बर्फ और आग़

-निदा नवाज़-

-निदा नवाज़-

हिन्दी कविता में निदा नवाज़ को कम ही लोग जानते हैं लेकिन उनकी कविता का अपना एक विशेष स्थान है। निदा कश्मीर की प्रकृति और संस्कृति का चित्रण करते हैं तो कश्मीरियों के दर्द और संघर्ष को भी उकेरते हैं। कश्मीर की अस्मिता को बचाने की बात करते हैं तो वे धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर सोचते हैं। प्रकृति का सौन्दर्य उन्हें सीमाओं में नहीं बांधता नाही आम आदमी का संघर्ष उन्हें सच्चाई बयान करने से रोक पाता है। निदा अच्छे और बुरे दानों पक्षों को सामने रखते हैं। वे कश्मीरी पण्डितों के विस्थापन और आतंकियों तथा फौजियों के बीच सैंडविच बनें कश्मीरी मुसलमानों के दर्द को एक साथ प्रस्तुत करते हैं। डोगरी साहित्यकार पद्मश्री रामनाथ शास्त्री निदा के लिए कहते हैं, ‘‘उसने वहशत और दहशत के दौर में भी वादी में अकेले एक हिन्दी कवि के रूप में रहकर अपनी काव्य साधना परवान चढ़ाई है।’’-सम्पादक
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1. मैं पालूँगा एक सपना

मैं पालूंगा एक सपना
जिसमें होगी एक पूरी सृष्टि
एक सुंदर शहर
जहां अभी तक
नहीं तराशा गया होगा कोई ईश्वर
न ही जानते होंगे लोग झुकना
न ही टेढ़ी हो गई होंगी
उनकी रीढ़ की हड्डियाँ
मेेरे सपने में
ईजाद नहीं हुई होगी
तिजोरियां
और न ही जंजीरें
जिन लोगों के पास नहीं होता कोई ईश्वर
वे नहीं बनाते तलवारें, किरपान और त्रिशूल
न ही उनके पास होता है डर
और न दूसरों को डराने वाली कोई बात
जहां तिजोरियां नहीं होती
वहां नहीं होती भूख
जहां ताले नहीं होते
वहां नहीं होते चोर
जहां मालिक नहीं होते
वहां नहीं होती जंजीरें

मैं अपने सपने को पालूंगा और बड़ा करूंगा
मेरा सपना भरेगा
संघर्ष के धरातल पर
खरगोश की किलकारियाँ
मैं उसमें बोऊंगा इच्छाओं के सारे बीज
टांकूंगा भावनाओं के सारे पुष्प
मेरे सपने में उड़ेगी
तर्क की रंगीन ततलियाँ
चहकेगी
यथार्थ की बुलबुल
मेरे सपने में पनपेगी
मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुश्बू
मैं अपना सपना कोयले की खान में
काम करने वाले मजदूर को दूंगा
वह मेरे सपने को सर्चिंग टॉर्च में बदल देगा
जो उसको खान की अंधेरी सुरंगों से निकाल कर
सृष्टि के अंतिम छोर तक ले जायेगी
जहां होगा उसका एक पूरा संसार
मैं अपने सपने को स्कूल जाते बच्चों के
टिफिन में रख लूँगा
जिस को देखकर वे भूल जायेंगे
भारी बस्तों के बोझ से घिसी
अपनी नन्हीं पीठ का नन्हा सा दर्द
मैं अपना सपना
उस वैज्ञानिक को दूंगा
जो उसको जीवन की प्रयोगशाला की
मेज पर पड़े
उस कंकाल आदमी पर आजमायेगा
जिस पर युगों से केवल
प्रयोग ही किये जा रहे है
मेरे सपने से उस पर उभर आयेगा मांस
और उसमें दौड़ेगा जीवन
मैं अपने सपने को रोप दूंगा
सरिता के पानी पर
उसकी लहरों पर दहकेगा
एक पूरा ब्रह्मांड
जिसमें पिघल जायेगा
वह अकेला हंस भी
जिसकी आँखों में
केवल मेरे नाम की इबारत लिखी है
मैं अपना सपना परोस दूंगा
शरणार्थी शिविर में जन्म लेने वाले
उन सभी बच्चों की आंखों के थालों में
जिनकी मांएं
अपने सूखे खेतों को खुला छोड़ने पर मजबूर है
दूसरों के चरने के लिए केवल
एक रजिस्ट्रेशन कार्ड बनवाने के लिए
और उसमें
एक काल्पनिक पितृ नाम भरने के लिए
मैं अपना सपना मछुआरे को दूंगा
जो बुन लेगा उससे
एक रंगीन जाल
और पकड़ेगा
सागर की सबसे सुंदर मछली
जिस पर कभी किसी
मगरमच्छ की नजर न पड़ी हो
और न ही उसकी आंखों में
अटका हो
किसी का फेंका कोई तीर
मैं उसको अपने मन के अॅक्वेरियम में पालूंगा
मैं अपना सपना समुद्र को दूंगा
बदले में मांगूगा उसका सारा नमक
जिसको छिड़क सकूं एकान्त में
अपने उस ताजे से घाव पर
जिसमें फडफड़ा रही है
क्रांति नाम की एक नयी कविता।

2. ख्वाबों के खंडहर

इससे पहले कि
आने वाली पीढ़ी को
इस मौसम से
लगने लगे डर
हमें प्यार और भाईचारे के
कोमल धागों से
बुननी होगी एक ऐसी चादर
जिसको ओढ़ सकें भविष्य में
हमारे बच्चे
समय की ठण्ड और कड़ी धूप से
बचने के लिए

इससे पहले कि
जल कर राख हो जाये
हमारे दिल के कोने में बची
थोड़ी सी हरियाली भी
हमें एक साथ लडऩा होगा
यह युद्ध
समय के दहकते
अंगारों के विरुद्ध
इससे पहले कि
बनाया जाये
हमारा एक-एक गाँव
कभी वन्दहामा1
और कभी बीजबिहारा2, मडुवा2
जलायी जाये हमारे साथ-साथ
सुहागनों के करवाचौथ पर
चांद की प्रतीक्षा करने की इच्छा
मासूम बच्चों के माथे के तिलक
जनेऊ के तीन धागों में बंधा
देवताओं, ऋषियों और पितरों के
ऋण का एहसास
और बनाये जायें गोली का निशाना
ईद-नमाज में झुकने से पहले ही
हमारे बुजुर्गाे के माथे
बचानी होगी हमें अपनी पहचान
दो बंदूकों के बीच
मरने से पहले

इससे पहले कि
छीन लिये जायें हमसें
नींद की फटी पुरानी
चादर के साथ साथ
ख्वाबों के खंडहर भी
छोड़ना होगा हमें अपराध
चुप रह कर जुल्म सहने का
और बन जाना होगा
एक पुकार
तेज तलवार सी

नहीं कर सकते यदि हम यह सब
तो इससे पहले कि
आखिरी हिचकी लेकर मर जाये
हमारा अंतर्मन सदैव के लिए
घोषणा करनी चाहिए हमें
अपनी मौत की
सारे संसार के समक्ष
और दर्ज करना चाहिए
अपना नाम कायरों की पुस्तक के
पहले पन्ने पर।

1. वन्दहामाः कश्मीर घाटी का वह गांव जहां उग्रवादियों द्वारा कश्मीरी हिन्दुओं का कत्ल-ए-आम किया गया।
2. बीजबिहारा, मडुवाः कश्मीर और जम्मू के दो गांव जहां फौजियों ने आम लोगों और नमाजियों पर फायरिंग करके बहुत से लोगों को मारा।

3. मेमनों की हत्या
(कश्मीर घाटी में मौजूद हजारों बेनाम कब्रों को याद करते हुए)
आखिर कहां गये वो लोग
वे भी तो राजदुलारे थे
अपने घरों के
आकाश तो नहीं खा गया उन्हें
धरती तो नहीं निगल गयी उन्हें
उनमें से कुछ निकले थे
स्कूलों की ओर
अपनी नन्ही पीठ पर
उठाये किताबों का बोझ
और अपने नाजुक हाथों में
उठाये टिफिन
उनमें से कुछ निकले थे
अपने लहलहाते खेतों की ओर
उठाये अपने मजबूत हाथों में
मिट्टी के हुक्के
और लोहे की दरातियां
और कुछ निकले थे
कारखानों और दफ्तरों की ओर
अपनी आंखों में लिये
असंख्य स्वप्न
और मन में
ढेर सारा साहस
वे घरों से निकले तो थे
दिन के उजाले ने भी
उन्हें निकलते देखा था
मुस्कुराते हुए
सूर्य ने भी उन्हें देखा था
स्कूलों की ओर चलते हुए
खेतों की ओर जाते हुए
कारखानों और दफ्तरों की ओर
जाते हुए
पर वे फिर कभी भी
नहीं लौट पाये अपने अपने घर
ना ही मिले फिर उनके पदचिह्न
आकाश तो नहीं खा गया उन्हें
धरती को नहीं निगल गयी उन्हेें
लेकिन
रात्रि को सब कुछ मालूम है
गहरे अंधेरे को भी सब कुछ मालूम है
कि उनका इस्तेमाल किया गया
फर्जी झड़पों में
सैनिक ड्रामाबाजियों में
और वे सदैव के लिए ढल गये
कुछ कायर फौजी अधिकारियों
के सीनों पर सजे
वीरता के पदकों में
वे सदैव के लिए सिमट गये
चंद फ़ौजी अधिकारियों की
सर्विस बुकों पर लिखी
झूठी शाबासी की पंक्तियों में
यह सब सूर्य को नहीं मालूम
यह सब उजाले को भी नहीं मालूम
यह सब यदि मालूम है तो
रात्रि को है मालूम
गहरे अंधेरे को है मालूम
यह सब यदि मालूम है तो
यातना केंद्रों की
दीवारों को है मालूम
हमारे लोकतंत्र की दहलीज पर बैठे
महाराजा को कुछ नहीं मालूम
हमारे महाराजा ने सूचियां देखी
फर्जी झड़पों की आड़ में
और तरक्कियों की
हमारे महाराजा ने
कभी भी नही देखा
उन झड़पों में इस्तेमाल हुए
हजारों निर्दाेष लोगों की
सूचियां……….
भेड़ियों की शाबाशी
हर एक ने देखी
किंतु
मेमनों की हत्या
बस कुछ ने ही देखी है।

-निदा नवाज़
नूरानी नर्सिंग कॉलेज के पास
एक्सचेंज कॉलोनी, पुलवामा-192301 जम्मू और कश्मीर
मो. 09797831595