दुनिया में विकास राग का धमाल

पूंजीवादी साजिशों का शिकार समाजवाद

-ओम सैनी-

-ओम सैनी-

रूस के राष्ट्रपति पुतिन चाहते हैं कि रूस को ‘सोवियत संघ’ वाली गरिमा प्राप्त हो जाये। विश्व में पुनः पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्था की प्रतियोगिता हो। वह स्थान हासिल हो जाये जो ‘सोवियत संघ’ को प्राप्त था। लेकिन पूंजीवादी साजिशों के चलते क्या यह सम्भव हो पायेगा। मिखाइल गोर्बाचोव ने अपनी पुस्तक ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका के माध्यम से ‘सोवियत संघ’ को महज ‘रूस’ में बदल कर रख दिया। उधर चीन ने आर्थिक उदारीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था का रास्ता अपना लिया और ‘सामूहिक अर्थव्यवस्था पद्धति’ को ‘वैयक्तिक अर्थव्यवस्था पद्धति’ में बदल दिया। प्रस्तुत लेख में वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी सामाजिक व्यवस्था के पैरोकार ओम सैनी ‘भूमंडलीकरण’ के कारण अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई के प्रति वैश्विक चिंता व्यक्त कर रहे हैं।-सम्पादक
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अर्थशास्त्र की दुनिया में पूंजी के उन अनुयाईयों के लिए संकट पैदा हो गया है जो आधुनिक अर्थशास्त्र को मात्र पूंजी के ओर-छोर तक सीमित रखना चाहते हैं। मार्शल जैसे अर्थशास्त्रियों ने इसे मानव कल्याण से जोड़कर पूूंजी के संचयकर्ताओं के लिए संकट पैदा कर दिया है। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बहुरुपियों की तरह विकास राग गा रहे हैं। विश्व के अलग-अलग आर्थिक स्कूलों से इसका संचालन हो रहा है। बहरहाल रूस की समाजवादी क्रांति ने इस राग के बेसुरेपन को उजागर किया है। रूस में समाजवादी क्रांति का ही निष्पादन रूस की आबादी के विशाल बहुमत के समर्थन और सक्रिय शिरकत से हुआ था। इस क्रांति के खिलाफ आवाज उठाने वालों में आर्थाेडॉक्स एवं कैथोलिक चर्चाें के पादरियों के साथ-साथ खुदा की इबादत तय करने वाले मुल्ला और रूस के पूर्वी सीमावर्ती जातीय इलाकों के सामंती और अर्द्धसामंती ग्रामीण पूंजीपति शामिल थे। इस आंतरिक विद्रोह से इन्सानी तरीकों से निपटा गया लेकिन बाहरी हस्तक्षेप शत्रुतापूर्ण था। सी.डी. हेजन जैसे इतिहासकारों ने बॉलशेविक क्रांति को ‘मित्र राष्ट्रों’ की निगाह से ही दर्ज किया है। रूस पर हुए हमलों को उन्होने विश्व के सत्तारूढ़ वर्गों का आक्रमण नहीं माना, हालांकि विंस्टन चर्चिल ने अनेक बार यह स्वीकार किया कि उसका उद्देश्य ‘‘जन्म से ही बॉलशेविज्म का गला घोंट देना’’ था। सारी दुनिया में क्रांतिकारी आन्दोलन के फैलने से साम्राज्यवादी क्षेत्रों में बड़ी घबराहट फैल गयी थी और वे समझने लगे थे कि रूस का उदाहरण कथित विश्व शांति के लिए खतरनाक है। सोवियत विरोधी हस्तक्षेप में कुल मिलाकर 14 देशों ने हिस्सा लिया था। इनमें बुनियादी भूमिका संयुक्त राज्य अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, और जापान ने अदा की थी।
गौरतलब है कि अक्टूबर क्रांति से बहुत पहले वैज्ञानिक साम्यवाद के सिद्धांतकारों ने चेता दिया था कि सर्वहारा वर्ग के सत्ता धारण कर लेने के बाद पुराने समाज को नये समाजवादी समाज में बदलने में काफी समय लगेगा। उनके अनुसार इसके लिए संक्रमणकाल की जरूरत पड़ेगी, जिसके दौरान मजदूर वर्ग अपनी सत्ता को सुदृढ़ बनायेगा, निजी सम्पत्ति तथा मानव द्वारा मानव का शोषण का अंत करेगा। सन् 1917 में सोवियत संघ की श्रमजीवी जनता ने लेनिन के नेतृत्व में समाजवादी औद्योगीकरण, कृषि के समूहीकरण की नीति पर अमल किया तथा एक सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया, और चौथे दशक के मध्य तक उनके देश में पूंजीवाद पर समाजवाद की विजय पूरी हो चुकी थी। इतिहास में पहली बार मजदूरों और किसानों के बहुजातीय समाजवादी राज्य की स्थापना हुई।
चौथे दशक के मध्य में सोवियत संघ संसार में सबसे बड़ा देश था, जो जनसंख्या की दृष्टि से चीन और भारत के बाद संसार का तीसरा सबसे बहुसंख्यक देश था। देश अब विदेशी और देशी पूंजी के प्रभुत्व से आजाद हो चुका था। औद्योगिक माल की पैदावार की मात्रा के हिसाब से सोवियत संघ का स्थान तब संसार में संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद, दूसरा हो गया था।
सोवियत अर्थव्यवस्था की मौलिक विशेषता न तो केवल बड़े पैमाने पर उसकी वृद्धि और न उसके विस्तार की अभूतपूर्व गति थी। यह विशेषता थी सोवियत अर्थव्यवस्था के गुणात्मक परिवर्तन को जिसने समाजवादी अर्थव्यवस्था का रूप ग्रहण कर लिया था। देश के अन्दर आर्थिक प्रतियोगिता में समाजवाद ने अन्य सभी आर्थिक व्यवस्थाओं पूंजीवादी तथा लघु माल उत्पादन, आदि पर विजय प्राप्त कर ली थी। सन् 1924 में प्रति 100 रूबल राष्ट्रीय आय में अर्थतंत्र के समाजवादी क्षेत्र का भाग केवल 35 रूबल था। मगर 1937 तक उसका भाग 99 रूबल हो गया था। राष्ट्रीय आय के सृजन में राजकीय उद्योग तथा मजदूर वर्ग की भूमिका अब निर्णायक हो गयी थी।
दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर और मुसोलिनी की फौजों को खदेड़ने और मित्र राष्ट्रों के मुकाबले सोवियत सेनाओं को त्याग की मिसाल बनाया है। विकास के हर पैमाने पर साम्यवादी रूस ने पूंजीवादी राष्ट्रों को पीछे छोड़ा। बहरहाल समाज के विकास का रास्ता जिस अनुशासन की अपेक्षा रखता था वह स्टालिन की मृत्यु के बाद कमजोर पड़ता गया। पिछली सदी के समापन से पूर्व 80 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव मिखाइल गोर्बाचोव की पुस्तक ‘पेरेस्त्रोइका’ बाजार में आयी। गोर्बाचोव ने अपनी पुस्तक के माध्यम से दो नारे -खुलापन ( ग्लास्नोस्त) और पुनर्निमाण (पेरेस्त्रोइका) उछाले थे। इन दोनों नारों को उन्होंने समान संस्कृति, समान सभ्यता और इतिहास जैसे सहयोगी नारों को सजा कर उछाला था। उन्होनें पेरेस्त्रोइका के माध्यम पूंजीवादी देशों को स्पष्ट संकेत एवं संदेश दे दिये थे कि अब पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के बीच मौजूद परम्परागत् शत्रुतापूर्ण अन्तर्विरोधों का युग समाप्त हो चुका है। गोर्बाचोव ने दर्ज किया कि दोनों समाजांे की समान संस्कृति, समान नस्ल या जातीयता और समान यूरोपीय घर है। इस सौहार्दपूर्ण परिवेश में ‘मित्रतापूर्ण अन्तर्विरोधों’ के लिए कोई स्थान नहीं है। यानी गोर्बचोव ने ‘वर्ग अन्तर्विरोध’ एवं ‘वर्ग संघर्ष’ की वर्तमान व भावी भूमिका को ही अलविदा कह दिया।
भारतीय पत्रकार रामशरण जोशी ने प्रकरण से जुड़े बेहतर सवाल किये है। यह सवाल करते हैं कि क्या येल्तसिन और ब्लादीमीर पुतिन के रूस में सोवियत संघ की तुलना में इंसान की जिंदगी बेहतर हुई है? क्या ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका का अलाप लगाने के बाद रूस पश्चिमी शिविर के साथ समान घर सजा सका? इस दौर में ऐसा कुछ भी नहीं है। उत्तर सोवियत रूस में भुखमरों की तादात बढ़ी है, पश्चिमी मीडिया के मुताबिक वेश्यावृत्ति का विस्फोट हुआ है, बाल यौन शोषण बढ़ा है, समाज का अपराधीकरण हुआ है और माफिया सत्ता के सामने क्रेमलिन सत्ता लाचार दिखायी दे रही है। अपहरण, हत्या, बैंक डकैतियां जैसी घटनाएं मास्को की जीवन शैली का हिस्सा बन चुकी है।

दरअसल पूंजीवादी मुल्क अपने निश्चित लक्ष्य उद्देश्यों के साथ एक साझा स्वप्न पालते हैं। इस स्वप्न में पूंजीवाद की रक्षा के लिए एक अभेद दीवार निर्माण करने का काम जारी है। विखंडित रूस की ईंटें इस दीवार का हिस्सा है और गोर्बाचोव की पेरेस्त्रोइका का प्रकाशन इसका सीमेंट है। सोवियत सत्ता के अंत के साथ ही भूमंडलीकरण, उदारीकरण, बाजार सुधार, विश्व का एकल ध्रुवीकरण जैसी प्रक्रियाएं प्रारम्भ हुई हैं।
गोर्बाचोव की पेरेस्त्रोइका से पूंजीवादी व्यवस्था का पुनर्निर्माण होने का एहसास होता है। विशेष रूप से स्टालिन, हो ची मिन्ह और माओ जैसे नेताओं के लोप हो जाने के बाद समाजवादी राजसत्ताएं नये अन्तर्विरोधों और चुनौतियों की पहचान में पूरी तरह से विफल रही। उन्हें यह दिखायी नहीं दिया कि 20वीं सदी के उत्तरार्ध का पूंजीवाद हैमबर्गर, पिज्जा, फ्राइड चिकन जैसी मामूली चीजों पर सवार होकर क्रेमलिन की दीवारों को हिला सकता है। मसलन क्या यह सही नहीं है कि 1992 में जब तत्कालीन सोवियत संघ की संसद को जनता ने घेर रखा था तब बहुराष्ट्रीय रेस्तरां मैकडोनाल्ड ने हैमबर्गर के हजारों पैकेटों की बरसात भीड़ पर करवायी थी। भीड़ उन पर टूट पड़ी थी और गोर्बाचोव के खून की प्यासी हो गयी थी। यह हैमबर्गर प्रतीक था उपभोक्तावादी संस्कृति का। पंूजीवाद जानता है कि समाजवाद को शस्त्रों से नहीं, उपभोक्तावाद और प्रौद्योगिकीवाद से जरूर परास्त किया जा सकता है।
इसके अलावा समाजवादी देशों के सत्ताधीशों और जनता के बीच दूरी भी बढ़ती जा रही थी। एक नया शासक वर्ग पैदा होने लगा था। क्रांतिकारी इतिहास का नेतृत्व करने के लिए औसत कद का शासक वर्ग जो पूंजीवादी शासक वर्ग की तुलना में बेहद पिछड़ा हुआ था। इसके पास नयी दृष्टि नहीं थी। उसकी उपचेतना में पूंजीवाद एक ‘रोल मॉडल’ के रूप में उभरने लगा था, जिसकी परिणति ग्लास्नोस्त व पेरेस्त्रोइका में देखी जा सकती थी। सोवियत संघ सहित समाजवादी देशों का बाजारमुखी चेहरा उस मौके पर नजर आ गया था, जब अमरीका और उसके मित्र देशों के विमानों ने इराक पर राकेट बरसाये थे, मास्को, वारसा, प्राग, बुडापेस्ट, आदि खामोश रहे तथा एकल धु्रवीय शक्तितंत्र का उदय देखते रहे। इन हमलों से सद्दाम हुसैन नहीं हारा था, बल्कि क्रेमलिन शासक वर्ग परास्त हुआ था। इसके साथ शुरू हुई नव पूंजीवाद की विजय यात्रा। उपभोक्तावाद के आक्रमणों को समझने और उनका प्रतिरोध करने के लिए जरूरत थी एक नयी रणनीति की, लेकिन समाजवाद के लड़ाके म्यानों तक सीमित रहे। शत्रु पर वार करने के लिए म्यानों से ही तलवारों को काम होता रहा है।

अब वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन चाहते हैं कि रूस को ‘सोवियत संघ’ वाली गरिमा प्राप्त हो जाये। विश्व में पुनः पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्था की प्रतियोगिता हो। वह स्थान हासिल हो जाये जो सोवियत संघ को प्राप्त था। इस मकसद को हासिल करने के लिए पुतिन ने चीन, जापान, ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका के साथ नये ढंग के समीकरण स्थापित कर रहा है। सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी का समर्थन संभवतः इसी कारण हो रहा है।
बहरहाल लाख टके का सवाल है क्या रूस पुनः सोवियत संघ बनने का ख्याल करेगा। शायद कभी नहीं। यही हाल जनवादी चीन का रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 16वीं कांग्रेस (2002) के प्रस्तावों ने सारी दुनिया को चौंका दिया। इसके निर्णय माओवादी क्रांति और मार्क्सवाद के प्रचलित सिद्धांतों के विपरीत हैं। इस कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया कि अब चीन में निजी सम्पत्ति सुरक्षित रहेगी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अलका आचार्य चीनी मामलों की विशेषज्ञ हैं। उनके अनुसार अर्थशास्त्रियों की राय है कि वैश्वीकरण और उदारीकरण को अपनाये बिना किसी भी देश का आज के विश्व में आर्थिक विकास सम्भव नहीं है। सम्भवतः चीन ने इसीलिए उदारीकरण और मुक्त बाजार व्यवस्था को स्वीकार किया।
सन् 2001 में चीन ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) के मसौदे पर हस्ताक्षर कर अपना विशाल बाजार विश्व के लिए खोल दिया। हालांकि माओत्से तुंग के निधन के बाद 1978 में देंग जियाओपेंग के नेतृत्व में चीन ने आर्थिक उदारीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था का रास्ता अपना लिया था। इसे चीनी अर्थशास्त्रियों ने ‘बाजार सुधार’ का नाम दिया था। शुरू में कृषि क्षेत्र से सरकारी नियंत्रण हटाकर किसानों को अपनी मर्जी के कृषि उत्पाद उगाने की छूट दी गयी यानी ‘सामूहिक अर्थव्यवस्था पद्धति’ को ‘वैयक्तिक अर्थव्यवस्था पद्धति’ में बदल दिया गया। सरकार ने अनाज के दाम बढ़ा दिये, फलतः अन्न उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि हुई, जिससे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 60 फीसदी तक पहुंच गया। इस प्रकार चीन में कृषि से आर्थिक सुधारों के अनुकूल प्रभावों ने सामूहिक मानसिकता को वैयक्तिक बनाने का अध्याय प्रारम्भ किया।
वर्ष 1985 के आसपास अर्धशहरी इलाकों में उद्योगों के विकास के लिए चीन की सरकार ने विदेशी पूंजी को आमंत्रित किया। प्रो. आचार्य के मुताबिक इसके लिए सबसे पहले वहां आर्थिक जोन बनाये गये, जहां विदेशी पूंजी की सहायता से आंतरिक संरचना को दु्रुस्त किया गया, विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए करों में ढील दी गयी और श्रमिकों का प्रवाह इन क्षेत्रों में बढ़ाया गया। उद्योगों में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी निवेश शुरु हुआ और परिणाम काफी सकारात्मक आये। विभिन्न तरह के उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा, लेकिन चीन ने सबसे पहले अपने उत्पाद को विदेशों मेें भेजना शुरु किया, निर्यात को बढ़ावा देते हुए आयात को प्रतिबंधित रखा गया। इससे चीन के घरेलू उत्पाद खूब फले-फूले।
नब्बे के दशक में निर्यात प्रक्रिया बढ़ी तो विश्व में निर्यात करने वाले देशों में 30वें स्थान पर रहने वाला चीन 11वें स्थान पर आ गया। विश्व के कुल व्यापार में 0.2 प्रतिशत से बढक़र 3.4 फीसदी हो गया। व्यापार के रास्ते हुए चीनी नेतृत्व ने दो नारे दिये- ’धनी होना पाप नहीं है’ और ‘बिल्ली चाहे सफेद हो या काली, जब तक चूहे मारती है’ ठीक है। अपने चलन को चीन ने बाजारवादी समाजवाद की संज्ञा देते हुए विकास दर 2010 तक 9.5 फीसदी तक हासिल की। बहरहाल आंकड़े यह भी बताते हैं कि उदारीकरण और आर्थिक सुधार प्रक्रिया को अपनाने के बाद 10 करोड़ लोग बेरोजगार हो गये हैं। गरीब और धनी के बीच खाई बढ़ी है। भ्रष्टाचार और अपराध बढ़े हैं।
सत्ताधारी वर्ग की रणनीति विश्व इतिहास में ऐसी रही है कि वह सार्वजनिक मुखौटा उदार और व्यापक बनाये रखना चाहता है, जबकि उसके असली इरादे शोषणमूलक और वर्चस्ववादी होते हैं। भूमंडलीकरण का भी यह आम सिद्धांत है कि जैसे-तैसे इसकी रफ्तार तेज होगी और आय के नये स्रोत का सृजन होगा तो धीरे-धीरे आय का रिसाव सामाजिक व्यवस्था के निचले वर्गाें तक भी होगा। इस तरह कुछ देर से ही सही, भूमंडलीकरण का फायदा गरीबों को भी होगा। दरअसल, बगैर समाज के निचले वर्गाे के बहुसंख्यक लोगों के हित को अपनी सैद्धांतिक परिधि में समाहित किए कोई भी विचारधारा सत्ता की नीति बन ही नहीं सकती। इसलिए सत्ता सबको साथ लेकर चलने और सबसे हित में काम करने की बात करती है।
भूूमंडलीकरण के पैरोकार अगर गरीबी दूर करने या भूमंडलीकरण के मानवीय चेहरे की बात करते हैं। उन्हें अब यह मानना पड़ रहा है कि ‘भूमंडलीकरण’ के कारण अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ रही है, जिसे पाटने के लिए ‘सुरक्षा छतरी’ बनाने आदि कुछ विशेष तरह के प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन इसे उनकी बौद्धिक ईमानदारी का सूचक या आत्मग्लानि का परिणाम मान लेना बड़ी भूल होगी। वास्तव में शोषणमूलक पूूंजीवाद के नकारात्मक प्रभावों को कल्याणकारी राजनीतिक के छद्म आवरण धारण करने की पुरानी कुटिल साजिश है, जिसे कि उन्हें लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवेश के दबाव के कारण मजबूरी में अपनाना पड़ता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि पूंजीवादी सत्ता की इन साजिशों को समझने और उनकी स्वतंत्र व मुखर आलोचना के द्वारा प्रतिरोध कर सकने की सम्भावनाएं क्षीण हो रही है।