी पुरानी पालिसियों पर चलते उस दल की जीत को रद्द करते फ़ारुक़ अब्दुल्लाह के नेतृत्व में एक और कठपुतली सरकार को स्थापित किया। इस घटना ने कश्मीर के युवावर्ग में ज्यादा रोष विकसित किया जो 1989 की मिलिटेंसी के रूप में सामने आया। मिलिटेंसी से निपटने के दौरान भी एक तरफ़ 1990 में राज्य के राज्यपाल जगमोहन की सहायता से कश्मीरी हिन्दु समुदाय को घाटी से नियोजित तरीक़े पर बाहर निकाला गया और फिर घाटी भर में फ़र्जी- झड़पों और नौजवानों को लापता करने का षड्यंत्र रचा गया। इस दौरान जम्मू कश्मीर पुलिस की टास्क फोर्स ने बड़ी क्रूरता से युवावर्ग को प्रताड़ित किया।
2016 के आते आते कश्मीर घाटी में एक तरफ मिलिटेंसी आखिरी हिचकियां ले रही है मगर दूसरी ओर राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ग़लत नीतियों के कारण अलगाववाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। भारत की वर्तमान केंद्र सरकार आज भी कश्मीर के आम आदमी को आर्थिक और सामाजिक तौर पर पराधीन करने की नीति पर चल रही है। बार बार धारा 370 को हटाने की बातें करके कश्मीरियों के घावों पर नमकपाशी का काम किया जारहा है. जहां तक धारा 370 की बात है यह धारा भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद है। इस के द्वारा जम्मू व कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों से विशेष अधिकार प्राप्त है।
भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 का अनुच्छेद 370 के अनुसार संसद को जम्मू व् कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार का अनुमोदन ज़रूर चाहिए। इस विशेष अधिकार के होते हुए जम्मू कश्मीर राज्य पर धारा 356 लागू नहीं होती .इस के साथ ही राष्ट्रपति के पास इस राज्य के संविधान को बखऱ्ास्त करने का अधिकार भी नहीं है। मगर यह बात भी अपनी जगह पर है कि अब धारा 370 पिछले 70 वर्षों में किये गये संशोधनों के कारण पूरी तरह खोखली हो चुकी है।
8 जुलाई 2016 को हिज़्बुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वाणी की फ़ौजियों द्वारा हलाकत ने एक बार फिर कश्मीर में अनिश्चिता को सामने लाया। कश्मीर घाटी में 9 जुलाई2016 से सरकार की तरफ़ से मुसलसल कर्फ़्यू रहा।उधर 9 जुलाई से ही घार्मिक कट्टरवादियों और अलगाववादियों के नेतृत्व में कश्मीर के आम लोग कर्फ़्यू की परवाह किये बिना सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके नतीजे में पिछले लगभग साढ़े चार महीने के दौरान लगभग 100 प्रदर्शनकारी और आम लोग गोलियों और पैलेट गनों से मारे जा चुके हैं। इसी समय के दौरान लगभग एक हज़ार प्रदर्शनकारी घायल भी हुए हैं जिन में लगभग तीन सौ पैलेट लगने से सदैव के लिए आंखों की रोशनी से महरूम हो चुके हैं। पूरी घाटी में कर्फ़्यू और प्रदर्शनों से कोहराम मच गया है और आम लोगों की हालत बहुत ही ख़राब है।
देशद्रोह, विद्रोह, रोष और ऐहतिजाज की मौजूदा लहर दरअसल कश्मीर घाटी में पीडीपी बीजेपी गठबंधन के फौरन बाद से ही आरम्भ हुई। 8 जुलाई को मारे गये मिलिटेंट कमांडर बुरहान वानी के पिछले वर्ष सोशल साइट्स पर खुले तौर पर आने के बाद कश्मीरी युवाओं को जैसे एक हीरो मिल गया। बुरहान वानी पुलवामा ज़िला से सम्बन्ध रखता था जिस कारण यह ज़िला पिछले डेढ़ वर्ष से सुखिऱ्यों में रहा। बुरहान वानी मिलिटेन्सी का एक ऐसा केंद्र बना जिसने कश्मीर के पुलवामा, शोपियां और अंनतनाग ज़िलों के बहुत से युवाओं को अपनी तरफ़ आकर्षित किया। फ़ौजी वर्दी पहने, कभी हाथ में क्लेशिकोफ लिए तो कभी किरकेट बला, फेसबुक पर उसके फोटो अपलोड होते गये और युवाओं की ख़ासी संख्या उसको फॉलो करने लगी। इस दौरान क्षेत्र के दर्जनों युवा घरों से गायब होते गये और उसके केडर में शामिल होते गये। इनके साथियों को मारा भी गया। इस दौरान आम लोगों की तरफ़ से दो नयी चीज़ें सुस्पष्ट तौर पर सामने आती गयी। एक यह कि अब जब भी फ़ौज कहीं मिलिटेंट होने की सूचना पर क्रेकडॉउन करती है, इर्दगिर्द के सभी गांव और मुहल्लों के लोग सुरक्षा कर्मियों पर चारों तरफ़ पत्थर बरसाने शुरु करते हैं। यह सिलसिला तब तक जारी रहता है जब तक न फ़ौजी भाग जायें। इस तरह अक्सर जगहों पर मिलिटेंटों को आम लोगों की खुले तौर पर सहायता मिलती है। दूसरी बात जो पिछले डेढ़ वर्ष से सामने आ रही है यह है कि अब जब भी किसी मिलिटेंट को मारा जाता है उसके निमाज़-ए-जिनाज़ा में भारी संख्या में आम लोग शामिल हो जाते हैं। यहां तक कि सरकारी पाबंदियों को फलांग कर भी।
इस प्रकार का एक दृश्य इसी वर्ष मेरे पड़ोस में स्थित करीम आबाद गांव में पहली बार देखने को मिला जब नसीर पण्डित नामी एक मिलिटेंट के निमाज़-ए-जिनाजा में लगभग 40 हज़ार लोग सरकारी पाबंदियों की परवाह किया बिना शामिल हुए। मिलिटेंटों ने हवा में गोलियां चलाकर उसको सलामी दी और उसी समय जनसैलाब को देखकर लगभग 45 युवा मिलिटेंटों के साथ जाने को तैयार हुए जिनको मिलिटेंटों ने ही अपने कारणों की वजह से रोक लिया। सरकार ने परम्परागत तौर पर इस ख़बर को भी ब्लैकआउट किया लेकिन टस से मस न हुई। मैं चूँकि स्वयं पुलवामा जिला हेडक्वार्टर पर रहता हूं लिहाज़ा मुझे आम लोगों की इन प्रवृतियों, स्वभाव और बदलती दिशा और दशा को देखने और समझने का अवसर मिल रहा है। सरकार आम लोगों में विकसित हो रही इस नकारात्मक प्रवृति और दिशा को उसी तरह नज़रअंदाज़ करती रही जिस तरह वह कश्मीर में आम तौर पर करती आ रही है। इस मिलिटेंट की मौत पर लोगों के रोष से उतेजित होकर इसी गांव के लगभग दो दर्जन युवाओं ने कसाइयों वाले चाक़ू बनवाये और पुलिस पर हमला करने लगे। सरकार फिर भी आम लोगों की इन हरकतों को ननज़रअंदाज़ करती गयी। अंदर ही अंदर देश के खि़लाफ़, व्यवस्था के खि़लाफ़ आम कश्मीरियों का यह गुस्सा, यह रोष, यह विद्रोह अब सड़कों पर उतर आया है।
अब यहां एक मुखर प्रश्न उभर कर सामने आ रहा है कि आम लोगों के इस देशद्रोह, विद्रोह, रोष और ऐहतिजाज का कारण आखि़र है क्या? इसका एक कारण नहीं बल्कि बहुत से कारण हैं। राजनैतिक कारणों की बात फिर कभी करेंगे। एक फौरी कारण यह है कि अक्सर युवा और अलगाववादी जो पीडीपी को अपनी ही पार्टी मानने लगे थे, इसके बीजेपी के साथ गठबंधन से बौखला गये। कश्मीर के आम लोग बीजेपी को एक साम्प्रदायिक, हिन्दू कट्टरवादी, गुजरात के मुसलमानों की क़ातिल और बाबरी मस्जिद को गिराने की ज़िम्मेदार मानते हैं। पीडीपी के इस क़दम ने पूरे हुर्रियत कांफ्रेंस टोले को भी बौखलाया। पीडीपी-बीजेपी गठबन्धन से कश्मीरी युवाओं का एक दूसरा वर्ग यह उम्मीद कर रहा था कि केंद्र सरकार से हाथ मिलाने के बाद कश्मीर में बेरोज़गारी और डवलेपमेंट को एड्रेस किया जायेगा मगर बीजेपी ने कश्मीर को लेकर मुट्ठी बन्द ही रखी जिसका इज़हार पिछले महीनों के दौरान बारहा पीडीपी ने भी किया।
2014 के सैलाब से प्रभावित लोगों की सहायता के हवाले से बहुत सी घोषणाएं की गयी लेकिन ज़मीनी सतह पर उम्मीदों के बिलकुल विपरीत हुआ। उधर बुनियादी वैचारिक मतभेद के चलते पीडीपी बीजेपी में एक अंदरुनी खींचतान भी है। कश्मीर से पलायन कर चुके हिंदुओं के लिए पिछले 27 वर्षों के दौरान दर्जनों रोज़गार, सरकारी नोकरियों और सहायता के पैकेजेज़ मंजूर किये गये जबकि इसके विपरीत पिछले 27 वर्षों से सीधे तौर पर मिलिटेंसी से जूझ रहे कश्मीर के आम लोगों और पढ़े लिखे बेरोज़गार युवाओं के लिए ज़मीनी सतह पर केवल एक स्कीम, प्रधानमन्त्री स्कालरशिप स्कीम को सामने लाया गया और वर्तमान साम्प्रदायिक सरकार ने पिछले दो वर्षों से उसके फंड्स भी बन्द किये। यहां हर रोज़ बड़ी बड़ी डिग्रियां पास करने वाले सैंकड़ों नवजवान ओवरएज (वअमतंहम) हो रहे हैं। यहां प्राइवेट सेक्टर न होने के बराबर है। जम्मू कश्मीर राज्य में प्राइवेट सैक्टर न होने के कारणों और उसमें आर्टिकल 370 की भूमिका की कभी अलग से बात होगी। करप्शन यहां बहुत ज्यादा है और कोई मामूली काम भी सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों की मुट्ठी गर्म किये बिना नहीं होता। आम लोगों के इस विद्रोह को पिछले दो दशक की फ़र्जी झड़पों, फ़ौज और टास्क फ़ोर्स की तरफ से युवाओं को गायब करने की घटनाओं, देशभर में बढ़ रही असहिष्णुता और कश्मीरियों को प्रताड़ित करने और आतंकी समझने की घटनाओं, फ़ौज द्वारा कश्मीर के दो गांव कुन्न-पोशपोरा में लगभग एक सौ कश्मीरी औरतों के साथ हुए बलात्कार की धटना और यहां के राजनेताओं की तरफ से युवाओं को अक्सर नज़रअंदाज़ करना आदि कुछ ऐसे मुख्य कारण रहे हैं जिनकी आड़ लेकर यहां के अलगाववादी और धार्मिक कट्टरवादी आम कश्मीरी युवाओं को इस्तेमाल कर रहे हैं।
देश भर में स्थित कुछ संगठन, समुदाय, गुट, टीवी चेनलें और समाचारपत्र कश्मीर की अनिश्चिता से अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं। ये कश्मीरियों को बदनाम करने, यहां के हालात को साम्प्रदायिक रंग देने और नफ़रत फैलाने का हर सम्भव अवसर इस्तेमाल कर रहे हैं। दुर्भाग्य है कि इन्हें हमारी वर्तमान केंद्र सरकार का संरक्षण भी प्राप्त है। ऐसे लोगों की इन तुच्छ और ज़हरीली हरकतों की रिएक्शन में भी घाटी का युवा वर्ग अलगाववादियों और कट्टरवादियों की झोली में जा गिरता है। इसके साथ साथ पकिस्तान ने भी हमेशा कश्मीरियों को इस्तेमाल करने का पाखण्डी षडयंत्र जारी रखा। सरकार के प्रति वहां के लोगों के आक्रोश को वहां के आम नेताओं ने कश्मीर की तरफ केंद्रित करने के सदैव प्रयत्न किये।
कश्मीर पर हमेशा हमारी हर केंद्र सरकार ने शार्टटर्म स्ट्रेटेजीज इख्तियार की। हमारी हर सरकार ने आम लोगों के देशद्रोह, विद्रोह, आक्रोश आदि को सकारात्मक तौर पर एड्रेस करके बुनियादी कारणों का उपचार करने के बजाय दबाने और कश्मीर के कायर नेताओं से समझौतों पर समझोते करने का ही काम किया। यहां की वर्तमान परिस्थितियों की ही बात करें तो आज तक लगभग 85 लोगों को गोलियों और पेलेटों से मारना, लगभग एक हज़ार आम लोगों को पेलेटगनों से घायल कर देना, मोबाइल, इंटरनेट, केबल नेटवर्क ,समाचार पत्रों पर पाबन्दी लगाकर पूरी घाटी को अलग- थलग करने से भला हालात कैसे सुधर जायेंगे।
ज़रूरत है लोगों की बुनियादी समस्याओं को समझने और कश्मीर समस्या के हवाले से एक लांगटर्म स्ट्रेटेजी इख्तियार करके उसका समाधान ढूंढ़ने की, आम लोगों से नरमी बरतने की और यहां की मुख्यधारा से सम्बंधित पार्टियों की शुतुर्मुर्गी चालों को समझने, अलगाववादियों के साथ साथ जम्मू कश्मीर के सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ बात करने की। यदि फौरन ऐसा न किया गया और फिर से आम कश्मीरियों के गुस्से को बन्दूकों और पैलेट-गनों से दबाने की कोशिश की गयी तो मेरी नज़र में यह हमारे देश की सब से बड़ी भूल होगी।

संपर्कः डॉ. निदा नवाज़, निकट टेलीफ़ोन एक्सचेंज,
एक्सचेंज कालोनी, पुलवामा कश्मीर-192301