कश्मीर जल रहा है?: पहले उन्हें अपना तो समझें

-उषा मौजा नाहर-

-उषा मौजा नाहर-

कश्मीर को समझने के लिए, उसकी समस्या को समझने के लिए पहले कश्मीरियों को समझना होगा। उनकी आकांक्षाओं को समझना होगा। मुश्किल यह है कि हम समस्या को समझे बगैर उसका समाधान ढूंढने में लगे हैं। यह मानना है उषा मौजा नाहर का। उषा स्वयं कश्मीरी हैं। वहीं जन्म लिया और पली बड़ी हुई। बचपन से वहां के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच का प्रेम और सौहार्द्र देखा। उनके आपसी रिश्तों के गाढ़ेपन की चश्मदीद रही हैं। वे सवाल करती हैं कि अब ऐसा क्या हो गया है कि कश्मीर जल रहा है। ‘समय माजरा’ के आगामी अंकों में विभिन्न विद्वानों को आमंत्रित किया जारहा है कि वे इन समस्याओं को ढूंढें और सम्भावित हल से पाठकों को रूबरू करवायें।- सम्पादक

सबसे पहले हमें एक सच्चाई को स्वीकार करना पड़ेगा कि जवाहर टनल के इस पार रहने वाले शेष भारत के लोगों के लिए कश्मीर सिर्फ एक भौगोलिक इकाई है, जिसे हम भारतीय अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं। लोकतांत्रिक तरीके से या फिर फौजों के सहारे। हम मानते हैं कि कश्मीर देश का ताज है। हमारे लिए इज्जत का सवाल है। इस पार के लोग कश्मीर को अपना समझते हैं लेकिन कश्मीरियों के लिए हमारे दिलों में कितना दर्द है? या उनके दर्द को हम कितना जानते और समझते हैं। यह वो दर्द है जो उन्होंने अपनों को खोकर पाया है।

पिछले कई दशकों में कश्मीरी अवाम को कभी आतंकवादियों के हाथों, कभी फौजियों के हाथों, जो दर्द झेलने पड़े हैं और उनके आत्मसम्मान को जो ठेस पहुंची है, उसकी स्मृति मात्र ही उन्हें उद्वेलित कर देती है। जिसकी पीठ पर अलगाववादियों की कलाशिनकोव और सामने भारतीय सेना की संगीनें हों, और सरकारों से कोई उम्मीद बाकी ना रही हो, उस नौजवान को सरकारों के प्रति अविश्वास पैदा हो गया है। उसे लगता है कि सत्ता में बैठे राजनेताओं से उसे न्याय नहीं मिल सकता।

कश्मीर भारत से अलग हो जायेगा के डर ने, आती जाती सरकारों को ऐसा कोई ठोस कदम लेने से रोका जो फैसलाकुन होता। इस डर के चलते हमेशा दिल्ली में बैठी सरकारों ने कश्मीर में तानाशाह, भ्रष्ट और नाकारा सरकारों को बढ़ावा दिया, उनका साथ दिया। इस प्रक्रिया में कश्मीरी अवाम उस दिशा में बढ़ गया जिससे दूर रखने के लिए संकल्प लिये गये थे।

जब कोई कश्मीरी नौजवान भारत विरोधी या पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाता है तो जरूरी नहीं कि वह पाकिस्तान को भारत से बेहतर विकल्प मानता है या वह कट्टरपंथी इस्लामी दर्शन के प्रभाव में आ गया है। सच्चाई तो यह है कि उसने कभी भी अपने आपको भारत के साथ महसूस ही नहीं किया। ना ही उसे भारत के प्रजातंत्र में या भारत की धर्म निरपेक्षता में विश्वास पैदा हुआ।

कश्मीर में आतंकवाद के प्रारम्भ और उसके बाद भारतीय फौजों की कार्यवाही से, ख़ास तौर पर 1990 के बाद में पैदा हुई पीढ़ी के बारे में यह एक सच्चाई है। इस पीढ़ी ने अपने भाई, बहन, मां, बाप, रिश्तेदार, पड़ौसी को ‘मिलिटेंटों’ या फौजों की गोलियों से मरते देखा है। इस पीढ़ी ने वहां के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच शताब्दियों से चले आरहे प्यार को, सौहार्द्र को ना तो देखा ना ही कभी महसूस किया। इसके बावजूद वहां का युवक यह जानता है कि मुहब्बत आम कश्मीरी की विरासत है। लेकिन भय और आतंक के इस माहौल में रहने वाली पीढ़ी का युवक जब बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में देश के अन्य हिस्सों में जाता है और उसे शंकालु नज़रों से देखा जाता है तो इस नौजवान की अलगाव की भावना और भी प्रबल हो जाती है।

कश्मीर के भीतर और कश्मीर के बाहर हर कश्मीरी नौजवान को देशद्रोही, गद्दार समझा जाता है। वो क्या जानता और समझता है, इस बात पर ध्यान दिये बगैर उसे खारिज कर दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि कश्मीरियों को हम बराबरी का नागरिक ही नहीं मानते। जब भी उनके बारे में बात की जाती है तो उनको छोटा मान कर की जाती है। यहां हममें बड़प्पन का भाव नहीं होता। सोशियल मीडिया पर उन्हें नीचा दिखाने के लिए हम यह दावा करते हैं कि यदि हम उन्हें हर साल इतनी इतनी सहायता ना करें तो वे भूखे मर जायेंगे या फिर वे पाकिस्तान के साथ चले जायें तो उनके कितने बुरे हाल होंगे, इसके कयास किये जाते हैं। यही कारण है कि वे भारत के प्रति प्रेम या श्रद्धा का भाव नहीं रखते। कश्मीरी जातीयता अब धीरे धीरे आजादी की मांग करने लगी है। कश्मीरी युवा भारतीय राष्ट्रीयता के साथ अपने आपको जोड़ नहीं पारहा है।

कश्मीरी युवकों का भारत से अलगाव इस हादसे से समझा जा सकता है। कश्मीर के कुपवारा जिले के हंदवारा कस्बे में एक स्कूली छात्रा के साथ एक फौजी द्वारा यौन शोषण किये जाने के समाचार मात्र से कश्मीरी अवाम सड़कों पर उतर आया था। फौजों की गोलियों से कई निर्दोष लोग मारे गये या घायल हो गये। दरअसल अफवाहों ने कश्मीर की राजनीति में बड़ी भूमिका निभायी है और हंदवारा जैसे आरोपों से बड़े पैमाने पर हिंसा फैल जाती है। ऐसी घटनाओं के कारण बार बार उन्हें लगता है कि उनके आत्मसम्मान को चोट लग रही है। उन्हें पिछले कई दशकों से सेना के हाथों मिले दर्द याद आजाते हैं। हिंसा और बढ़ जाती है जो प्रशासन की नाकामियों के कारण नियंत्रण में नहीं रह पाती। अविश्वास गहरा जाता है। वे जानते हैं कि राजनैतिक तरीकों से अब न्याय नहीं मिल पायेगा।

एक सच्चाई को और जान लेना जरूरी है। भारत की आजादी के साथ ही कश्मीर में तीन अलग अलग विचारधाराओं के लोग रहे हैं। एक वो जो पाकिस्तानपरस्त थे जो धर्म के आधार पर सोचते थे। दूसरे वो जो कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहते थे। तीसरे वे लोग जो भारत के साथ अपना भविष्य देखते थे।

मृदुला साराभाई ने 1950 के दशक में अपने एक लेख में कश्मीर के हालात और भारत के साथ कश्मीर के सम्बन्ध को लेकर कहा था कि यह ‘खयालों की लड़ाई’ है। मृदुला साराभाई गांधीवादी विचारधारा की थी और सन 1940 से कश्मीर के मामलों से जुड़ी हुई थी। वे मानती थी कि देश के विभिन्न पक्षों के बीच कश्मीर को लेकर जो वैचाारिक मतभेद हैं, उनके कारण विभाजन की रेखाएं और भी मजबूत हुई हैं। यह विभाजन पाकिस्तान और भारत के कब्जे वाले कश्मीर के बीच हुआ है। जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच हुआ है। लदाख और कश्मीर के बीच हुआ है। और सबसे ज्यादा कश्मीर और शेष भारत के बीच हुआ हैं।

मृदुला साराभाई ने कई बार इस तथ्य को रेखांकित किया कि इन निहित स्वार्थों द्वारा समाचार माध्यमों का इस्तेमाल अपने अपने हितसाधन के लिए किया गया। इसके लिए झूठे प्रचार और अफवाहों के प्रसार के लिए किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न पक्षों के बीच मनमुटाव बनाये रखना था। मतभेद बढ़ते रहने से धीरे धीरे कश्मीरी अवाम या तो अपनी आजादी के बारे में सोचने लगा या फिर पाकिस्तान की ओर धकेला जाता रहा।

कई दशकों बाद भी खयालों की यह लड़ाई जारी है और तीव्रतर होती जारही है। श्रीनगर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का हादसा और बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद से कश्मीर घाटी में बिगड़े हालात भारत और कश्मीर के या कहना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकार के बीच कई अनसुलझी समस्याओं और विवादों का नतीजा है। ऐसा महसूस होने लगा है कि यह दो विभिन्न राष्ट्रीयताओं के बीच का विवाद है।

मृदुला साराभाई, बलराज पुरी और जयप्रकाश नारायण जैसे कई लोगों ने भारत सरकार पर लगातार दबाव डाला कि कश्मीर की समस्याओं के समाधान से पहले वहां की तकलीफों को समझने के लिए कोशीश की जानी चाहिए। समस्याओं के मूल को ढूंढने के लिए हमें पहले कश्मीर को जानना होगा। उनकी परेशानियों की जड़ वहीं ढूंढनी होगी। 1950, 60 और सत्तर के दशक में यह मांग पुरजोर तौर पर उठायी गयी। हाल तक कमोबेश यही स्थिति थी। हमेशा यह मांग की गयी कि कश्मीर को देश की जनतांत्रिक मुख्यधारा में लाने के प्रयास किये जाने चाहिए ताकि मौका परस्तों की मंशाएं पूरी ना हो सके।

जबसे जम्मू कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से पीडीपी ने सरकार बनायी है, कश्मीर में लगातार असामान्य स्थिति बनी हुई हैं। मुफ्ती मोहम्मद सयीद की मृत्यु के बाद से कश्मीरियों की आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु महबूबा की सरकार को अक्षम समझा जारहा है। कश्मीरी नौजवान को अब वहां की सरकार पर भी भरोसा नहीं रहा।

जैसाकि सब जानते हैं कि देश की संसद द्वारा पारित कोई भी कानून जम्मू कश्मीर प्रदेश में लागू नहीं होता, तब तक, जब तक वहां की विधानसभा उसे स्वीकार नहीं कर लेती। इस आधार पर अब आम कश्मीरी यह मान रहा है कि कश्मीर का भारत में विलय अंतिम नहीं है और इस सच्चाई को हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। अब यह आवश्यक है कि देश कश्मीरियों की आकांक्षाओं को जाने, समझे। कश्मीर की समस्या का समाधान कश्मीर में ही ढूंढना होगा और इसके लिए यह जानना होगा कि समस्या क्या है। समस्या यह है कि कश्मीर की समस्या को जाने बगैर ही उसके समाधान के प्रयत्न किये जारहे हैं।