कश्मीरः उम्मीद की आरजू में

Rekha Chaudhary DR Jammu
क्या कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कोई उम्मीद है? क्या हम ऐसी स्थिति की परिकल्पना कर सकते हैं जिसमें भारतविरोधी भावनाओं की जगह भारतीय राष्ट्र के साथ समरसता की भावना स्थान ले सके। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि कश्मीरी अवाम भारत के साथ जुड़ने या जुड़े रहने में गौरव महसूस करेंगे? जम्मू विश्वविद्यालय की भूतपूर्व आचार्य एवं राजनीतिशास्त्र विभाग की प्रमुख डॉ. रेखा चौधरी ने उठाये हैं, ये सवाल। कश्मीरियों को शिकायत है कि भारत के लिए कश्मीर महज भौगोलिक इकाई है। भारत की चिन्ता कश्मीरियों के बजाय कश्मीर है। डॉ. रेखा चौधरी का मानना है कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की ‘इंसानियत, जम्हूयित और कश्मीरियत’ की नीति को अपनाकर आज भी कश्मीरियों का दिल जीता जा सकता है। अटलजी ने जो विश्वास कश्मीरियों के दिलों में जगाया था, उसे फिर से बहाल करना होगा।-सम्पादक
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तीन महीने से ज्यादा समय हो गया, कश्मीर सुलग रहा है। सुरक्षा बलों द्वारा हिज्बुल मुजाहिदीन के तथाकथित कमाण्डर बुरहान वानी की एक एनकाउंटर में मौत के बाद जो अशांति का माहौल बना, उसका असर सारी घाटी में यकसां हुआ है। हालांकि इस अशांति का केन्द्र दक्षिण कश्मीर, खास तौर पर अनंतनाग जिला था लेकिन इससे पूरा कश्मीर प्रभावित हुआ। पूरा कश्मीर थम सा गया। वहां सभी नागरिक सुविधाएं और गतिविधियां समाप्तप्रायः होगयी। व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद होगये। आवागमन के साधन बंद होगये तो सभी सामान्य व्यापार बंद होगये। स्कूल कॉलेज बंद होगये। बच्चे अपने ही घरों में कैद होकर रह गये। सभी ओर भारतविरोधी वातावरण बन गया। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जिन लोगों ने मात्र दो वर्ष पूर्व अलगाववादियों द्वारा चुनाव बहिष्कार करने के आह्वान को ठुकरा कर पूरे उत्साह के साथ बड़ी संख्या में मतदान में हिस्सा लिया था, आज वे ही लोग अलगाव की बात करने लगे हैं। पत्थरबाजी से सोशियल मीडिया भी आम कश्मीरी विरोध का स्वर तेज कर रहा है।

आखिर कश्मीर में हो क्या होगया? यह एक लम्बी कहानी है। शायद आज के कश्मीर की घटनाओं के सूत्र 1989-90 के समय में ढूंढे जासकते हैं, जब अलगाववादियों ने सिर उठाना शुरू किया था। उस समय कश्मीरी नौजवानों ने बड़ी संख्या में हिंसा का रास्ता अपनाया और मिलिटेंसी के युग का प्रारम्भ हुआ। पाकिस्तान के सहयोग और उकसाने से अगले दो दशकों तक मिलिटेंसी चलती रही।

स्थानीय लोगों की सहायता से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अपने मिलिटेंट संगठनों के माध्यम से मिलिटेंटों में जिहाद की भावना भरी। प्रारम्भ में इन खाड़कूओं को कश्मीरी जनता से सदभावना मिली लेकिन धीरे धीरे इनके प्रति भ्रम टूटा और सन 2000 के आते आते विदेशी ही नहीं स्थानीय खाड़कुओं को भी जनता का सहयोग मिलना कम हो गया। ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन ने मिलिटेंटों का विराध किया तो उनको इसकी कीमत अपनी जान देकर गंवानी पड़ी। सन 2002 में मिलिटेंटों ने उनकी हत्या करदी। लेकिन इसके बाद मिलिटेंटों को मिलने वाली सहायता और सहयोग में कमी आने लगी और अगले कुछ ही सालों में कश्मीर की अलगाववादी राजनीति मे इन ताकतों का प्रभाव घटने लगा।

कश्मीर में एक तरफ मिलिटेंसी की घटनाओं में कमी आने लगी तो अलगाववादी राजनीति भीतर भीतर ही पनपती रही। समय समय पर गम्भीर आन्दोलन होते रहे। 2008-2010 के कालखण्ड में कश्मीर की स्थिति बहुत ही अस्थिर और आन्दोलनकारी थी। 2008 में अमरनाथ मन्दिर प्रबंधन बोर्ड को भूमि आवंटन मामले को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ। सन 2008 और 2009 की गर्मियों में आंदोलन में तेजी आयी। सन 2010 में पांच महीने तक आंदालन चला। अब 2016 में अलगाववादी भावनाओं में उभार आया है। अब तो यह आंदोलन शहरों और कस्बों की सड़कों से दूरदराज के गांवों की गलियों तक फैल गया है।

क्या कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कोई उम्मीद है? क्या हम ऐसी स्थिति की परिकल्पना कर सकते हैं जिसमें भारतविरोधी भावनाओं की जगह भारतीय राष्ट्र के साथ समरसता की भावना स्थान ले सके। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि कश्मीरी अवाम भारत के साथ जुड़ने या जुड़े रहने में गौरव महसूस करेंगे?
आज के माहौल में जब कश्मीर में आजादी के नारे लगाये जारहे हैं, और पत्थरबाजी करने वाले नौजवान अपनी भारतविरोधी भावनाओं को खुले आम प्रदर्शित कर रहे हैं, यह समझना दूर की कौड़ी है कि वे भारत के साथ जुड़े रहने का कोई प्रयत्न भी करेंगे।

वैसे यह भी एक सच्चाई है कि कश्मीर का भारत के साथ जुड़ना एक सकारात्मक रुख के कारण था। यहां यह बताना समीचीन होगा कि भारत की सभी राजशाहियों ने जब भारत के साथ बने रहने का समझौता किया था सिर्फ जम्मू कश्मीर का राज्य था जिसकी जनता भारत के साथ रहना चाहती थी।

कश्मीर आंदोलन के तत्कालीन लोकप्रिय नेताओं ने पाकिस्तान के स्थान पर भारत के साथ विशेष समझौते के तहत जुड़ना स्वीकार किया था। यह हुआ, इस सच्चाई के बाद, कि कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत था और पाकिस्तान उस समय मुसलमानों का वतन था। शेख अब्दुल्ला, जो उस समय सबसे लोकप्रिय नेता थे, ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘‘पाकिस्तान का धर्म आधारित तर्क कश्मीरियों को स्वीकार नहीं, क्योंकि कश्मीरियों की रुचि अपनी आर्थिक सुदृढ़ता और भूमि सुधारों में हैं।’’

1944 में नेशनल कांफ्रेंस ने ‘नये कश्मीर का घोषणापत्र’ अपनाया जो संगठन के सामाजिक आर्थिक बदलाव और किसानों, दस्तकारों और श्रमिकों के उत्थान की विचारधारा की रूपरेखा थी। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निश्चय ही पाकिस्तान विकल्प नहीं हो सकता था। शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में लिखा है कि ‘‘नेशनल कांफ्रेंस के लोगों में यह भावना थी कि मुस्लिम लीग में हमेशा ही सामंती ताकतें हावी रही हैं। उन्हें कश्मीर की आम जनता का ‘नये कश्मीर’ का सपना स्वीकार नहीं है। वे कश्मीरी आमजन को गुलामी की ज़जीरों के शिकंजे लगातार जकड़े रखना चाहते हैं।’’ शेख का मानना था कि ‘‘भारत में कई दल और व्यक्ति हैं जो हम जैसा साचते हैं। हम भारत को स्वीकार कर क्या अपने उद्देश्य को पाने के नज़दीक नहीं होंगे?’’

शेख अब्दुल्ला के अनुसार ‘‘भारतीयों और कश्मीरियों आंदोलनों के आदर्शों के बीच कई समानताएं हैं।’’ शेख ने स्वीकार किया कि ‘‘कश्मीर के आंदोलन पर भारत के आंदोलन का प्रभाव रहा है।’’ 2 सितम्बर 1947 को एक रेडियो प्रसारण में शेख ने इन समानताओं का जिक्र इस प्रकार कियाः

‘‘हमने सदैव ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति अपने आभार को प्रकट किया है क्योंकि इससे हमें अपनी आज़ादी की लड़ाई के लिए प्रेरणा मिली है। इस आंदोलन में हमारी शिरकत के कारण हमें कई आजमाइशों से गुज़रना पड़ा है और कुर्बानियां भी देनी पड़ी है। इन आदर्शों और राजनैतिक उद्देश्यों ने हमें गम्भीर संकट के समय में भारत के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया है, ख़ास तौर पर जब हमें भौगोलिक और राजनैतिक रूप से अलग थलग करने की कोशीशें की गयी।’’

भारत ने कश्मीरी नेतृत्व की राजनैतिक संवेदनाओं को सदैव ही प्रभावित किया है। इसके कई कारण हैं- कश्मीर की जनता का धर्मनिरपेक्ष स्वभाव जो बहुलतावादी समाज के अनुकूल है, भारतीय प्रजातंत्र के वायदे में विश्वास, राजनैतिक और सामाजिक भिन्नता का वादा, सामाजिक बदलाव की प्रगतिशील राजनीति के आदर्श की प्रतिबद्धता। कश्मीर की पृथक पहचान को बनाये रखने और भूमि सुधार में क्रांतिकारी बदलाव के लिए भारत के साथ सम्पर्क और सहयोग जरूरी है। भूमि सुधारों के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ही नेशनल कांफ्रेंस ने 1948 से 1950 के बीच कई कानून बनाये।

इन कानूनों के कारण ही नेशनल कांफ्रेंस ग्रामीण किसानों से अपने सम्बन्धों को सुदृढ़ कर सकी थी। इन कानूनों ने कश्मीरी अवाम का ध्यान धार्मिक से आर्थिक मुद्दों की तरफ मोड़कर कश्मीरी राजनीति को सार्थक और राजनैतिक रूप से प्रभावोत्पादक चरित्र प्रदान किया। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह कश्मीर का भारत से जुड़ाव मजबूत होने में सहायक रहा।

शेख अब्दुल्ला की कश्मीर की संविधान सभा में की गयी टिप्पणी से यह स्पष्ट परिलक्षित होता हैः

‘‘एक राज्य की हैसियत से हमारी मुख्य चिन्ता व्यापार और कृषि को लेकर है। जैसा आप जानते हैं और मैंने पहले भी बताया है, हमने ‘जो जोते उसकी जमीन’ के कानून को बनाया है और यह काफी सफल भी रहा है। कृषक के लिए भूमि अनमोल वरदान है जिसे उसने शताब्दियों से भूस्वामियों के दासत्व में रहते हुए निभाया है। वर्तमान परिस्थितियों में में हम इन सुधारों को ला पाये हैं।’’

शेख साहब मानते थे कि ऐसे क्रांतिकारी सुधार पाकिस्तान के साथ जाने पर सम्भव नहीं थे। उन्होंने सवाल खड़ा किया किः

‘‘क्या हमें विश्वास है कि जमीदारों को पाकिस्तान में जो सामंती अधिकार मिले हुए हैं, उनके चलते हमारे आर्थिक सुधारों को स्वीकार किया जाता। हमें मालूम है कि हमारे भूमि सुधारों की खबर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के किसानों तक पहुंच चुकी है और वे भी ऐसे ही सुधार वहां भी चाहते हैं।’’

भूमि सुधारों के अलावा धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र ने कश्मीरी अवाम को भारत की ओर आकृष्ट किया। शेख अब्दुल्ला ने भारत के धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र में अपना विश्वास प्रकट किया और महसूस किया कि कश्मीरी धर्म आधारित दो राष्ट्र के सिद्धांत को नकार कर भारत में आश्वासित होंगे। शेख का धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र में विश्वास उनके निम्नांकित शब्दों में परिलक्षित होता हैः

‘‘राज्य के वास्तविक चरित्र का पता उसके संविधान से चलता है। भारत के संविधान ने देश के सामने न्याय, स्वतंत्रता और बिना किसी भेदभाव के समानता के आधार पर धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र का लक्ष्य रखा है। यह आधुनिक जनतंत्र का आधार है। इससे इस तर्क को मजबूती मिलती है कि कश्मीर के मुसलमानों को भारत में, जहां हिन्दुओं का बहुमत है, सुरक्षा मिलेगी। धार्मिक समूहों के बीच किसी भी प्रकार का अस्वाभाविक मतभेद साम्राज्यवाद की विरासत है और कोई भी आधुनिक राज्य, यदि उसे तरक्की और समृद्धि चाहिए तो, ऐसे किसी कृत्रिम विभाजन को प्रोत्साहित करना बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारतीय संविधान ने धर्म आधारित राज्य को अंततः पूरी तरह से नकार दिया। सभी नागरिकों के लिए धर्म, रंग, जाति और वर्ग निरपेक्ष समान अधिकार की गारंटी ने मध्ययुगीन सोच को पीछे छोड़ दिया।’’

हमें यह याद रखना चाहिए कि भारत के साथ कश्मीर का रिश्ता किस बुनियाद पर शुरू हुआ था। यह महत्वपूर्ण है। कश्मीरियों ने ‘भारत की अवधारणा’ को स्वीकार किया था। इसी अवधारणा के चलते ही शेख साहब ने घोषणा की थी कि वे भारत के साथ जुड़ने में गर्व महसूस करते हैं। उनका कहना था कि, ‘‘हमें भारत के साथ अपने जुड़ाव पर गर्व है। भारतीय अवाम और सरकार की साख और सद्भाव हमें सतत और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।’’

जब हम भारत के प्रति आश्वासित थे, पाकिस्तान हमारे सामने एक आक्रांता के रूप में था। 1947 में जब कबाइलियों ने पाकिस्तानी फौजों के समर्थन से आक्रमण किया तब कश्मीरियों को बड़ी नाराजगी हुई। यही कारण था कि शेख अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में सर्वश्रेष्ठ बचाव किया। उन्होंने बहुत दृढ़तापूर्वक स्पष्ट शब्दों में कहा कि, ‘‘कश्मीर कानूनी और संवैधानिक रूप से भारत संघ के साथ सम्मिलित हो चुका है और पाकिस्तान को इस सम्बन्ध में सवाल उठाने को कोई अधिकार नहीं है।’’

भारत और पाकिस्तान में जो सबसे बड़ा फर्क है वह यह कि पाकिस्तान ने कश्मीरियों की आकांक्षाओं की ओर ध्यान दिये बगैर कश्मीर पर धर्म के आधार पर दावा किया और पाकिस्तान का नेतृत्व येनकेन प्रकारेण कश्मीर पर कब्जा करना चाहता था। दूसरी तरफ भारतीय नेतृत्व ने स्थानीय आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशीलता प्रकट की और कश्मीरियों को इस सम्बन्ध में बातचीत करने की स्वतंत्रता भी दी। कश्मीर का भारत के साथ सम्बन्ध ‘विचारों की समानता’ के अतिरिक्त बातचीत और साझेदारी के आधार पर था।

विलय के प्रारम्भिक समय से हम बहुत आगे निकल आये हैं। बदलते समय के साथ कश्मीर की मानसिकता में बदलाव आया और धीरे धीरे अलगाव की भावना घर करने लगी। 1953-1975 के समय से इसकी शुरुआत हुई और 1989-90 में इस भावना में गहनता आयी। कश्मीर में प्रजातांत्रिक माहौल का अभाव, राज्य की राजनीति में केन्द्र का हस्तक्षेप और राज्य की स्वायत्तता का क्षरण, राज्य में अलगाववादी राजनीति के विस्तार के कुछ मुख्य कारण बताये जाते हैं। तथापि भारत के सामने कश्मीर में मुख्य चुनौती विश्वास की कमी है। कश्मीर में एक भावना प्रबल है, वह है स्वामित्व की भावना। कश्मीरी कहते हैं कि भारत उनका नहीं है तो दूसरी ओर भारत कश्मीरियों को अपना नहीं मानता। कश्मीरियों को शिकायत है कि भारत के लिए कश्मीर महज भौगोलिक इकाई है। उसकी चिन्ता कश्मीरियों के बजाय कश्मीर है।
क्या कश्मीरियों की स्वामित्व की भावना कश्मीरियों का सोच बदल सकती है। क्या भारत के नेतृत्व का जनसरोकारी दृष्टिकोण कश्मीर के लोगों में भारत के प्रति अविश्वास को कम कर सकता है और क्या कश्मीरियों को मुख्यधारा में लाने में सहायक होगा। आज की परिस्थिति में यह शायद हमारी कल्पना से परे होगा, लेकिन करीब डेढ़ दशक पूर्व, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में, इस दिशा में प्रयोग किया गया था और कुछ हद तक सफल भी हुआ। जनसरोकारी पहल से शांति प्रयास, सम्वाद के माध्यम से समस्याओं की राजनैतिक दृष्टि से पहचान, विश्वास बहाली के उपाय जैसे कई प्रयत्नों ने कश्मीर की राजनीतिक दिशा में बदलाव किया।
अटलजी के शांति प्रयासों के समय को ‘उम्मीद का समय’ कहा जा सकता है। यह वो समय था जब कश्मीरियों की हर मामले में प्रतिक्रिया, एक बड़े बदलाव के दौर में थी। कश्मीरियों ने आतंकवाद को नकार दिया था और 1990 की परिस्थितियों से एक सम्मानजनक विदाई चाहते थे। भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से वाजपेयीजी ने कश्मीरियों के साथ राजनैतिक सम्वाद की शुरुआत की।
उनके ‘इंसानियत, जम्हूयित और कश्मीरियत’ के मंत्र को कश्मीरजनों ने स्वीकार भी किया और शांति प्रयासों में विश्वास भी प्रकट किया। यही वो समय भी था जब जनतांत्रिक माहौल को प्रगति मिली। वाजपेयी ने 2002 के विधानसभा चुनावों के पहले ही ‘फ्री और फेयर’ चुनावों का वादा किया। नतीजतन लोगों ने मुख्यधारा की राजनीति के प्रति न केवल सकारात्मक प्रतिक्रिया दी बल्कि शासन की राजनीति को वैधता भी दी। आतंक के प्रारम्भ के समय में जिस जनतांत्रिक माहौल का संकुचन हुआ था उसमें 2002 के बाद विस्तार हुआ।
वाजपेयी को जो सम्मान कश्मीर में मिला वह अभूतपूर्व था। आज भी उन्हें विश्वसनीय भारतीय नेता के रूप में देखा जाता है। कश्मीर के लोग यह मानते हैं कि यदि अटलजी 2004 के बाद भी प्रधानमंत्री रहते तो कश्मीर की समस्या का समाधान हो चुका होता। बाद में आने वाली सरकारें कश्मीर में शांति के प्रयासों की गति को बरकरार नहीं रख सकी और उम्मीदें हताशा में बदल गयी। यद्यपि जनतांत्रिक प्रक्रिया चलती रही लेकिन शांति प्रक्रिया जो वाजपेयी की विशेष खासियत थी, वही नहीं रही।

वाजपेयी का ‘उम्मीद का युग’ समाप्त होगया और ‘मोहभंग का युग’ आगया और बाद में ‘सनक का युग’ प्रारम्भ होगया जो जुलाई 2016 के बाद से अब तक परिलक्षित हो रहा है। राजनैतिक पहल की अनुपस्थिति में अलगाववादी शक्तियां उभर रही हैं। इस दौरान जो परिस्थितियां सामने आयी वो हैरान परेशान करने वाली है। आतंकी गतिविधियां, जो एक हद तक कम हो गयी थी, में फिर से उभार आरहा है।
आतंकियों का संख्याबल महत्वपूर्ण नहीं रहा लेकिन आतंकवाद को मिल रही जनस्वीकृति और आतंकियों का जश्न खतरनाक संकेत दे रहा है। जो अलगाववादी नेता अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे, उनकी महत्व मिल रहा है। आज राजनेता जैसे शीतसमाधि में चले गये हों और मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियां मानों समाप्त होगयी हों और इस कारण जो जनतांत्रिक माहौल सन 2002 के बाद बन रहा था, वह भी लुप्तप्राय है।

इतिहास गवाह है कि, उम्मीद कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती। जरूरत है वाजपेयी युग को पुनर्जीवन देने की। यदि राजनैतिक युक्तियों से कश्मीर की परिस्थितियों को सम्बोधित किया गया और इस प्रक्रिया में उनको शामिल किया गया तो निश्चय ही कश्मीरी अवाम सकारात्मक प्रतिक्रिया देगा। यह सबको समझना पड़ेगा कि क्यों कश्मीरियों ने वाजपेयी में अपना विश्वास पाया था। क्यों वे वाजपेयी की एक राजनैतिक नेता की बजाय राजनीतिज्ञ के रूप में प्रशंसा करते थे।

यह समझना भी आवश्यक है कि क्यों शेख अब्दुल्ला ने 1947 में भारत के साथ रहना स्वीकार किया था। यह भी समझना पड़ेगा कि ‘भारत की अवधारणा’ क्या थी जिसने शेख साहब को आकर्षित किया था और उन्होंने पाकिस्तान के साथ जाने के विकल्प को स्पष्टतया नकार दिया था।

डॉ. रेखा चौधरी
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